क्यों खास है भारतीय संस्कृति में त्योहारों की मिठास

सात वार और सत्रह त्योहार की संस्कृति वाले इस देश में सभी त्योहार उत्साह और उमंग से मनाए जाते हैं। जीवन में तनाव से पार पाने के लिए  तो उत्सवधर्मिता का बना रहना आवश्यक है ही अपनी परंपरा, संस्कृति, रीति रिवाज, मूल्य  और आदर्शों की जानकारी भी हमें अपने पर्व और उत्सवों से मिलती है। ये पर्व, त्योहार जीवन में उल्लास का संचार करने के साथ ही हमारी जानकारी में वृद्धि करते हैं।

भारत ही एक ऐसा देश है जिसका हर दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता । हमारी संस्कृति का समूचा ताना – बाना उसकी उत्सवधर्मिता को ध्यान में रखकर ही बुना गया है। जनवरी माह के आते ही देश के विभिन्न  भागों में दान पुण्य से लेकर पतंगबाजी और गिल्ली डंडे के खेल पर आधारित उत्सव की शुरूआत  हो जाती है। पतंगबाजी कहने को एक शौक है।  लेकिन गंभीरता से देखने पर उसमें जिन्दगी के पेंच से लेकर जीवन के उतार-चढाव तक हर चीज का संतुलन छिपा है।

इस सबका सिलसिला थमने से पहले ही शुरू हो जाता है गणतंत्र का उत्सव। देशभक्ति के तरानों की गूंज कानों से हटने से पहले ही फिजा में बसंत की बहार का रंग घुलने लगता  है। ऋतुराज बसंत के आगमन का उत्सव रंग – बिरंगे फूलों के बाग – बगीचों में ही नहीं घर-आंगन और गली-चौबारे में मनने लगता है । बसन्त के उत्सव का उल्लास थमने से पहले ही  देश फाग की मस्ती में  झूम उठता है । रंग गुलाल के उत्सवी उल्लास से लेकर फूलपाती और गणगौर  की गूंज चहुं ओर सुनाई  देने लगती है। होली की मस्ती और फागुन के रंगों का खुमार  उतरने से पहले ही हिन्दू नव वर्ष , गुडी पडवा  और विक्रमोत्सव का पर्व  देश के अलग – अलग भागों में  अलग-अलग नामों से मनाया  जाने लगता है।

भारत अकेला ऐसा देश है जहाँ फसल कटाई  शुरू होने से लेकर ऋतु परिवर्तन तक की रूटिन प्रक्रिया तक को एक उत्सव के रूप में  मनाया जाता है। कभी वृक्षारोपण का उत्सव तो कभी खर पतवारों  की सफाई का पर्व, कभी नदियों की पूजा का उत्सव तो कभी पहाड़ों की परिक्रमा की पर्व, कभी पर्यावरण की रक्षा के नाम पर आयोजन – संयोजन तो कभी स्वच्छता के नाम पर जलसा,,,, ऐसा कोई दिन नहीं  गुजरता जिस दिन देश के किसी भाग में कोई उत्सव न मानता हो । कभी दीपों  की झिलमिल  का पर्व तो कभी सूर्य को अर्ध्य  देने का उत्सव , कभी आंवला नवमी , तुलसी विवाह और  बड़ तथा पीपल की पूजा  तो कभी देवताओं के जागने और सोने का उत्सव, एक के बाद एक आने वाले ये पर्व त्योहार भारत के लोगों को  सांस्कृतिक  दृष्टि  से समृद्ध  बनाते है।

कहना गलत नहीं  होगा कि यहाँ  समझदारी का उत्सव जितनी शिद्दत से मनता है मूर्खता का उत्सव भी उतनी ही मस्ती से मनाया जाता है। ये भारत ही है जहाँ  दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाने के साथ ही खुद पर हंसने  से भी यहाँ के लोगों परहेज नहीं करते। जिन्दगी के हजार तनावों के बीच उन्हें तो जीने का एक बहाना मात्र चाहिए । जब तक जीवन में उल्लास है तनाव पास फटक  नहीं  सकता। होली, दिवाली, दशहरा, रक्षा बंधन ही नहीं हर त्योहार की अपनी महत्ता और उपादेयता है।

रक्षा बंधन का सामाजिक पारिवारिक त्योहार हो या अन्य कोई पर्व गौर से देखा जाए तो हर पर्व के मूल में एक किस्म का कर्तव्य और परंपरा पालन का भाव छिपा है। यह कर्तव्य भाव ही वह थाती है जिसकी बदौलत आज मुल्क की समाज व्यवस्था कायम है। मनुष्य से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र बनता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य का ही वृहद रूप राष्ट्र के प्रति कर्तव्य के रूप में देखने को मिलता है। जब तक घर और परिवार में कर्तव्य की भावना बलवती नहीं होगी तब तक देश के प्रति कर्तव्य का जज्बा जागृत होना संभव नहीं है। मनुष्य – मनुष्य के बीच प्रेम के बिना राष्ट्रप्रेम का भाव जन्म नहीं ले सकता है। अगर आज हमें लगता है कि लोगों में राष्ट्र प्रेम घटता जा रहा है तो इसकी मुख्य वजह पारंपरिक भारतीय मूल्यों में कमी आना है। पाश्‍चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के कारण हमारी नई पीढी कर्तव्य, त्याग, समर्पण, प्रेम, दया, सहानुभूति, सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह जैसे भारतीय मूल्यों से दूर होती जा रही है। जिनकी सीख रक्षा बंधन जैसे पर्वों से मिलती है। कई बार हम इन पर्वों को रस्मी मानकर इनके मूल में छिपे संदेश को नई पीढी को बताने में कोताही बरते हैं। क्योंकि हमे लगता है कि कॉन्वेंट कल्चर में पले- बढे कार्पोरेट जगत में विचरण करने वाले मल्टीनेशनल कंपनी के मुलाजिम मेट्रो सिटी के निवासी हमारे बच्चों के पास इस सबके लिए कहां फुर्सत है।

हमारी सोच का यह संकुचित दायरा ही हमें अपनी जडों से काट रहा है। हम अपने बच्चे को कितने भी बडे पैकेज के काबिल बना दें, अगर हम उन्हें परिवार, समाज ,राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व और पारंपरिक भारतीय आदर्शों की शिक्षा नहीं दे पाए तो उस करोडों के के पैकेज का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि ये पैकेज की उठापटक और भौतिकता की चकाचौंध एक सीमा तक ही अच्छी है। उसके बाद हर व्यक्ति अपनी संस्कृति और मूल स्वभाव में लौटना चाहता है। जब तक अभाव है तब तक ही पैकेज का मोलभाव भाता है। अभाव के दूर होते ही परंपरा और संस्कृति का भाव मन में आने लगता है। अपने अंदर के भाव को मारकर दूर किया गया किसी भी तरह का अभाव कभी कारगर साबित नहीं हो सकता। इसीलिए हर त्योहार की मिठास हमारी मूल्य संस्कृति के लिए सदा खास होती है।

भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन एक त्योहार नहीं एक विचार है। जिसके मूल में बहिन की रक्षा का भाव छिपा है। यही वजह है कि श्रावण पूर्णिमा से लेकर कुछ- कुछ घरों में जन्माष्टमी और हडतालिका तीज तक यह पर्व मनाया जाता है। आज छोटी बच्चियों और  महिलाओं के साथ बढ रही यौन हिंसा की वारदातों के दौर में रक्षाबंधन पर्व के मूल में छुपे सुरक्षा और कर्तव्य बोध के संदेश को प्रसारित करने की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है. रक्षाबंधन  की शुरूआत का सबसे पहला प्रमाण रानी कर्णावती व सम्राट  हुमायूॅ  के समय का है । मध्य युग में  राजपूत व मुस्लिमों के बीच युद्ध चल रहा था । रानी कर्णावती  चित्तौड  के राजा की विधवा  थी । उस दौरान  गुजरात  के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता नहीं सूझता देख रानी कर्णावती ने हुमायूॅ  को राखी भेजी थी। तब हुमायूॅ  ने उनकी रक्षा  कर उन्हें  बहन का दर्जा  दिया था  । तब से रक्षाबंधन  मनाए जाने की परम्परा  शुरू हुई । स्पष्ट है कि इस पर्व को शुरू करने वाले भाई-बहन सगे और मुंहबोले होना तो दूर विधर्मी  थे फिर भी एक बंधन की खातिर उन्होंने इस पवित्र रिश्ते को आजीवन निभाया ।

रक्षाबंधन का इसके पहले का उदाहरण कृष्ण व द्रोपदी का है । भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था । युद्ध के दौरान  कृष्ण की अंगुली से खून बह रहा था । इसे देख कर द्रोपदी बेहद दुखी हुई। और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीर कर  कृष्ण  की अंगुली  पर बांध  दिया ।  उनका खून बहना  बन्द हो गया । तभी से श्रीकृष्ण  ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था । वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गये  थे तब भरी सभा में उनका चीर हरण हो रहा था । तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई  थी।  एक अन्य उदाहरण अलेक्जेण्डर  व पुरू के बीच का हैै । कहा जाता है कि  हमेशा विजयी होने वाले अलेक्जेण्डर  भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। इस कारण अलेक्जेण्डर की पत्नी काफी तनाव में आ गई।  उसने रक्षा बंधन के त्योहार  के बारे में सुना था । सो, उसने  पुरू को राखी भेजी।  तब जाकर युद्ध  की स्थिति समाप्त  हुई। क्योंकि पुरू ने अलेक्जेण्डर  की पत्नी  को बहन मान लिया था । 

डॉ.  देवेन्द्र जोशी

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