कहीं तो आया सावन झूम के और कहीं सूखा पड़ रहा है…

यह क्या हो रहा है भगवान आपके राज में आपके होते हुए भारत में मानसून आ गया सावन का महीना बिना बरसे चुपचाप सरक रहा है लेकिन हमारे जैसे छोटे शहर में रहने वाले तरस रहे हैं। इधर पानी नहीं बरसने के कारण थोेड़ी सी मौसमी खुशी जो हमारे भाग्य में थी, वह भी नहीं हो सकती है जैसे बेसन प्याज के साथ लिपटकर तेल में भीगने को तत्पर होकर कढ़ाई में छपक छैया करने के लिए इंतजार कर रहा है। चौक चौराहों पर सड़कों के किनारों पर कोयले की सिगड़ी पर भुुनने के लिए नींबू – नमक के साथ भुट्टे भी आसमान पर टुकुर-टुकुर देख रहे हैं कि पानी बरस जाए तो मिलकर खाने वालों के साथ मेघ-मल्हार गाएं परंतु इंतेहा हो गई इंतजार की… गाना पड़ रहा है।

बादल आते हैं परंतु बिना बरसे ही चले जाते जबकि कई बार बिना बदरा के आसमान से झमाझम होनेे लगता है इस तरह के चमत्कार भी दुर्लभ हो गए हैं। भगवान आपने इंद्र को पूरा पोर्टफोलियो नहीं दिया इसलिए अधूरे अधिकार से काम हो रहा है। तुम्हारे यहां अलकापुरी से तो पूरे बादल चलते हैं लेकिन अनियमित पानी वितरण करके निकल लेते हैं ऐसा कैसे चलेगा कुछ दया दृष्टि होती भी है तो चरणामृत की तरह बांट देते हो या प्रसाद की तरह  वितरण होता है। कई भक्तों को भरपूर और किसी को थोड़े से दाने मिलते हैं जैसे पुजारी आरती के बाद भक्तों पर जल चढ़ाते हैं किसी पर टपका किसी पर नहीं टपका फिर भी भक्त हाथ जोड़कर जय-जयकार करते हुए मन ही मन कलयुग आ गया है, कहकर सूखे-सूखे घर चले जाते हैं ।

आपके अधीनस्थ अपना कर्त्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं । कही नदियों में उफान आ रहा है, पहाड़  टूट रहे हैं और कहीं पानी नहीं बरसने के कारण आंखे बरस रही है दिल टूट रहे हैं। मानसून तो कानून की तरह हो गया है संविधान के अनुसार कानून के सामने सब बराबर हैं लेकिन प्रैक्टिकली ऐसा कहीं होता है जैसे देव होते हैं वेसी उसकी पूजा होती है। बड़े आदमी के लिए अलग व्याख्या होती है और बाकी के लिए अलग इसी तरह कहीं तो आया सावन झूम के और कहीं सूखा पड़ रहा है और मजदूर भूखा मर रहा है ।

आजकल मानसून भी मुंह देखकर तिलक लगा रहा है कहीं अधिक पानी के कारण आफत काल हो गया मुंबई दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में प्रत्येक सरकारी योजनाएं पहले लागू होती है इसका शुभारंभ बुलेट ट्रेन की तरह  तेजी से होता है उसी प्रकार आप भी मेट्रो पर मेहरबान हुए हैं। उसके बाद गांव में बाढ़ सारे बंधन तोड़ देती है तब तक कुछ बच जाए तो छोटे शहरों में मानसून मेहरबान होता है।
सरकार को हमेशा अंदेशा रहता है की मेट्रो शहरों में कानून व्यवस्था भंग नहीं होना चाहिए वरना देसी विदेशी मीडिया क्या कहेगा देश की इज्जत का कचरा नहीं कीचड़ हो जाएगा । इसी प्रकार इन शहरों में मानसून भरपूर मेहरबान है । भारत की आत्मा गांव में बसती है तो दूसरा स्थान मानसून के बादल वहां जल प्लावन कर देते हैं मीडिया भी आजकल ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए शहर से गांव की ओर जल्दी दौड़ता है। इसलिए भगवान आपसे प्रार्थना है कि सरकार तो नहीं आप ही बीच के छोटे शहरों यानी कि आज की भाषा में टियर टू टाइप के शहरों को भी पानी-पानी कर दो तब हमें भी लगे कि मानसून आ गया है।

(अशोक व्यास का यह आलेख कपोल – कल्पित है। इसका मकसद स्वस्थ मनोरंजन और मौजूदा हालत पर कटाक्ष करना है, किसी की मानहानि करना नहीं।)

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