एक मायने में अमिताभ के मार्फत यह संदेश तो चला ही गया है कि देख लिया लापरवाही का नतीजा !

एक लेखक मित्र अपनी हर नई किताब अमिताभ बच्चन को प्रेषित करते आये हैं । इस बार जब उनकी नई किताब आई तब भी उन्होंने ऐसा ही किया । वह दिसंबर का महीना था और उस समय तक कोविड 19 जैसे संक्रमण से भारत पूरी तरह नावाकिफ था। वह पुस्तक सुरक्षा कारणों से स्वीकार नहीं हुई और स्पीड पोस्ट से भेजी गई वह पुस्तक लेखक के पास वापस आ गई। तब वे मित्र खिन्न से दिखे पर उन्होंने खेलदिली से इस अतिशय सुरक्षा भाव को स्वीकार किया। वे अब भी खिन्न ही हैं क्योंकि संक्रमण तो फिर भी उनके प्रिय कलाकार और एक अच्छे पाठक और साहित्यप्रेमी परिवार के सेलेब्रिटी सदस्य के घर घुस ही गया।

अमिताभ बच्चन ज्ञात रूप से तो बिना पारिश्रमिक लिये ही कई जनोपयोगी कार्यों का प्रचार -प्रसार करते आये हैं उनका ब्रांड एंबेसडर बन कर। ब्रांड एंबेसडरी को जितना सम्मान अब तक मिलता आया है उतना ही उसका मखौल भी उड़ाया गया है । अब इन बातों ने नया मोड़ ले लिया है । कई लोग कह रहे हैं कि हम एक प्रसिद्ध व्यक्ति के ग्रस्त होने पर चिंता जाहिर करते हैं और अपने आसपास के कोरोना पाजिटिव से घृणा करते हैं । पर क्या सचमुच में ऐसा है ? सच तो यह है कि हम भयभीत हो कर उस बीमार व्यक्ति से छुआछूत रखते हैं पर हमारी सहानुभूति भी उस के साथ होती ही है ।

अमिताभ बच्चन के ठीक हो कर घर आ जाने पर यह प्रचार जोर पकड़ेगा कि देखिये सावधानी न रखने पर यह संक्रमण किसी को भी हो सकता है यह साबित हो गया। बल्कि एक मायने में अमिताभ के मार्फत यह संदेश तो चला ही गया है कि देख लिया लापरवाही का नतीजा। ईश्‍वर न करे इस परिवार पर कोई बड़ा संकट इस वायरस के कारण आता है तो इस बात की और तसदीक हो जायेगी । बहुत सी दवाओं खासकर वैक्सीनों के आविष्कारकों ने जान जोखिम में डाल कर अपने ही ऊपर इन दवाओं का प्रयोग किया। पर सबसे ऊपर यह बात सिद्ध हो गई कि हम अपने को भ्रम में डाल कर जीने में कितने कुशल हैं।

हम प्रसिद्धि को तो पहले से ही पूजते आये है तभी तो सरकारों को ब्रांड एंबेसडर लाने की सूझती है। ये सारे भ्रम हमसे ही जुड़े हुए हैं । सरकारें समझती हैं कि ब्रांड एंबेसडर बनाने से लाभ होगा । अलग- अलग शेड के चश्मे लगाकर इसे देखने वाले इसके पार अलग छबि देखकर प्रसन्न या रुष्ट होते हैं। पर्यटन बढ़ाने का काम बार- बार -‘एक बार तो आईए ’ कहने से होता है या उन स्थानों की अपनी विशेषता और वहां पहुंचने की और रहने की सुविधाओं के कारण होता है ? यह सोचने की बात है । इन सब विशेषताओं में ब्रांड एंबेसडर मात्र टेका ही लगा सकते हैं । आप ये विशेषतायें हटा दीजिये चार दिन में सारे प्रचार टांय- टांय फिस्स हो जायेंगे। वैसे हमारे यहां दरअसल पर्यटन का मतलब ही कुछ और है। नदी तालाब तक जा कर हम चाट चाउमिन के ठेलों की ओर लपकते हैं । नदी तालाब के निकट तो हम अपने खाली दोने- प्लेटें और प्रयुक्त पूजन सामग्री फेंकने जाते हैं । हमें स्वच्छता के लिये भी एक अदद ब्रांड एंबेसडर लगता है । असलियत में तो हम इस की ओर जुर्माने की वजह से प्रवृत्त होते हैं । जैसे बगीचे में लगा एक ब्रांड एंबेसेडर बोर्ड हमें फूल न तोड़ने की मात्र सूचना देता है हमें रोकता तो कोई सिक्युुरिटी गार्ड या जुर्माने का भय ही है। हम एक धर्मभीरू समाज हैं । अच्छा होता विभिन्न धर्मों के लोगों को जागृत और सुरक्षित करने के लिये अग्रणी लोगों को आगे ला कर धर्म की ब्रांड एंबेसडरी में यह कार्य करवाया जाता। अब भी करवाया जा सकता है।

हमने तो बचपन से ही फिल्म अभिनेत्रियों को एक विशेष साबुन की ब्रांड एंबेसेडर बने देखा है। लीला चिटणीस इसकी पहली ब्रांड एंबेसेडर 1941 में थीं और इसके बाद मधुबाला, सायरा बानो ,हेलेन, चांद उस्मानी, हेमामालिनी से ले कर अब ऐश्‍वर्या राय , प्रियंका चोपड़ा, असिन तक ने लुभाने की कोशिश की। एक बार तो इस कंपनी ने नर्गिस ,वहीदा रहमान और वैजयंतीमाला को तीन देवियां कहते हुए एक साथ एक ही विज्ञापन में दिखा कर जैसे तीन इक्कों से पूरा खेल जीतने की कोशिश कर डाली। पर हमने अपनी मां या बहनों को कभी इस साबुन के लिये इसरार करते नहीं देखा। और तो और पहली बार मर्दों तक पैठ बनाने के लिये इस साबुन ने शाहरूख खान और अभिषेक बच्चन को खड़ा किया पर यह हमारे लड़कों को लगता नहीं कि लुभा सका हो। ये विज्ञापन दिखने में जरूर अच्छे लग सकते हैं पर कुछ अपनाने के लिये उन उत्पादों की अच्छाईयां और हम स्वयं ही उकसा सकते हैं। माधुरी दीक्षित स्तनपान अभियान की प्रचारक हैं पर मां की ममता और उसके संस्कार ही सचमुच के प्रेरक हो सकते हैं । हां , सौंदर्य बनाये रखने की भ्रांतियां स्तनपान के प्रति अवरोधक जरूर हो सकतीं हैं । अब नई पीढ़ी ब्रांडेड के पीछे भागने लगी है। बड़े ब्रांड की दवाईयां दस दस गुना कीमत पर बिक रही हैं अब जा कर उनको खदेड़ने के लिये जेनरिक को लगाया गया है पर लगता है कि कमीशन का रक्षा कवच ब्रांड के पक्ष में किसी न किसी तरह खड़ा ही रहेगा ।

फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी नाडा याने नेशनल ऐंटी डोपिंग एजेंसी के ब्रांड एंबेसेडर हैं पर खेलकूद में इस गलत काम को रोकता तो वह भय ही है जिसके कारण मेडल छिन सकता है । वाडा याने वर्ल्ड ऐंटी डोपिंग एजेंसी तो हर साल अप्रेल माह में प्ले ट्रू दिवस मनाती है। वास्तव में मात्र खेलकूद नहीं सच तो जीवन के हर क्षेत्र में जरूरी है । इसी तरह नशीली दवाओं की मदद से खेल जीतना जितना गलत है उतनी ही हर प्रतिस्पर्धा में अनैतिकता बुरी है।   रियो ओलंपिक के दरम्यान एक घटना ने तो कुछ और ही किया। 12 बार तैराकी ओलंपिक मेडल जीत चुके और कई कंपनियों के ब्रांड एंबेसेडर रियान लोच्टे ने अपने ऊपर हमले और डकैती की रिपोर्ट पुलिस में की । दरअसल में उसने एक गैस स्टेशन के गार्ड से शौचालय के प्रयोग को लेकर हुई हुज्जत को ढांकने के लिये झूठी कहानी घढ़ी थी। नतीजे में लोच्टे को और कई दंडों के साथ और भी भुगतना पड़ा जब सभी कंपनियों ने उनसे ही नहीं किसी भी एथलीट से प्रचार का काम कराना ही बंद कर दिया।

दसवें और अंतिम सिख गुरू गोबिंद सिंह जी ने पंज प्यारों का चयन जिस तरह किया वह हम सब जानते हैं । उन्होंने पांच शीश मांगे और आत्म बलि के इस आव्हान पर जो पांच लोग सामने आये वे पंजाब, गुजरात, उड़ीसा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश से थे और अलग -अलग जातियों के थे। गुरू ने उनके समर्पण को देख कर ही उनका चयन किया। पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब ही अब से गुरू विराजित होंगे, यह तय किया। एक तरह से पांच प्यारों के रूप में जिनका चयन किया गया वे पुरानी प्रथा को विराम दे कर शक्तिशाली प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करेंगे। इन्हें प्रदत्त अधिकारों के बारे में बेहद रोचक बात आगे सामने आई। चमकौर के युद्ध में बचे पांच सिखों ने गुरू गोबिंद सिंह जी को ही आदेश दे दिया कि वे युद्ध स्थल से निकल कर समाज को आततायियों से लड़ने के लिये संगठित करें और गुरू ने आदेश माना । आज इस समय में मास्क पहनने से ले कर दूरी बनाये रखने के निर्देशों का पालन करने में भी हमें परेशानी होती है तब ब्रांड एंबेसेडर कीे प्यार से फुसलाने की बात कौन मानने वाला है ?  वह भी तब जब ब्रांड एंबेसेडर को स्वयं ही नहीं पता कि किस छिद्र से उसके ही घर में यह वायरस घुस आया। जाहिर है हम सब इस भ्रांति में जीते हैं कि गाज तो किसी और पर गिरेगी हम पर नहीं। पांच प्यारे गुरू ने इसीलिये तो चुने कि ये पंच पहले स्वयं त्याग की मूर्ति बन सेवा करेंगे और तब ही वे समाज के लिये आदर्श प्रतिमूर्ति बन सकेंगे।

यह वायरस दरअसल में ऐसा गुरू बन कर सामने आया है जो हम सब को ही समर्पण भाव की कसौटी पर परखना चाहता है। वह चाहता है कि हम भवनों-पुस्तकों की और तन- मन की सुरक्षा और स्वच्छता के लिये सुबह उठते से ही जुट जायें। हम आचरण के मानकों में एक भी चूक न करें। हम कोई भी हों, ये चूकें हमें नहीं बख्शेंगी। भले वे सीधे हम से न हुई हों दूसरों से हों तो भी हमें ही भुगतना पड़ सकता है। अपने सामने या बगल में खड़े व्यक्ति को मास्क लगाने का कह कर हमें उस का गुरू बनने में गुरेज या भय नहीं होना चाहिये। मास्क एक प्रतीक हो सकता है , जीवन में पग- पग पर हमें गुरूओं की जरूरत है और अपने को किसी भी समय चेला बनाने की तैयारी जैसी विनम्रता की भी। ब्रांड एंबेसेडर चाहे कोई अभिनेता हो या एथलीट उसे पांच प्यारों की तरह सारे मोह त्यागने होंगे । इसलिये अगर हम अपने आप को ही अपने लिये इस पद पर नियुक्त कर लें तो अच्छा होगा। प्रकृति ने इतने सारे ब्रांड एंबेसेडर खुले में कला दिखाते बिखेर रखे हैं। हम नहीं समझते और मानते । मजबूरन अब दंड और जुर्माने पर उतरना पड़ा है इस पृथ्वी के प्रशासन को। अब भी न समझने पर और भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। क्या हम तैयार हैं ?

सुधीर मोता

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