एकता और अनुशासन’ का पाठ पढ़ाती एनसीसी

स्कूल कॉलेज के दिनों में लिखने पढ़ने में रुचि के अलावा जिन अन्य गतिविधियों में बहुत मजा आता था उनमें से एनसीसी की  परेड, प्रशिक्षण और साल में एक बार लगने वाले आउटडोर कैम्प सबसे अधिक आकर्षित करते थे। इस प्रशिक्षण के जूनियर विंग के ’ए’ प्रमाण पत्र तथा सीनियर विंग के ’बी’ व ’सी’ प्रमाणपत्रों की योग्यता अर्जित करने का गौरव भाव तो हमेशा रहा ही किन्तु इससे बढ़कर जीवन में हर काम को व्यवस्थित व अनुशासित रूप से करने की प्रवृत्ति जो भी थोड़ी बहुत आई उसका अधिकांश श्रेय एनसीसी के प्रशिक्षण को ही दे सकता हूँ।

स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों। पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने पर एनसीसी प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में सामुदायिक विकास, सामाजिक सेवा गतिविधियों में शामिल करने के लिए बढ़ाया गया था। राष्ट्र की आवश्यकता को पूरा करने के लिए। भारत चीन युद्ध के बाद एनसीसी प्रशिक्षण 1963 में अनिवार्य किया गया था। बाद में 1968 में इस कोर को फिर स्वैच्छिक कर दिया गया था। हमारे समय में स्काउट गाइड या एनसीसी में से कोई एक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता था उन दिनों। मैंने एनसीसी को प्राथमिकता दे दी।

प्रसंगवश यहां यह जानकारी देना उचित होगा कि एनसीसी 15 जुलाई 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम के अंतर्गत स्थापित की गई थी। जो भारतीय रक्षा अधिनियम 1917 के अधीन  था। अब यह स्वैच्छिक आधार पर स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए उपलब्ध है। राष्ट्रीय कैडेट कोर अनुशासित और देशभक्त नागरिकों में देश के युवाओं को संवारने में लगे हुए सेना, नौसेना और वायु सेना के घटकों का एक त्रिकोणीय सेवा संगठन है। कैडेटों को छोटे हथियारों और परेड में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। अधिकारियों और कैडेटों को सैन्य सेवा के लिए कोई दायित्व नहीं होता लेकिन कोर में उपलब्धियों के आधार पर चयन के दौरान सामान्य उम्मीदवारों पर वरीयता दी जा सकती है। कैरियर में एनसीसी प्रमाणपत्रों के कारण मिलने वाले अतिरिक्त लाभ को देखते हुए ही मैं भी ’एकता और अनुशासन’ जैसे आदर्श वाक्य वाले इस महत्वपूर्ण संगठन  का सदस्य बना था।

स्कूल के खेल मैदान पर प्रत्येक रविवार को प्रशिक्षण की खुली कक्षाएं लगती थीं। व्यावहारिक और सैद्धांतिक जानकारियां दी जातीं। एनसीसी दफ्तर में नियुक्त सेना के सेवानिवृत्त लेकिन यहां प्रतिनियुक्त अधिकारी ट्रेनिंग देते। परेड करवाते। उनके सैनिक गणवेश बहुत आकर्षित करते थे। हमें भी इसी तरह अपने यूनिफॉर्म के साथ पूरी चमक और धमक के साथ परेड में शामिल होना होता था। स्कूल में एक कक्ष एनसीसी के लिए ही आबंटित होता था,जिसमें गणवेश, जूते,सॉक्स, बेल्ट,कैप व अन्य बेजेस आदि रखे होते थे। प्रत्येक केडेड को यह सामग्री दी जाती थी। मैं स्वयं बड़े उत्साह से घर पर प्रति सप्ताह गणवेश को धोकर, अरारोट का कलफ लगाकर प्रेस करता था।
कॉलेज के दौरान हमारे वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर मेजर खोचे साहब प्रमुख थे।  कॉलेज ग्राउंड के अलावा कभी कभी पुलिस परेड ग्राउंड पर भी प्रशिक्षण होता था। मुझे यहां बी और सी प्रमाणपत्र के समय ’अंडर ऑफिसर’ जैसे उच्च छात्र कैडेट पद का सौभाग्य मिला था। दशहरा दीपावली अवकाश में जो आउटडोर कैम्प होते थे उनमे पूरी बटालियन से सम्बद्ध स्कूलों कॉलेजों के छात्र कैडेट हिस्सा लेते थे। ऐसे कुछ कैम्प इंदौर के देवधर्म टेकरी, महू के पशुचिकित्सा महाविद्यालय, नीमच के महाविद्यालय के निर्जन इलाकों में भी लगे थे। उस वक्त के सुनसान इलाके अब शहरों की सीमा में आकर आबाद हो गए हैं।कैम्पों में हमें टेंटों को बांधने से लेकर शिविर स्थल को सजाने, टेंट में अपनी दरी,कम्बल की व्यवस्थित घड़ी करना तक सिखाया गया था। एक प्लेट और एक मग की नाम मात्र सामग्री से दैनिक कामकाज और भोजन आदि करना भी बहुत सहज हो जाता था। दिन भर मैदान और किसी वृक्ष की छांव में कक्षाएं चलतीं। परेड हो

-ब्रजेश कानूनगो

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