कोरोना काल में भी सतत शिक्षा की बात कहीं मजाक़ तो नहीं है…

कोरोना संकट को लेकर आज, कोई भी कुछ भी कहने में असमर्थ है। सारी दुनिया की सांसें अटकी हुई हैं। आफत की इस घड़ी में संघर्षों और संकटों के अपने ही शायर ताज भोपाली साहब खूब याद आते हैं, जिन्होंने कहा था कि पीछे बंधे हैं हाथ, मगर शर्त है सफ़र। किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे। मनुष्य का जीवन सचमुच में ही आज संकट में है। लेकिन,हर व्यक्ति को दूसरों से उम्मीदें और शिकायतें बहुत हैं, यहाँ तक कि शक़-शुबहा भी चरम सीमा पर हो गये हैं। हर आदमी को लग रहा है कि वही ठगा जा रहा है,और दूसरा उसे ठग रहा है। जबकि कमो-बेश परेशान सब हैं। काँटे सबके पांवों में बराबरी से गड़े हैं।

कई चीजों के साथ,सबसे ज्यादा प्रभावित ‘शिक्षा’ होगी । सारे स्तरों, शोध से लगाकर प्राथमिक या पूर्व प्राथमिक स्तर की शिक्षा भी बहुत बुरी तरह से इस संकट काल में प्रभावित हुई है ।इसके असर बहुत दूर तक, या लम्बे काल तक महसूस होते रहेंगे। स्कूल कालेज लग नहीं सकते,पढाई एक साथ बैठकर हो नहीं सकती, तो मांग उठ खड़ी हुई है कि नो-क्लास,नो-फीस। यदि ऐसा होता है तो वे शिक्षक या गैर-शिक्षक अपना परिवार कैसे पालेंगे जिनका वेतन इसी फीस से आता है। यही बात मानते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने नो-क्लास,नो-फीस वाली मांग हाल ही में खारिज कर दी है।तर्क करते समय,जब हम इस बात पर सहमत हो जाते हैं कि हमें एक दूसरे से असहमत ही होना है, तो हर बात पर कोई न कोई तर्क देकर हम विवाद को बढ़ा सकते हैं,पर सच तो यह है कि आज संकट में सब हैं। जमीनी हकीकत सबको समझना है। शिक्षा में सातत्य (कंटीन्युईटी) बना रहे, इसलिये ऑनलाइन शिक्षा की बात आई,लेकिन निर्धन परिवारों में स्मार्ट-फोन या एन्ड्रॉइड मोबाईल या डाटा के सवाल पर गाड़ी अटक गई । एक बात चल पड़ी कि गरीब परिवार आटा लायें या ‘डाटा‘।

विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि एक निश्‍चित आयु तक बच्चों को मोबाईल स्क्रीन के सामने रखना उनके स्वास्थ्य के लिये खतरनाक है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन की इस सिफारिश पर देश के बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने औपचारिक रुप से इस पर बन्दिश लगा दी। फिर भी कंटीन्युईटि की चाह में इस तरह की शिक्षा को 30 से 45  मिनट,जो आदेशों की स्वीकृत समय सीमा के भीतर ही आती थी, शिक्षा के लिये रखी गई,लेकिन आटा, डाटा, स्मार्ट्फ़ोन्स या तकनीकी कारणों से यह भी हो न सका ।
अब मध्यप्रदेश में अगले शिक्षा सत्र के लिए अपना घर-अपना विद्यालय योजना लाई गयी है, जिसमें बच्चे अपने ही घरों में पढेंगे,पालक उनकी मदद करेंगे और स्कूली शिक्षक प्रतिदिन पांच बच्चों के घर जाकर बच्चों के पालकों को प्रेरित करेंगे।
इसी महीने (जुलाई’2020) की 3 तारीख को मध्यप्रदेश के राज्य शिक्षा केन्द्र से निकले इस योजना के आदेश को पढ़कर निश्‍चित रूप से कहा जा सकता है कि जिसने भी यह परिपत्र बनाया है,वह भाषा का विद्वान है।शिक्षा को लेकर कल्पना शक्ति की  भी  यह  पराकाष्ठा है। लेकिन, जमीनी हक़ीक़त भी तो अपनी जगह ही रहेगी न ।

मध्यप्रदेश में कुल बीस हजार से ज्यादा स्कूल हैं। इनमें से लगभग 4500 स्कूलों में एक भी नियमित शिक्षक नहीं है। थोडे दिनों पहले ही सेवानिवृत्त हुये मुख्य सचिव  एस आर मोहन्ती ने नौकरी में रहते हुये एक औपचारिक बैठक में इस समस्या पर चर्चा करते हुये कहा था कि प्रदेश के 55 प्रतिशत शिक्षक नियमित रूप से अपने काम पर नहीं जाते हैं। मोहन्ती साहब ने यह बात कहने के पहले एक भरोसेमंद सर्वेक्षण की रिपोर्ट को पढ़ा था। हुआ यह था कि खरगोन  जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर, एक गांव देवली में, एक बड़े सरकारी अफसर को दयाल सिंह नाम का एक व्यक्ति, जिसने आठवीं कक्षा के बाद पढाई छोड़ दी थी, स्कूल में पढ़ाते मिला था। जब उससे आगे पूछताछ की गई  तो  पाया गया कि उस स्कूल में पदस्थ दो शिक्षकों रामेश्‍वर रावत और झब्बर सिंह ने उसे 4000 रुपये महीने पर रख लिया था, और वे जब मर्जी होती थी तब स्कूल आते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में राज्य सरकारों को निर्देशित किया था कि शिक्षा का काम बाधित न हो, इसलिये शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय कामों में न लगाया जाये। मध्य प्रदेश की सरकार ने एक बार 1995 में, और एक बार  2005 में ऐसे ही आदेश भी निकाल दिये हैं। इन आदेशों में किसी भी तरह के परिवर्तन की  खबर आज तक तो नहीं है। लेकिन बावजूद इसके, इसी विधानसभा में दस शिक्षक नव-निर्वाचित विधायकों के साथ लिपिकीय कामों के लिये लगा दिये गये हैं।कम से कम पंद्रह गैर-शिक्षकीय कामों की सूची आज भी प्रदेश के हर शिक्षक के पास है। इसमें अपन वह कार्य आज नहीं गिनते, जिसमें सिंहस्थ के दौरान मेला अधिकारी साहब ने शिक्षकों को उज्जैन और ओम्कारेश्‍वर में जूतों की चौकीदारी में लगाया था।

सरकारी व्यवस्था में एक एन्युअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट बनती है। अभी जो ताजी रिपोर्ट  आई है, उसमें बताया गया है कि जैसे 50 प्रतिशत  से ज्यादा शिक्षक  काम  पर नहीं आते हैं, वैसे ही हाजिरी  रजिस्टर में दर्ज आधे से ज्यादा बच्चे  भी  स्कूल  नहीं आते हैं। इसी एएसआरई  में कहा गया है कि पढ़ते-पढ़ते पांचवीं  तक पहुंच चुके कई बच्चों को एकदम प्राथमिक स्तर की किताबें पढ्ना नहीं आता है। चूँकि अब कोई भी जानकारी किसी से भी छुप  नहीं सकती, इसलिये जिसे भी पुष्टि करनी हो वह एएसआरई’ खोज लें।

अपने वर्तमान मुख्यमंत्रीजी जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे,तब उन्होंने एक बड़ी अच्छी बात कही थी कि वे प्रदेश से कर्मी कल्चर (शिक्षा कर्मी,स्वास्थ्य कर्मी आदि) समाप्त कर  देंगे,ताकि जिम्मेदारियां बँटे नहीं,गल न जायें (डाई- ल्यूट न हों) । लेकिन आज तक वे खुद चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं व बीच में एक निज़ाम और आकर चला गया लेकिन चीजें वहीं हैं।

कोरोना-काल में शिक्षा सतत जारी रहे, अपने बच्चे पढते रहें, हमारा भविष्य सुरक्षित रहे, यह सब बहुत अच्छी बातें  हैं। 3 जुलाई,2020 को निकला 853 नम्बर का आदेश भी अच्छा है, लेकिन जमीन की हक़ीक़त हम नहीं तो कौन देखेगा। आखिर वह आदेश कैसे क्रियान्वित होगा ?

-कमलेश पारे

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY