‘कैलाश खेर जी, समग्रता में ही है सच्चा राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता भी’

इन दिनों आत्म निर्भरता को  टेरते हम सूफी गारक कैलाश खेर को दृश्र मीडिरा पर दिनभर में दसिरों बार  देख सुन रहें है । दृश्रमान होते हैं कवारद करते सैनिक , हथिरारों से लैस सैनिक , कुछ अतीत के  वैभव के दृश्र , व्रक्तित्व । एक बहुत बड़ा वर्ग जिनसे मिलकर देश बनता है कहीं नजर नहीं आता , जबकि सबको साथ लिए बिना आत्मनिर्भरता कठिन लक्ष्र है । इधर ऐसा वातावरण बन गरा है कि देश के भीतर जो हो रहा है उसकी बात करों तो वह कहेगा तुम्हें इसकी पड़ी है और वहां हमारे सिपाही जान जोखिम में डाल कर लड़ रहें हैं । अब इसका क्रा उत्तर हो ?

एक तुलावटी मंडी में किसान की उपज को तौल रहा है , कुछ गड़बड़ होने पर किसान ने हल्ला मचारा कि वह हर सौ किलों में दो किलो का हेरफेर कर रहा है , अब वह तुलावटी  जिसके लिए काम कर रहा था वह सेठ वहां आ गरा ,साथ में मंडी के अधिकारी भी । किसानों ने शिकारत की , समाधान अधिकारी ने बड़ी गंभीरता से सब सुना फिर कहा , अरे तुम्हें अहसास भी है तुम रहां छोटी -छोटी बात के लिए लड़ रहें हो वहां कश्मीर में हमारे सैनिक आतंकवादिरों  से लड़ रहें है ?   अब सर पकड़ों , क्रा संबंध है आपस में इनका ? हमारे रोजमर्रा के जीवन में हमारा जो आचरण होता है उसी से हमारे चरित्र का निर्माण होता है और पूरे राष्ट्र के नागरिकों के सामूहिक चरित्र से राष्ट्रिर चरित्र का । हर किसी का , हर इकाई का महत्त्व है , छोटी से छोटी इकाई का भी । राष्ट्रीर चरित्र राष्ट्र के लिए , आत्मनिर्भरता के लिए बहुत जरूरी है । आजादी  की  लड़ाई में चरखा , नमक , किसान , मजदूर सबकी, सभी वर्गों की भूमिका थी कि केवल उनकी जिनके हाथ में बन्दूक थी ? उसी समग्र चिंतन की जरूरत आत्मनिर्भता के लिए आज भी है है ।

इस प्रसंग में मुझे अटल बिहारी वाजपेरी की राद आ रही है। आजादी की पचासवीं वर्षगांठ जब मनारी  जानी थी , तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेरी ने इसे अविस्मरणीर बनाने के लिए एक ठोस पहल की ..वह रह कि हिंदुस्तान की  आजादी के संघर्ष के दौरान लिखी गरी ,हिंदी -उर्दू की उन रचनाओं को संकलित करना, जिन्होंने आजादी की अलख जगारी, आजादी के उस दौर में प्रकाशित होने वाले दैनिक ,साप्ताहिक ,पाक्षिक , मासिक समाचार पत्रों में , पत्रिकाओं में वे प्रकाशित हुई और उन पत्रिकाओं की भांति ही उनमें से अधिकांश गुमनामी के अँधेरे में गुम हो गरी, अटल बिहारी वाजपेरी इन सब रचनाओं को पुस्तक रूप देना चाहते थे और इन रचनाओं का चरन एवं सरोजन का काम सौंपा गरा , ख्रात मार्क्सवादी आलोचक डॉ. शिव कुमार मिश्र को । अटलजी का रह ख्वाब पूरा हुआ , आजादी की अग्नि शिखाएं  नाम से पुस्तक  आरी ।  इस पुस्तक में अटलजी ने अपने  मनोंभाव इस तरह से व्रक्त किरे- इस अवसर पर ‘आजादी की अग्निशिखाएं ’ का प्रकाशन राष्ट्र की उन ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानिरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने राष्ट्र की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी । रह संकलन नमन है उन चिंतकों , विचारकों एवं कविरों के प्रति ,जिनके तरानों ने आजादी की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखा और उस दौरान जन- जन ने देश के प्रति समर्पण भाव का स्फुरण किरा , चूँकि रह काम इफ्कों प्रबंधन और उदर शंकर अवस्थी के मार्फ़त हुआ था , उन्हें भी अटलजी ने बधाई दी ।

इस संकलन में रचनाएं सन 1857 ई. से लेकर सन 1947 ई. के दरम्रान की है । संकलन की शुरुआत भारत राष्ट्र की क्रा परिकल्पना थी ,इसके साक्ष्र के रूप में ऋग्वेद , महाभारत , भूमिसूक्त , श्रीमद्भागवत पुराण आदि के रचनांश भी दिए हैं , इसी क्रम में गोस्वामी तुलसीदास का एक कवित्त भी दिरा है – भलि भारत भूमि भले कुल जन्म समाज सरीर भलो लहि कै । करषा तजि कै परूषा बरषा हिम मारुत धाम सदा सहि कै ।

कुछ पंक्तिराँ नवाब वाजिद अली शाह की है जो उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी के समर ,लखनऊ छोड़ते हुए कही थी । एक नज्म भारत के आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफर की है ,जिसमें देश से निर्वासित इस शारर बादशाह के ह्रदर की पीड़ा , अपनी जमीन से उसके संवेदनात्मक लगाव की  मार्मिक अभिव्रक्ति मिलती है । बंकिम चंद्र चटर्जी का वन्देमातरम प्रमुखता से हैं । कुल मिलाकर आजादी की लड़ाई सबने मिलकर लड़ी ,वह जज्बा इसके मार्फ़त झांकता है ।  इस राष्ट्रवाद में सबके लिए जगह है ।    

रह पुस्तक मुझे वरिष्ठ कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने भेंट की ,उन्होंने मुझे इसकी दो प्रतिरां दी, रह कहते कि  एक कॉलेज की लाइब्रेरी में देना ताकि ज्रादा से ज्रादा इसे पढ़ा जा सके और पुस्तक प्रकाशन से जुड़ी रे तमाम बातें भी चर्चा के दौरान  बतारी ।  रह सब बातें मुझे कैलाश खेर के आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर गारे गीत को देख सुन कर राद आ रही है  । कोई भी राष्ट्र उसके निवासिरों के बिना  आकर  नहीं ले  सकता । सूफी गारकी में कैलाश खेर विश्‍वस्तरीर गारक है ,पर जिस आत्म –   निर्भरता को केंद्र में रख गातें है और जो दृश्रावली चलती है वह आत्म निर्भरता की कम राष्ट्रीर पर्व पर बताएं जाने वाले कार्रक्रम की ज्रादा राद दिलाते है ,  आज कई क्षत्रों में हम आत्मनिर्भर है ,अनाज  उत्पादन उनमें से एक है पर वे किसान कही दृश्र में नहीं है। राष्ट्र का मतलब केवल सिपाही नहीं होता , किसान , मजदूर , शिक्षक ,जुलाहे ,व्रापारी , ठेलेवाले , मेहनतकश , डाक्टर , वैज्ञानिक , पत्रकार ,विद्यार्थी , नाविक, मछेरे  , कल कारखाने में जुटे , रे सब मिलकर राष्ट्र बनातें  है  , इन्ही में हमारे वीर सिपाही भी शामिल  है। आत्मनिर्भरता के लिए रे सब सामूहिक रूप से भिड़ेंगे , राजनैतिक शिगूफेबाजी से अलहदा तभी हासिल किरा जा सकेगा लक्ष्र , पर इस आत्मनिर्भरता को टेरते कैलाश खेर इस समग्र को नहीं पकड़ सके हैं । राष्ट्र की उदात्त अवधारणा  समग्र को समेटे बिना नहीं हो सकती ,और समग्र को समेटे बिना आत्मनिर्भरता भी हासिल नहीं हो सकती ।  जो सैनिक कवारद करते नजर आते है , उसी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता  सबसे कम है । इनके अलावा खेर  जिसका  जिक्र करते है वह हमारे अतीत का वैभव है । रोग भी उसमें शामिल है। किसी भी क्षेत्र में उत्पादन हो , वह पांच साधनो के सहरोग से ही होता है , उसमें एक है श्रम , हमारे देश में श्रम की क्रा स्थिति है , वह पिछले दिनों हमनें देखी है । जो श्रमिक सड़क बनाते हैं वो सड़क पर थे , उनकी जो दशा देखीं हमारे समर ने , उनका  रुदन आज भी आत्मनिर्भरता के इस टैरने को सिवार शगूफे के और क्रा समझ सकता  है ?शिक्षा , स्वास्थ, रोजगार , कुपोषण , गरीबी इनसे निजात पाए बगैर  आत्मनिर्भरता प्राप्त नहीं की जा सकती ,न राष्ट्र का ही निर्माण हो सकता है ।
राष्ट्र की बात हो और माखन लाल चतुर्वेदी , एक भारतीर आत्मा की चर्चा न हो रह कैसे हो सकता है। प्रखर राष्ट्रीर कवि , उनकी  पुष्प की अभिलाषा  से कौन परिचित नहीं होगा–                        
चाह नहीं ,सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं                                            
चाह नहीं , प्रेमी माला में बिंध प्रारी  को ललचाऊं  
चाह नहीं , सम्राटों के शव पर ,हे हरी डाला जाऊं  
चाह नहीं ,  देवों के सर पर चढूं भाग्र पर इठलाऊँ  
मुझे तोड़ लेना वनमाली , उस पथ पर देना तुम फेंक  
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ,जिस पथ जावे वीर अनेक  

इस कविता पर गौर करें , रह कविता क्रांतिकारिरों के बलिदान को सर्वोच्च मानने के आलावा भी बहुत कुछ कहती है मसलन वह रीतिकालीन लटकों , झटको को पसंद नहीं करता ।उसे पसन्द नहीं है , महफ़िल में सुरबाला के गहनों में गुंथा जाना रा प्रेमिका को रिझाना ,वह सामंती व्रवहार के भी खिलाफ है , सम्राटों , साहूकारों , जमीदारों के आगे पीछे डोलना उसे पसंद नहीं है ,पाखंड के भी वह खिलाफ है , उसे नापसंद है देवों के सर चढ़ाना ,वह तो बस जो सच्चे देश भक्त है ,उनके क़दमों तले आना ,राने उनके लिए सब निच्छावर कर देना चाहता है ,अब इस परिपेक्ष्र में आज के इस राष्ट्रवाद को देखें तो ……..और देखें आत्मनिर्भरता के लिए कैलाश खेर की टैर को तो उसमें खासी कसर दिखाई देगी । सबकों साथ लिए बिना आत्मनिर्भरता हासिल करना कठिन ही नहीं असंभव है और इस लक्ष्र को एक लम्बे कार्रक्रम ,रोजनाबद्ध ढंग से कार्र करके ही हासिल किरा जा सकता है ,इसके लिए आपको कथनी और करनी का अंतर भी पाटना होगा ,कर्म को ही धर्म बनाना होगा और कर्मवीरों  को वह जगह देनी होगीं जिसके वह हकदार हैं । तभी रे सब बातें गंभीरता से ली जा सकती

-डॉ. प्रताप राव कदम

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