और हम अजान से, मकान से …ओढकर कफन में पड़ी ‘मां’ को देखते रहे

मुजफ्फरपुर के रेलवे स्टेशन पर मजदूर मां के कफन को हटाकर जगाने की कोशिश करते छोटे से बच्चे की तस्वीर को भुला पाना आसान नहीं है। यह हादसा जहन में पत्थर की लकीरों की तरह अपनी दर्दनाक उपस्थिति दर्ज करता है। गुजरात के दंगों के वक्त साल फरवरी 2002 में ’टाइम्स ऑफ इंडिया’ में हाथ जोड़कर जिंदगी की फरियाद में गिड़गिड़ाते दंगा पीड़ित कुतुबुद्दीन अंसारी की तस्वीर का दर्द रिसते घावों की तरह आज भी जहन में ताजा हो उठता है। ठीक उसी तरह कफन हटाकर मां से ममता की किलकारियाँ तलाशते बच्चे की मार्मिक तस्वीर भी पत्थर की लकीरों की तरह लोगों की याद्दाश्त को कुरेदती रहेगी। यह तस्वीर राष्ट्र के कर्णधारों से काफी कुछ कहती है, काफी कुछ पूछती है।
त्रासदी यह है कि देश, समाज और व्यक्ति के भीतर एक अजीबोगरीब, दहशतजदा सन्नाटा और खालीपन कुंडली मार कर बैठ गया है, जो सिर्फ जहर ही फुंकारता है, नफरत ही उगलता है…। हादसे का वीडियो सोशल-मीडिया पर वायरल हो रहा है। गुजरात के कुतुबुद्दीन अंसारी की याचना वाली तस्वीर की कहानी आगे कहती है कि दंगों के दस साल बाद 2012 में अंसारी पर हमला करने वाले अशोक परमार राष्ट्रीय एकता के एक कार्यक्रम में फिर गले मिले। हमलावर अशोक ने घटना पर खेद व्यक्त करते हुए दंगों की निर्थकता को अपने पश्‍चाताप में बकायदा रेखांकित किया। अंसारी से माफी के चंद लफ्जों में दंगों के घावों पर मरहम लगता महसूस होता है, लेकिन मुजफ्फरपुर के रेलवे स्टेशन पर कफन में लिपटी मां से किलकारियां तलाशते मासूम अनाम बच्चे की तस्वीर में बयां कहानी का अंजाम क्या होगा? सवाल जितना मार्मिक है, उससे ज्यादा कठिन भी है…उसकी जिंदगी के सवालों का जवाब कब मिलेगा… कैसे मिलेगा…कहां मिलेगा… और सबसे बड़ी बात है कि जवाब कौन देगा…?
कोविड-19 का लॉकडाउन प्रवासी मजदूरों के लिए कोरोना महामारी की तरह ही त्रासद सिद्ध हुआ है। देश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर पांच सौ से ज्यादा प्रवासी मजदूरों की मौतों की दर्दनाक दास्तान में इस मानव निर्मित त्रासदी का हिसाब-किताब जमा है। इससे बचा जा सकता था। उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेनों में दस से ज्यादा मजदूरों की मौतें हतप्रभ करती हैं। जेठ-बैसाख की धधकती गरमी में, जबकि सूरज आग उगलता है, भूखे-प्यासे मजदूरों की कठिनाइयों को महसूस नहीं कर पाना हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के पथरीलेपन को उजागर करता है।
मजदूरों की मजबूरियों और मौतों से जुड़े सवालों में पथरीलापन हैरत पैदा करता है। सरोकारों के मिजाज में मार्केट का मायावी संसार हावी है। उम्मीदें जुगनू की रोशनी की तरह अंधेरे में गुम होती साफ दिख रही हैं। समाज में संवेदनशीलता का दामन छोटा होता जा रहा है।
केन्द्र सरकार नहीं चाहती है कि प्रवासी श्रमिकों से जुड़े सवाल और समस्याएं लोगों के जहन में सुलगें और उत्तर ढूंढे। इसीलिए गोदी मीडिया के स्क्रीन पर ये हादसे नदारद हैं। गोदी मीडिया इन्हें इस तरीके से परोस रही है कि लोगों को लगे कि हंगामा राजनीतिक ज्यादा, सामाजिक कम है। गौरतलब है कि जवाबदेही सुनिश्‍चित करने के लिए सरकार कोरोना और प्रवासी मजदूरों के सवालों की पड़ताल के लिए तैयार नहीं है।
पड़ताल में पहला सवाल तो यही उभरता है कि लॉकडाउन के कारण बेरोजगार दस करोड़ मजदूरों की रोजी-रोटी की आपूर्ति कैसे होगी और कौन करेगा…श्रमिकों की घर वापसी की व्यवस्थाओं का इंतजाम कैसे होगा…लॉकडाउन की रणनीतिक विफलताओं के लिए कौन जिम्मेदार है…? लॉकडाउन की असफलताओं ने केन्द्र सरकार की दूरदर्शिता को भी कठघरे मे खड़ा कर दिया है…। पटना हाईकोर्ट ने मर चुकी मां को उठाते हुए बच्चे की घटना का स्वत: संज्ञान लिया है। हाईकोर्ट ने घटना को भयावह और दुर्भाग्यपूर्ण निरूपित करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। गोदी मीडिया का मैनेजमेंट भी सरकार के बचाव मे कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहा है। प्रवासी मजदूरों की तकलीफों का खून रिसने लगा है। साठ के दशक में फिल्म ’नई उमर की नई फसल’ के लिए नीरज ने गीत लिखा था- ’कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’। गीत में उन्होंने आगे लिखा है… ’और हम अजान से, दूर के मकान से, ओढ़ कर कफन पड़े मजार देखते रहे’। मुजफ्फरपुर स्टेशन पर मां, कफन और बच्चे की कहानी का सिला भी नीरज के शब्दों में कुछ यूं भी बंया हो सकता है… ’और हम अजान से, ’लुटियंस’ के मकान से, ओढ़ कर कफन पड़ी मां देखते रहे’…

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