कोरोना की ‘क्रोनोलॉजी’ में ‘पॉलिटिकल-वायरस’ की ‘खलनायकी’

कोविड-19 की ‘क्रोनोलॉजी’ के इन संकेतों को अनदेखा करना मुश्किल है कि कोरोना की महामारी पर मोदी सरकार की राजनीति भारी पड़ी है। राजनीतिक कारणों से कोरोना से निपटने का एजेंडा काफी नीचे सरक गया था। भारत में कोरोना वायरस का अलार्म जनवरी के शुरूआत में ही बज गया था, लेकिन राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते मौत और मातम के पैगाम को जान-बूझकर अनसुना कर दिया गया। इस वजह से भारत में लॉकडाउन के कदम विलम्ब से उठाए गए। और अब दो-ढाई महिने के लॉकडाउन के बाद स्थिति नियंत्रण से बाहर नजर आ रही है। लॉकडाउन की समीक्षा ‘सब ठीक है’ जैसे सरकारी दावों को खारिज करती प्रतीत होती हैं। बीस लाख करोड़ के पैकेज में गरीब की रोटी और रोजगार की खुशियां दूर की कौड़ी लगती हैं। सत्ता की सख्तियों के बावजूद राजनीतिक हलकों में वो खामियां घनीभूत होने लगी हैं, जिनकी अनदेखी प्रवासी मजदूरों का प्रलाप और प्रकोप का सबब बनी है।
मोदी सरकार पर संवादहीनता के आरोप पुराने हैं। कोरोना को लेकर मोदी सरकार पर आरोप लगा है कि उसने वैज्ञानिकों के प्रोटोकोल को हलका करके लॉकडाउन लागू किया। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के रिकॉर्ड्स कहते हैं कि केन्द्र ने लॉकडाउन के मामलों में वैज्ञानिकों की राय को अनसुना कर दिया था। वैज्ञानिक, समाज और सिविल सोसायटी के सहयोग से सेल्फ क्वारंटीन और सेल्फ मॉनीटरिंग की पद्धति के पक्षधर थे। मोदी सरकार ने एक महिने तक इस सलाह की अनदेखी करते हुए 24 मार्च को चार घंटे की अल्प सूचना पर लॉकडाउन घोषित कर दिया था। आकस्मिक तालाबंदी के कारण करोड़ों मजदूरों की रोजी-रोटी के सवाल सुलगने लगे थे। टेस्टिंग की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण भी गफलत की स्थितियां बनी। लॉकडाउन के पहले एक सप्ताह का वक्त मिल जाता तो प्रवासी मजदूरों की फजीहत नहीं होती…।
गौरतलब है कि चीन में कोरोना की दहशत 2 दिसम्बर 2019 से सामने आने लगी थी। इसके एक महिने की भीतर त्रिचुर (केरल) में भारत का पहला कोरोना मरीज सामने आया था। केरल सरकार ने तुरंत ऐहतियाती कदम उठाते हुए 400 लोगों को क्वारेंटाइन कर दिया था। तीस जनवरी 2020 को विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस के संक्रमण के मद्देनजर अंतर्राष्ट्रीय आपात स्थिति की घोषणा कर दी थी। इसके पहले दुनिया में पांच बार ऐसी घोषणाएं हुईं थीं। लॉकडाउन के मामले में मोदी सरकार की हड़बड़ी समझ से परे है, जबकि मोदी कोरोना की गंभीरता से भलीभांति अवगत थे। यह इससे जाहिर है कि कोरोना की वजह से मोदी ने इस साल 4 मार्च को होली नहीं खेली थी। सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व जताने के लिए मोदी ने ट्वीट किया था- ‘दुनियाभर के विशेषज्ञों ने कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए बढ़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने वाले कार्यक्रमों को कम करने की सलाह दी है। इसलिए इस साल मैंने किसी भी होली मिलन समारोह में नहीं जाने का फैसला किया है’। मोदी ने जब यह ट्वीट किया था, तब भारत में 23 कोरोना के मरीज सामने आ चुके थे। दुनिया भी कोरोना की खबरों से सरगर्म थी।
भले ही चार फरवरी को भारत ने चीन आने-जाने पर रोक लगा दी हो, लेकिन देश में कोरोना के खिलाफ सरकार कहीं भी चाक-चौबंद नजर नहीं आ रही थी। कोरोना मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में काफी नीचे नजर आ रहा था। सात फरवरी में ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान होने वाला था और शाहीन बाग का आंदोलन पूरे परवान पर था। जबकि दुनिया में कोरोना का आतंक कहर बन रहा था, उसी दरम्यान 13 फरवरी को स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का अधिकृत बयान था कि- ‘भारत में कोरोना से घबराने की जरूरत नहीं हैं’। स्वास्थ्य मंत्री का बयान मोदी सरकार की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसे फरवरी में अंजाम दिया जाना था। 24 फरवरी 2020 को अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में आयोजित ‘नमस्ते-ट्रम्प’ कार्यक्रम इसकी बानगी है कि किस प्रकार एक लाख लोगों ने इकट्ठा होकर सोशल डिस्टेंसिंग का मखौल उड़ाया था। कोरोना के प्रति दुर्लक्ष्य की पराकाष्ठा का उदाहरण पीपीई उपकरण का निर्यात भी है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दुनिया में पीपीई उपकरणों की कमी के बारे में आगाह करने के बावजूद मोदी सरकार ने 19 मार्च तक इनका निर्यात जारी रखा। इस देरी का सबब मोदी सरकार की नीतियों और नीयत के बारे में कई सवाल खड़े करता है। मार्च के तीसरे सप्ताह तक मप्र में कांग्रेस सरकार गिराने का राजनीतिक खेल चलता रहा। इस दौरान भाजपा ने कोरोना को लेकर विधानसभा स्थगित करने पर कांग्रेस की जबरदस्त खिल्ली उड़ाई थी।
यह क्रोनोलॉजी कोरोना के प्रति मोदी सरकार की गंभीरता और संवेदनशीलता का शपथ-पत्र है, जिस पर लोग आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं। दिलचस्प है कि 28 फरवरी को ही राहुल गांधी ने कोरोना और उससे अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की ओर इशारा करते हुए मोदी सरकार को आगाह भी कर दिया था। लेकिन मोदी की आदत है कि वो किसी की बात कहां सुनते हैं…

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