अमला शंकर: सौ वर्ष का आँगन, सहेजता रहा जिनका जीवन

उस पदम् भूषण प्राप्त स्टाइलिश लेडी की बात कहाँ से शुरू की जाए। सौ वर्ष से अधिक नृत्य की उत्कृष्टतम धारा में तैरना सीखने से लेकर गौतेबाजी, रचनात्मक और वैभवशाली तैराकी-तरकीबें और एक विशिष्ट परम्परा की वाहक बन उसे दूसरी-तीसरी पीढ़ी को सहर्ष बाँटने वाली 101 वर्षीय अमला शंकर का पिछले दिनों कोलकाता में अवसान हो गया। वे विश्‍व विख्यात नृत्यकार उदय शंकर की पत्नी थीं। अपने परनाती-परपोतो की इस लाडली और प्यारी थम्मा
(दादी) को तुस्सर साड़ी पहनना पसंद थीं। वे फ्रेंच रोल बन के स्वाद की दीवानी थीं और वाईन कलर की लिपस्टिक लगाना उन्हें भाता था। वे फर्राटे से फ्रेंच बोलती थीं और स्विमिंग पुल में तैरना और बच्चों के साथ क्लब या होटल में जाकर कांटिनेंटल भोज करना उनकी आदत थीं।

वे पिछले छह वर्षो से नृत्यांगना बेटी ममता शंकर के साथ रहती थीं। पिछले कुछ महीनों से प्रायः रात को वे अपनी बेटी का हाथ पकड़ लेती थीं और उन्हें जाने नहीं देती थीं। लाकडाउन ने उन्हें अधिक साथ रहने का अवसर दिया। अपने अंतिम वर्षो में उनकी प्राथमिकता में बेटी के पोते, फिर उनके बच्चे, फिर दामाद और अंत में बेटी थीं। उनके जीवन का सबसे दुखदायी हादसा उनके बेटे आंनद शंकर का देहावसान रहा। उसके नहीं रहने का खालीपन उनके मन में स्थायी रूप से स्थित हो गया था। वे साईबाबा की भक्त थीं। साईबाबा ने एक बार उनसे कहा था कि मानव देह के रूप में यह उनका अंतिम जन्म है। इस पर उनका जवाब था- नहीं, मैं इसी दुनिया में वापस आना चाहूंगी और फिर से उदय शंकर से शादी करूँगी।

अपनी नातिन श्रीनन्दा शंकर को वे दादू (उदय शंकर) के किस्से सुनाया करती थीं। उनकी प्रेम कहानियों के बारे में भी बताया करती थीं। वे ऐसे समय अक्सर मजाकिया मूड में रहती थीं। फ़िल्म कल्पना (उदय शंकर निर्देशित) के लोकप्रिय गीत ’धिनक धिन धिना’ की लय को वे अपनी स्मृतियों से निकाल जीने लगती थीं। उनका मानना था कि गलत हो या सही, सब कुछ लय में होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में भी उदय शंकर की बेपरवाही और आशिक आवारागर्दी को इसी तरह से लिया था।   उदय शंकर के साथ परिणय में बंधने के पूर्व ही वे उनके आकर्षक व्यक्तित्व और नृत्य-प्रस्तुतियों से प्रभावित थीं। वे उन्हें देवतुल्य सम्मान करती थीं, लेकिन अंतर्मन में उनके लिए गहरा और इकतरफा प्रेम भी छिपाए रखती थीं। उदय शंकर उनसे लगभग बीस वर्ष बड़े थे। वे यह भी जानती थीं कि वे दिलफेंक आशिक मिजाज के हैं और खूबसूरत विदेशी महिलाओं में उनका एक जलवा था। यूरोप की कई मशहूर सुंदर महिला संगीतज्ञों के साथ उनके जग-जाहिर
अंतरंग रिश्ते थे।

उदय शंकर ने रवींद्रनाथ टैगोर के कहने पर अल्मोड़ा में वर्ष 1938 में नृत्य-अकादमी स्थापित की और इसमें उस्ताद अलाउद्दीन खां, शंकरन नम्बूदिरी, गुरुदत्त और जोहरा सहगल जैसे कलाकारों को जोड़ा। तब सुभाष चंद बोस के कहने से अमला भी उस अकादमी के लिए अल्मोड़ा गईं। वहाँ वर्ष 1939 में सभी को आश्‍चर्य में डाल उदय शंकर ने अमला से विवाह किया। आने वाले कुछ वर्ष उनके जीवन और अकादमी के लिए उतार-चढ़ाव वाले रहे। अर्थाभाव के कारण अकादमी बंद करना पड़ी। उदय शंकर कोलकाता आ गए और अमला शंकर के निर्देशन में एक नृत्य-संस्था की शुरुआत हुई। इन सबके बीच उदय शंकर का अपनी प्रिय महिलाओं के साथ रिश्ते परवान चढ़ते गए। वर्ष 1968 में, जब उदय शंकर सत्तरहवें की उम्र छूने में मात्र दो वर्ष पीछे थे, अपनी आयु से बहुत छोटी एक छात्रा अनुपमा दास के साथ रहने का फैसला करते हैं। इस हादसे पर बाद में अमला शंकर ने लिखा– पता नहीं क्यों, उदय में एक विचित्र दुर्बलता दिखाई देने लगी। इस दुर्बलता के साथ एक प्रकार का निरर्थक अहंकार बोध मिला हुआ था। मुझे पता था कि इसका फल उन दोनों के लिए अंततः मंगल-जनक नहीं होगा। अंतिम दिनों में उदय शंकर ने इसके लिए मुझसे पश्‍चाताप भी जाहिर किया था, लेकिन तब तक मेरे भीतर प्रेम को लेकर गहरा अविश्‍वास पैदा हो चुका था।

यहीं पर यह लिखते हुए मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री लीला नायडू का जीवन याद आ रहा है। सोलह वर्ष की उम्र में एक धनाढ्य ओबेरॉय खानदान में उनकी शादी हुई। एक वर्ष में ही वे जुड़वा बेटियों की माँ बन गई। शिकार और शराब के शौकीन अपने रईस पति से पिटने के बाद अट्ठारह वर्ष की उम्र में वह अलग हो गईं। इसके 11 वर्ष बाद वह अंग्रेजी के प्रतिष्ठित कवि डॉम मॉरेस की तीसरी पत्नी बन गई। सत्ताईस वर्ष के दांपत्य जीवन के बाद अपने से आधी उम्र की एक स्त्री से प्रेम हो जाने के कारण डॉम मॉरेस ने लीला नायडू को छोड़ दिया।

अमला शंकर कहने को ही पत्नी थी। क्योंकि उदय शंकर ने अपनी वसीयत में सारी धरोहर, ‘कल्पना’ फ़िल्म का कॉपीराइट और ऐतिहासिक महत्व की अनगिनत वस्तुएं अनुपमा दास के नाम कर दी। जिन्हें अनुपमा ने बाद के वर्षो में कौड़ियों के दाम बेच दिया। वर्ष 1977 में उदय शंकर की मृत्यु के बाद अनुपमा दास वाला विवाद चल रहा था, तब एक पत्रिका से बात करते हुए अमला शंकर ने कहा था– अगर उदय शंकर किसी ऐसी औरत के साथ गए होते, जिसे उनकी कद्र होती तो मुझे जरा भी खराब नहीं लगता। उनके जीवन में जोहरा थीं, एलिस बोनर थीं, सिम्बी थी, उन्हें हर किसी से प्रेम करने का अधिकार था। उनका व्यक्तित्व हर किसी को आकर्षित कर लेता था। लेकिन अनुपमा उनकी सोहबत के लायक नहीं थी। उसने कभी उदय शंकर को परफॉर्म करते नहीं देखा। वह पैसे और शौहरत के लिए नजदीक आई थी।

एक बेहद मशहूर लेकिन हरजाई पति के साथ और उनके निधन के बाद उनके नाम की परछाई के साए तले जीवन जीने वाली अमला शंकर निडर और जीवट कलाकार थीं। महात्मा गांधी का हस्तलिखित वह पत्र उन्होंने हमेशा सम्हाल कर रखा, जिसमें गांधी ने उदय शंकर और उन्हें विवाह की शुभकामनाएं दी थीं। उन्होंने नृत्य की तालीम देना कभी नहीं छोड़ा। उपेक्षित होने के दर्द को वे नृत्य करने और सीखाने में भुलाती रहीं। ममता शंकर कहती हैं- उनसे सीखने का कोई अंत नहीं था। वे जीवन के हर पहलू को बारीकियों से समझाती थीं। हर कोई सुंदर नृत्य कर सकता है, लेकिन अंग-संचालन और भाव क्या सम्प्रेषित कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। वे टूथपेस्ट की ट्यूब को हल्के से दबाना भी सीखाती थीं और पानी बचाना भी। वहीं उनकी नातिन श्रीनन्दा कहती हैं- दादी की खाना बनाने में दिलचस्पी थी। वे गुजराती दाल बहुत स्वादिष्ट बनाती थी। वे फोन के सेल्फी मोड के तकनीक की दीवानी थी। मेरे होने वाले पति को लेकर वह मुझे छेड़ती थी कि अगर तूने शादी नहीं की, तो मैं कर लूंगी। लाकडाउन के कारण मुंबई से आने में असमर्थ श्रीनन्दा उनके अंतिम दर्शन नहीं कर पाई।

उदय शंकर और अमला शंकर के नृत्य में भारतीय तत्व परम्परा मूलक होते थे लेकिन उनकी प्रस्तुति का तरीका आधुनिक रहता था। वे शास्त्रीयता के पारंपरिक रूप से भिन्न अपना नवाचार करने में विश्‍वास रखती थी। वे अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और विरले आत्मविश्‍वास के साथ ऐसी नृत्य-धरोहर भारतीय संस्कृति के लिए विरासत में छोड़ गई हैं, जिस पर आने वाली कई पीढ़ियों को गर्व होगा। विख्यात लेखक जेम्स जॉयस ने यूरोप में उदय शंकर का नृत्य देखने के बाद अपनी बेटी को पत्र में लिखा था– वह स्टेज पर किसी अर्ध देवता की तरह चलता है। मेरा यकीन मानो, इस गरीब संसार में अब भी कुछ खूबसूरत बचा हुआ है। अब अमला शंकर के नहीं रहने के बाद हम यही कह सकते हैं कि हम उस समय में रहे हैं, जिसमें अमला शंकर जैसी अलौकिक नृत्यांगना रहती थी।

राकेश श्रीमाल

(लेखक कवि और कला समीक्षक हैं। इन दिनों कोलकाता में रहते हैं)

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