कोरोना-भय से मुक्त विस्तारित होता ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’

कोरोना के इस डरावने समय में किसी किस्म के प्रतिकूल या निष्क्रिय बने रहने के दुष्प्रभाव के बिना ठेठ हिंदी का ठाठ अपनी रचनात्मक गति से निर्बाध चलता रहा। पिछले लाकडाउन के कुछ महीनों में इस ठाठ के वैभव को विस्तारित करने के काम कुछ घरों की राइटिंग टेबल पर पूरे हुए या नई लेखन-उद्यमिता ने अपनी रफ्तार पकड़ी। इनमें से कई काम तो हिंदी की ज्ञान-सम्पदा को प्रामाणिकता के साथ आगे बढाने वाले हुए। हालांकि इसे मैं चित्रगुप्त महाराज (सबका लेखा-जोखा रखने वाला) की तरह नहीं लिख रहा हूँ। जिनका जिक्र आगे आएगा, उन सभी से गाहे-बगाहे उनकी नई रचनाशीलता पर थोड़ी बहुत गंभीर-अगंभीर बतकही होती रही हैं।

हिंदी के प्रखर आलोचक और कला मर्मज्ञ ज्योतिष जोशी ने इसी लाकडाउन के दौरान दो बड़े काम सम्पन्न किए। गहन रुचि लेकर तैयार हुई उनकी नई पुस्तक तुलसीदास का स्वप्न और लोक, विशेषकर, रामचरित मानस को केंद्र में रखकर तुलसीदास के ऐतिहासिक अवदान के पुनरावलोकन का प्रयास है। यह उस स्वप्न का अवलोकन है जिसे तुलसीदास ने देखा और गृहस्थ जीवन में ही जीवनमुक्ति की गंगा बहाई। तुलसीदास का अपने समय में विपरीत स्थितियों का
सामना कर सनातन मूल्यों को बचाने का संघर्ष हो या भारतीय संस्कृति की सर्वमयता को उसके विभिन्न उपादानों के साथ पुनर्स्थापित करने का ऐतिहासिक काम हो, परिवार और सामाजिक मूल्यों की व्यवस्था हो या विभिन्न संस्कृतियों तथा मतवादों के बीच समरसता लाने का कठिन दायित्व हो, पुस्तक में यह देखने की चेष्टा है कि तुलसीदास ने पूरी शक्ति से अपने लोकनायक की छवि को सिद्ध करते हुए असम्भव को सम्भव किया।

इस महत्वपूर्ण काम के साथ ही ज्योतिष जोशी ने आधुनिक कला आंदोलन नामक पुस्तक का लेखन भी सम्पन्न किया। यद्यपि यह कला इतिहास ही है लेकिन इसे ऐसे लिखा गया है कि यह सहज सम्प्रेष्य हो सके। यह काम मुख्य रूप से पश्‍चिम के कला आंदोलनों पर केंद्रित है जिसका एक हिस्सा भारतीय कला की आधुनिकता पर है। लगभग साढ़े चार सौ वर्षों की कलायात्रा को समेटती यह पुस्तक रेनेसां यानी पुनर्जागरण काल से शुरू होकर समकालीन कला के प्रकाश में आने तक के समय को लेकर चलती है। इस पूरी यात्रा में आंदोलनों के जन्म के कारण, उनकी प्रवृत्तियों तथा विकास क्रम को रेखांकित करते हुए  प्रमुख कलाकारों की विशेष चर्चा की गई है।

कोलकाता में द लिटिल थेस्पियन (नाट्य ग्रुप) की निर्देशिका उमा झुनझुनवाला कविताएं भी लिखती हैं और नाटक भी। इसी लाकडाउन में उन्होंने स्त्री अस्मिता पर केंद्रित नाटक ’चौखट’ लगभग पूरा लिख लिया है। लगभग इसलिए कि वे उसके अंत पर ठिठकी हैं। वे कहती हैं कि नाटक का अंत मुझसे समय मांग रहा है। अगर सामान्य दिन होते तो सामुहिक रीडिंग या थोड़ी रिहर्सल से अंत समझ आ सकता था। यह नाटक एक रूढ़िगत परिवार में पली-बढ़ी लड़की की आंकाक्षाओं, अनपेक्षित परिस्थितियों और उसके जीवन के इर्द-गिर्द बुना हुआ है। उस पर आदर्शवादिता हावी रहती है लेकिन व्यवहारिक होना उसकी नियति है।

इन दिनों ’समालोचन’ वेब पत्रिका में ’उस्ताद के किस्से, मेरे हिस्से’ शीर्षक से एक सीरीज चित्रकार विवेक टेंबे लिख रहे हैं। यह लब्ध प्रतिष्ठित चित्रकार और कला-चिंतक ज. स्वामीनाथन पर है। इसमें मध्यप्रदेश आने से पहले के स्वामी को जाना जा सकता है। यह सीरीज भी पुस्तक में आएगी। चित्रकार अखिलेश भी आजकल ज. स्वामीनाथन पर काम कर रहे हैं। हालांकि कुछ समय पूर्व वरिष्ठ कला मर्मज्ञ प्रयाग शुक्ल ने रजा फाउंडेशन के लिए स्वामीनाथन: एक जीवनी लिखी है, जो प्रकाशित भी हो गई है। लेकिन अखिलेश इसे गांधी की ’हिन्द स्वराज’ की तर्ज पर लिख रहे हैं। इसमें पाठक और संपादक के बीच सवाल-जवाब रहेंगे। क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर इसमें नहीं होगा। स्वामी को उर्दू शायरी खासी पसन्द थी। वे जिगर मुरादाबादी के प्रशंसक थे। लिखी जा रही इस पुस्तक में यह वाकया बेहद दिलचस्प है– भोपाल में लगे शिल्प ’शाहीन’ का लोकार्पण करने हुसेन को आमंत्रित किया गया। उस दिन खाना खाते हुए दोनों चित्रकार सवाल-जवाब की शैली में शेर सुनाते रहे। स्वामी ने कहा- ’क्या चीज थी, क्या चीज थी, जालिम की नजर भी / दिल भी उठकर बैठ गया, जख्म जिगर भी।

तब हुसेन बोले- वही है इक निगाहेबाज, लेकिन अपने मौके पर / कभी नश्तर, कभी नाविक, कभी तलवार होती है।

काला पहाड़, नरक मसीहा, हलाला और सुर बंजारन जैसे उपन्यास के लेखक भगवानदास मोरवाल ने इस लाकडाउन में एक उपन्यास पूरा किया। इसमें फ़िरोज़ शाह तुगलक के समय इस्लाम धर्म क़बूल करने वाले मेव ख़ानज़ादों के वंशज समरपाल अर्थात बहादुर नाहर खां के सोलहवीं सदी के शाहे-मेवात यानि हसन खां मेवाती का कथा परिवेश है। उपन्यास में बाबर के भारत में आने से लेकर ब्रज के कवि अब्दुर्रहीम ख़ानेखां का वृत्तांत तो है ही, बल्कि मेवात के उन राजनैतिक और सामाजिक अनदेखे पक्षों को भी उद्घाटित किया गया है, जिनका इतिहास में प्रमुखता से उल्लेख नहीं किया जाता है।

हिंदी प्रदेश के बहुतेरे लोग तवायफ और देह व्यापार से संबद्ध महिलाओं में कोई भेद ही नहीं करते। आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले भी जो सामंती समाज तवायफों के नाज-नखरे उठाता था, कोठों पर जाकर अपनी कद्रदानी को पेश करता था, वह समाज भी इन तवायफों को अपनी रानी या पत्नी नहीं बनाता था। बावजूद इसके कि धन और शान-ओ-शौकत के मुआमले में किसी रियासत के राजा या नवाब की तरह तवायफें रहती थीं। विशुद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कला के माथे को साफ करने/रखने में गौहर जान, जानकीबाई, बड़ी मलका जान, जोहराबाई, रसूलन बाई, केसरबाई, विद्याधरी आदि तवायफों ने क्या योगदान किया है, इसको हिंदी का साहित्यिक समाज तक भुला चुका है। इसी पर युवा आलोचक पंकज पाराशर इन दिनों उल्लेखनीय काम कर रहे हैं।इस विषय पर वे एक शोधपरक पुस्तक लिख रहे हैं। जिसके पहले अध्याय में हिंदी लोकवृत्त और संगीत पर विवेचना होगी, उसके बाद तफसील से इन तवायफों के जीवन और संगीत की साधना पर विमर्श होगा।

’कोठागोई’ और मनोहरश्याम जोशी के संस्मरणों पर लिखी ’पालतू बोहेमियन’ के लेखक प्रभात रंजन इस दौर में वर्ष 1990 के दशक पर केंद्रित एक राजनीतिक उपन्यास लिख रहे हैं। मंडल, कमंडल और भूमण्डल से प्रभावित जीवन में यह एक कस्बे के राजनीतिक बदलावों को लेकर है। जिसमें एक पहलवान और एक साध्वी के गायब हो जाने से हलचल मच जाती है।  आलोचना में ‘देवीशंकर अवस्थी’ से सम्मानित मृत्युंजय पांडेय के रेणु के प्रति संवेदना और अध्ययन का लगाव है ‘रेणु : कहानी का हिरामन’ नामक पुस्तक, जो उन्होंने लाकडाउन में पूरी की और फिलहाल प्रेस में है। इसके अलावा इन्होंने केदारनाथ सिंह पर एक किताब लिखी है ‘केदारनाथ सिंह का दूसरा घर’। यह नए और भिन्न आस्वाद की आलोचना है। उनके पद्य पर कई पुस्तकें हैं लेकिन उनके गद्य पर एक भी नहीं। उनका गद्य उनकी कविता की तरह ही बहुस्तरीय और मूल्यवान है। उनके गद्य पर केंद्रित यह पहली मुकम्मल किताब होगी। इसमें मृत्युंजय जोखिम उठाते हुए यह कहने का साहस करते हैं कि केदारनाथ सिंह के सर्जक व्यक्तित्व में एक उत्कृष्ट आलोचक के साथ-साथ एक दृष्टिसंपन्न इतिहासकार भी मौजूद है। यदि उन्होंने आलोचना की राह न छोड़ी होती तो वे उतने ही बड़े आलोचक होते, जितने बड़े कवि हैं। रमेशचंद्र शाह हिंदी के वरिष्ठ कवि-आलोचक हैं। उनकी कुमाउंनी में लिखी कविताओं का एक संग्रह लगभग तीन दशक पहले प्रकाशित हुआ था। उस संग्रह का नाम ’उकाव हुलार’ है। ठीक उसी परम्परा को आगे बढाते हुए हिंदी के प्रतिभाशाली युवा कवि हरि मृदुल ने इस लाकडाउन में अपनी कुमाउंनी कविताओं के एक संग्रह की पांडुलिपि तैयार की। ’कैकी मया बाटुली की’ शीर्षक का हिंदी अर्थ ’हिचकी वाला किसका प्यार’ है। इसमें खुद कवि ने ही हिंदी में इनका पुनर्लेखन किया है। वे इसे अनुवाद मात्र नहीं मानते, यह हर कुमाऊंनी कविता के साथ प्रकाशित होगा। कुमाऊंनी कविता की प्रकृति को हिंदी पाठक इससे बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।

समझा जा सकता है कि इस कोरोना काल में भी संगीत, कला-व्यक्तित्व, कला आंदोलन, आलोचना और साहित्य में इस तरह के रेखांकित करने वाले दस्तावेजी काम हुए हैं, जिनकी कमी हिंदी-सम्पदा में थीं। हिंदी का यह ठाठ इस ’न्यू नॉर्मल’ जीवन में पुस्तकों के परिधान में आने के लिए प्रकाशन-तंत्र के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहा है।

– राकेश श्रीमाल

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