कोरोना को लेकर ऐन परीक्षा की घड़ी में लड़खड़ाते हम

अभी कुछ दिनों पहले तक हम यह मान रहे थे कि कोरोना का हमला सिर्फ हम शहरवासियों पर ही हो रहा है, और हमारे गांव इससे बचे हुये हैं। यह भरोसा इसलिये था कि देश के पहले एक तिहाई कोरोना प्रकरण, पहले नगरों और महानगरों से ही आये थे। लेकिन, अब गांवों से भी खतरे की खूब खबरें आने लगी हैं। पहले से कमाई और पढ़ाई के मामले में जमकर पिट रहे अपने गांव, अब दवाई के मामले में भी पिटना चालू हो जायेंगे।

यह हफ्ता अभी शुरु ही हुआ है, और अचानक बड़वानी से 30 कोरोना प्रभावित लोगों की खबर आ गई है। ये पूरे के पूरे  30 आसपास के गांवों के हैं। होशंगाबाद के सिवनी-मालवा या हरदा के रहटगांव,निमाचा, सिराली आदि गांवों से भी बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों की सूचना की पुष्टि वहां के डाक्टरों ने कर दी है। पड़ौसी जिले रायसेन के गांवों से बड़ी मात्रा में प्रभावितों की आ रही खबरें परेशान कर ही रही हैं।  कमोबेश हर जिले और हर तहसील से कोरोना प्रभावित मरीजों को जिला अस्पतालों और महानगरों के अस्पतालों में भेजा जा रहा है। इनमें से बहुत बड़ी मात्रा में लोग ग्रामीण हैं। अब यहाँ प्रश्‍न यह उठता है कि क्या हम गांव, तहसील या जिलों के स्तर पर इस विपदा से निपटने की  स्थिति में हैं ? यदि वहां से सारे मरीज शहरों में आते हैं,जैसा कि हो रहा है, तो यहाँ क्या होगा ?एक विश्‍वसनीय आँकड़े के अनुसार यदि ग्रामीण स्तर पर कुल जनसंख्या के सिर्फ 0.03 प्रतिशत लोग भी इस विपत्ति की गिरफ्त में आ गये, तो अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ जायेंगे।

अपनी सरकार ने ही माना था कि भारत में अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या 14 लाख के आसपास है । इनमें से 8 लाख से कुछ ज्यादा बिस्तर निजी अस्पतालों में हैं, व 5 लाख से थोडे ज्यादा बिस्तर सरकारी अस्पतालों में हैं। सरकार ने ही यह भी बताया था कि निजी अस्पतालों के 70 प्रतिशत और सरकारी अस्पतालों के 50 प्रतिशत बिस्तर ही अभी काम आ रहे हैं,या काम आने लायक हैं। इस विपत्ति को लेकर आज हम देश के स्तर पर अपनी सारी तैयारी की बात करें, तो पायेंगे कि ऐन परीक्षा की घड़ी आने के पहले ही हम बहुत कमजोर दिख रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार के अन्तर्गत हमारा संविधान हमें यह गारंटी देता है कि अपने प्रत्येक नागरिक को  आवश्यक शारीरिक व मानसिक  स्वास्थ्य सेवायें ‘राज्य’ नागरिकों  के अधिकार के रूप में उपलब्ध करायेगा । इसी के तहत, स्वास्थ्य सेवाओं के ‘सर्वव्यापीकरण’ के लिये इस विषय को ‘मिशन-मोड’ में लिया जाकर, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन बना था।

इसमें शुरुवाती तौर पर 53000 करोड़ रुपये का प्रावधान था। आपको याद है न कि यह वही मिशन है, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की एक ही सरकार में, एक ही बार में, एक हजार करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार पकड़ा गया था। मैं मध्यप्रदेश में रहता हूँ, और कच्ची-पक्की खबरों में यहाँ भी बड़ी मात्रा में बह गये रुपये की मात्रा लगभग इतनी ही बतायी गयी थी। लेकिन, दो-तीन डायरेक्टरों को नौकरी से निकाल कर हम बाक़ी चीजें भूल गये। क्योंकि, मनोरंजन के मुद्दे और भी थे।  स्वास्थ्य के  ‘सर्वव्यापीकरण’ के साथ ही आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर भी खूब रूपया बहा था। लेकिन सरकारें बनाने और गिराने के मौसम में कालीनों के नीचे कौन देखे। फिर भी संकल्प पत्रों और घोषणा पत्रों में तैयारियों के दावे तो हुये ही थे। तैयारियों के तमाम दावों के बाद भी, सच तो यह है कि आज हम आपदा के आने पर गांवों के स्तर पर उससे निपटने के लिये बिलकुल तैयार नहीं हैं।
भारत में अभी भी मोटे तौर पर 65 प्रतिशत के आसपास लोग गांवों में रहते हैं, जबकि देश में उपलब्ध कुल अस्पताली बिस्तरों की संख्या का 35 प्रतिशत से भी कम वहां है। ये बातें भारत की एक प्रतिष्ठित पत्रिका के डेटा इंटेलिजेंस युनिट ने अपने लिये बनाये नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाईल के लिये निकाली थी। पूरे भारत की बात करें तो औसतन एक लाख आबादी पर दो से दो सौ तक अस्पताली बिस्तर हैं। कहीँ ज्यादा तो कहीँ बहुत कम । अपने देश में स्वास्थ्य को लेकर तीन स्तर पर काम होता है। स्वास्थ्य उपकेन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र । सरकारें खुद यह स्वीकार कर चुकी हैं कि देश के सभी स्वास्थ्य उपकेन्द्रों पर कर्मचारियों की 66 प्रतिशत से ज्यादा कमी है। देश के दो हजार से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक भी डाक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य को लेकर अपने ही देश में बने मानक के तहत जितने डाक्टर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर चाहिये उससे आधे डाक्टर हैं और कहीँ कहीँ तो एक ही डाक्टर से काम चल रहा है।
जो स्थिति डाक्टरों की है,उससे बदतर स्थिति नर्सों,़ फार्मासिस्टों, लेबोरेटरी टेक्नीशियनों या अन्य अर्ध-चिकित्सा कर्मचारियों की है।

डाक्टरों या कर्मचारियों की काम पर हाजिरी पर न कोई चिंता करता है, और न कोई नियन्त्रण की व्यवस्था है । कई अस्पताल तो ऐसे भी हैं, जहां यदि पानी है तो बिजली नहीं है और बिजली है, तो पानी नहीं है। दवाओं की खरीदी चूंकि केंद्रीय स्तर पर होती है, इसलिये जरुरी गैर-जरूरी का निर्णय स्थानीय नहीं,बड़े साहबों की मर्जी और तय कमीशन पर होता है। बातें बहुत हैं। दुनिया के 57 देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक सर्वेक्षण हुआ था। उसमें भारत 52 वें नम्बर पर रहा था। यानी हम नेपाल और श्रीलंका से भी पीछे  थे। बजट को लेकर सरकारों ने अब ज्यादा रूपया सर्वोच्च स्वास्थ्य सेवाओं (टरशरी) को देना शुरु किया है। लेकिन अभी भी चल रहे कोरोना महा संकट में प्रदेश के दो सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थानों इन्दौर के एम वाय  अस्पताल और भोपाल के हमीदिया अस्पताल का इससे निपटने में क्या योगदान रहा है इसे कोई सिर्फ खुली और खोजी आंख से देख भर ले।
चूंकि खबरें लेने-देने या सरकार चलाने-गिराने वाले लोगों को इस चुनौती में मजा, मनोरंजन या मतलब नहीं दिख रहा है, इसलिये सब चुप हैं। कमाई,पढ़ाई और दवाई से हम पिट रहे हैं, इसलिये हम तो इस पर बात करें।  शायद ईको होकर कुछ तो अपनी तरफ आये।

-कमलेश पारे

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