कब तक फोड़ते रहेंगे अपनी नाकामियों का नारियल दूसरों के माथे

परिवर्तन प्रकृति का शाश्‍वत नियम है इससे तो सभी भलीभांति परिचित है लेकिन यह बदलाव हमारे जीवन में किस तरह कारगर साबित हो सकता है यह कम ही लोगों को पता होता है। सुबह के बाद शाम, दिन के बाद रात, गर्मी के बाद बरसात का आना किसे अच्छा नहीं लगता। यह संसार अगर आज इतना सतरंगी और मजेदार है तो उसकी अनेक वजहों में से एक उसका परिवर्तनशील होना भी है। अगर प्रकृति बदलाव के नित नूतन रंग नहीं दिखा रही होती तो आज दुनिया इतनी हसीन और मजेदार न होती। दुनिया के देशों की तुलना में भारत की तरफ विश्‍व पर्यटकों के रूझान की एक वजह यहां एक ही साल में अनेक तरह के मौसम का नजारा भी है। जो धरती एक माह पहले तक सूरज की तपिश से झुलस रही थी आज बरसात के आते ही उसने शीतलता भरी हरितिमा की चादर ओढ ली है। बागों में बहार और कलियों में निखार को बारिश की बौछार ने और अधिक सुहावना बना दिया है। कोयल की कूक और पपीहे की पीहू – पीहू का संगीत कानों में रस घोल रहा है और मन का मयूरा नर्तन करने लगा है। सावन के झूले और मौसम की मादकता दिल दिमाग पर असर डालने लगी है।

सच पूछा जाए तो मौसम का बदलना एक बाहरी नहीं अपितु आंतरिक क्रिया भी है जिससे मनुष्य का सामाजिक सरोकार भी अछूता नही रह पाता है। यही वजह है कि जब धरती अपना लिबास बदलती है तो उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्‍चिम तक समूचा परिवेश बदलाव की अंगडाई लेता नजर आता है। खान – पान, रहन – सहन, वार – त्योहार सब पर बदलाव की छाया नजर आने लगती है। जीवन की प्राथमिकताएं और जरूरतें उसे ध्यान में रखकर तय होने लगती है। ऐसा किसी मजबूरी के तहत सायास नहीं अपितु सबकुछ स्वाभाविक तरीके से अपने आप होने लगता है। गर्मी के आते ही आईस्क्रीम और गन्ने का रस, बरसात के आते ही गर्म पकोडे और रस पूडी तथा सर्दी के दस्तक देते ही गजक, गराडू और पिण्ड खजूर का नाम सुनकर मुंह में पानी आने लगता है। ऐसा इसलिए होता है कि समय के साथ बदलना मनुष्य की नियति है। जिसने अपने आपको युगीन बदलाव के सांचे में ढाल लिया उसके लिए संसार से समायोजन आसान हो जाता है और जो समय के साथ नहीं बदल पाता मुख्य धारा से अलग – थलग पड जाता है।

जब बात बदलाव की चल ही पडी है तो लगे हाथ यह भी जान लिया जाए कि प्रकृति से शुरू हुआ बदलाव शीघ्र ही इन्सानी जीवनचर्या तक जा पहुंचता है। पडाव दर पडाव मनुष्य में होने वाले बदलाव भी इससे अछूते नहीं हैं। एक ही मनुष्य की तासीर बचपन, तरूण, युवा, अधेड और वृद्ध आयु में अलग – अलग दिखाई देती है। इस बदलाव में व्यक्ति के सोच और समझदारी के स्तर में होने वाले विस्तार की भी अहम भूमिका होती है। ज्ञान और अनुभव में वृद्धि के साथ – साथ मनुष्य के नजरिये में बदलाव स्वाभाविक ही है। यह बदलाव उसकी प्रगतिशीलता को दर्शाता है। इसकी शुरूआत विचार से होती है। चूंकि मस्तिष्क समूचे तंत्रिका तंत्र का नियंत्रक है इसलिए हर बदलाव को पहले वह महसूस करता है। विचार से होते हुए यह प्रक्रिया रहन – सहन, खान – पान, आचार – विचार, तक हर चीज पर अपना असर डालने लगती है। नतीजतन समूची जीवनशैली ही उस अनुरूप आचरण करने लगती है।

अगर पहले की तुलना आज दुनिया पूरी तरह बदली हुई नजर आ रही है तो इसकी एक मात्र वजह प्रकृति के बदलाव पर आधारित मनुष्य की परिवर्तनशील सोच ही है। विधाता ने तो एक बार सृष्टि की रचना कर उसे मनुष्य के हाथों में सौंप दिया। उस आधुनिकता के रंग में रंग कर इतनी रंग रंगीली बनाने का काम मानव मस्तिष्क की देन है। दुनिया भले ही विधाता की मौलिक कल्पना हो लेकिन आज जो सतरंगी संसार हमारे चारों और दिख रहा है उसका निर्माता मनुष्य है। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का खुद निर्माता है। आज संसार और जो व्यक्ति जैसा भी है उसके लिए मनुष्य स्वयं ही जिम्मेदार है। ऐसे में अगर कोई अपने हालात और परिस्थितियों का नारियल दूसरों के माथे फोडना चाहे तो यह संसार उसे इसकी अनुमति नहीं देता। क्योंकि इस तरह के दोषारोपण से पहले मनुष्य को यह स्वीकारना होगा कि आज वह जो कुछ भी है जैसा भी है अपने कर्मों की प्रतिकृति है। जीवन सभी को बनने और बिगडने के समान अवसर देता है। कोई अवसर का लाभ उठाकर अपनी जिन्दगी फूलों जैसी बना लेता है तो कोई परिस्थितिजन्य नादानियों में उलझकर अपनी जिन्दगी कांटे जैसी बना बैठताहै। इस प्रसंग पर बचपन में पढी कोर्स की कविता फूल और कांटा सटीक बैठती है। कविता का सार यही है कि सूरज की धूप, चन्द्रमा की चांदनी, ओस की बूंदे, मौसम की मार महल और झोपडी की तरह फूल और कांटे पर एक समान ही पडती है। दोनों की परवरिश एक ही माली के हाथ नीचे एक जैसे परिवेश और समान खाद – पानी के साथ होती है फिर भी एक इतना कर्कश निकलता है कि किसी का वर वसन फाड देता जिससे लोग उसे नफरत भरी नजरों से देखते हैं। जबकि दूसरा उसी परिवेश में पल – बढ कर इतना सुकोमल बन जाता है कि उसके दर्शन मात्र से ही दिल खुश हो जाता है, उसके रंग और खुशबू की सर्वत्र प्रशंसा होती है और वह देवताओं के मस्तक पर शोभा पाता है। हर कोई उससे स्वाभाविक स्नेह करता है।
फूल और कांटे की यह दास्तान दरअसल प्रकृति से आम इन्सान तक की यात्रा है। अपनी जिन्दगी को फूल जैसी कामयाब या कांटों जैसी कंटकाकीर्ण बनाने के लिए कोई और नहीं मनुष्य स्वयं ही जिम्मेदार है। अब न तो राजे – रजवाडे का युग रहा न गरीब – अमीर के भेदभाव वाली सामंती परिपाटी। ऐसे में मूल्यों में चाहे गिरावट आई हो लेकिन सुवाधाओं के साथ अवसर भी बढे हैं। अब वो युग नहीं रहा जब राजा का बेटा ही राजा बनेगा या तरक्की करने का अधिकार केवल ऊंची जात या अमीर घरानों को ही हो। आज उन्नति का आकाश चूमने के अवसर सबके सामने समान रूप से बिखरे पडे हैं। यह बदलाव नहीं तो क्या है। सदियों से दमित और कुचले लोगों की पीठ पर जरा हाथ धरा तो सफलता की दास्तानों कि ठिकाने बदलने लगे। ऊंची नौकरी और ऊंचे ओहदों के एकाधिकारी आसन डगमगाने लगे। प्रतिस्पर्धा बढने लगी तो नियमों को फिर से बदलने की मांग उठने लगी। क्योंकि अब अगडों – पिछडों सब को कबलियत की अदालत में साबित करना पड रहा है कि उनकी उन्नति का उडान की ऊंचाई कितनी है।

इस सप्ताह आए हाई स्कूल और 12 वीं 10+2 के नतीजों में सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों और छात्राओं ने बाजी मारकर एक बार फिर बदलाव की बयार पर स्वीकृति की मोहर लगा यह साबित कर दिया कि अब न तो ऊंची फीस वसूलने वाले प्रायवेट स्कूलों का सफलता पर एकाधिकार रहा और न ही किसी बालिका को अबला बता कर उसे उसकी स्वाभाविक प्रगति से पीछे धकेला जा सकता है। बदलाव की यह बयार सिर्फ यहीं बह रही हो ऐसा नहीं। आईएएस और आईपीएस से लेकर तमाम तरह की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में परीक्षाओं में भी दूरदराज के इलाकों के परीक्षार्थियों ने अव्वल आकर जहां महानगरों की सफलता के साम्रज्य को ध्वस्त किया है वहीं रेहडी वाले, मजदूर , रिक्शा चालक, सब्जी का ठेला लगाने वाले के बेटे – बेटियों की सफलता ने साबित कर दिया कि मनुष्य अपने भाग्य का खुद निर्माता है। अगर अवसर की समानता हो, लक्ष्य की एकाग्रता और परिश्रम की कुशलता तो किसी की लिए कुछ भी असंभव नहीं है।ज ो लोग अवसरों की अनुपलब्धता और भाग्य का रोना रहते हैं उन्हें अपने आसपास बिखरी इन दास्तानों से प्रेरणा गृहण करनी चाहिए। हम फूल बनें या कांटा यह हमारा ऊंचे कुल में जन्म लेना या बडे बाप का बेटा होना नहीं वरन कर्म के प्रति हमारी निष्ठा तय करती है। परिश्रम तो उसमें शामिल है ही। जो इस सांचे में ढल गया उसके लिए जिन्दगी स्वर्ग बन जाती है और जो इस  सबके साथ समायोजन नहीं बैठा पाते हैं उनके पास सिवाय पछतावे के कुछ शेष नहीं रह जाता।

-डॉ. देवेन्द्र जोशी

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