खुदी तो बुलंद नहीं… और ख्वाब, आसमान के!

राजकपूर के भाई शशि कपूर का एक्टिंग करियर कुछ जम नहीं रहा था। एक निर्माता से बात चली तो उसने शर्त रख दी ‘शंकर-जयकिशन से मंजूरी ले आओ तो तुम्हे हीरो ले लूंगा।’ शशि कपूर ने जब शंकर-जयकिशन से बात की तो उन्होंने कहा- ‘अभी तुम इतने बड़े नहीं हुए हो कि तुम्हारी फिल्म का संगीत हम दें।’ शशि कपूर ने राजकपूर से सिफारिश लगवानी चाही तो उन्होंने इंकार कर दिया- ‘शंकर-जयकिशन ही अपनी फिल्मों के हीरो तय करते हैं, किसी की नहीं सुनते हैं।’ बहुत बाद में ‘कन्यादान’ में पहली बार उन्होंने शशि कपूर के लिए म्यूजिक दिया था। अकेले शंकर-जयकिशन ही नहीं, उस दौर के ज्यादातर संगीतकार ऐसे ही होते थे। संगीतकार ही क्यों, गायक और गीतकार भी अपनी पसंद और शर्तों पर काम करते थे। सचिन देव बर्मन और शैलेंद्र के बीच तो इसी बात पर अनबन रहती थी कि कौन, किसके घर धुन सुनाने या सुनने  जाएगा! बर्मन दा कहते थे- ‘तुम आओ’ और शैलेंद्र की जिद रहती थी कि ‘मैं क्यों’? बर्मन दा और साहिर लुधियानवी में पारिश्रमिक को लेकर ठनाठनी रहती थी कि ‘एक रुपया ज्यादा लूंगा।’ नौशाद और मजरूह ने ‘अंदाज’ में हिट गाने दिए, फिर ऐसी बात बिगड़ी कि बीस साल लग गए सुधरने में और ‘साथी’ में दोनों फिर साथ आए।

इन सबके उस्ताद थे सज्जाद हुसैन, जो अपने संगीत के आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे। जब कोई निर्देशक यह कहता कि ‘इस धुन में वो बात नहीं आई’… तो सज्जाद का जवाब होता था ‘संगीत में वो बात नहीं होती है, सिर्फ संगीत होता है।’ सज्जाद हुसैन ही थे, जिन्होंने सबसे पहले लता मंगेशकर की इस कमजोरी को पकड़ा और दुरुस्त किया था कि जब ऊंचे सुर में गाती थीं तो आवाज हिलने लगती थी। सज्जाद ने एक से बढ़कर एक गाने दिए, लेकिन अपनी धुनों के साथ समझौता  कभी नहीं किया। वे मेंडोलिन के बादशाह कहे जाते थे और बड़े-बड़े संगीत समारोह में बजाने बुलाए जाते थे। उनकी एक ही शर्त होती थी, मेरा बजाना कोई रिकॉर्ड नहीं करेगा। जब इस बारे में किसी ने पूछा था तो उनका जवाब था ‘अभी तो मैं सीख ही रहा हूं, मुझे तो यकीन हो पहले, वरना बाद में लोग मुझ पर हंसेंगे।’

साहिर लुधियानवी के साथ ओ.पी. नैयर ने सिर्फ एक फिल्म में काम किया था- ‘नया दौर।’ नया दौर की सफलता के बाद जब बीआर चोपड़ा ने फिल्म ‘साधना’ के लिए फिर इस जोड़ी को लिया तो नैयर भाग खड़े हुए कि सारी क्रेडिट तो गीतकार साहिर ले जाते हैं, लोग गीत की बात करते हैं, संगीत की कोई बात ही नहीं करता। मुझे इनके साथ काम नहीं करना। दोनों ने फिर एक साथ कभी काम नहीं किया। शैलेंद्र ने भी फिल्म ‘बंदिनी’ में गीत लिखने से मना कर दिया था कि एसडी बर्मन से उनका ईगो टकरा रहा था। तब गुलजार गीतकार तय हुए, मगर शैलेंद्र को गुलजार की मदद करते देख एसडी बर्मन ने पहल की, झगड़ा खत्म किया और बाद में एक गीत छोड़, सभी गीत शैलेंद्र ने ही लिखे। गुणी कलाकारों की कदर करना भी ये कलाकार खूब जानते थे। शैलेंद्र मूडी लेखक थे। बर्मन दा को गाना रिकॉर्ड करना था और शैलेंद्र का मूड ही नहीं बन रहा था। वे टल्ले दिए जा रहे थे। एक सुबह बर्मन दा ने अपने छोटे से लड़के पंचम को शैलेंद्र के घर भिजवा दिया कि दिनभर इनके  साथ लगे रहना और जब तक गीत लिखकर ना दें, पीछा मत छोड़ना। सुबह से देर रात तक शैलेंद्र के साथ पंचम यहां-वहां भटकते रहे। रात को उन्हें याद आया तो पूछा ‘तुम मेरे साथ क्या कर रहे हो?’ पंचम ने बता दिया। शैलेंद्र जुहू चौपाटी पर पैदल घूम रहे थे। उन्होंने पंचम को माचिस की डिबिया दी और कहा ‘इस पर धुन सुनाओ।’ अब आगे-आगे शैलेंद्र और पीछे-पीछे डिबिया बजाते पंचम… कि तभी शैलेन्द्र ने आसमान की तरफ देखा और उनके मुंह से यह गीत फूट पड़ा- ‘खोया-खोया चांद, खुला आसमान।’

बीआर चोपड़ा ने ‘गुमराह’ फिल्म के लिए साहिर लुधियानवी की नज्म ‘चलो एक बार फिर से’ लेने का तय किया। साहिर को खबर पहुंचाई गई। उन्होंने कहा- ‘पहले मुझे फिल्म की सिचुएशन बताइए, फिर मैं तय करूंगा कि मेरी नज्म  उस जगह के लायक है या नहीं।’ चोपड़ा ने पूरी कहानी सुनाई। तब साहिर साहब ने उसमें कुछ कतरब्योंत की और नज्म उन्हें दे दी ‘अब इसका उपयोग कर सकते हैं।’ अपनी रचना के लिए इतनी तड़प देख चोपड़ा इतने प्रभावित हुए कि फिर अपनी सभी फिल्मों के गीत उनसे ही लिखवाए।

वी. शांताराम की मोहम्मद रफी से किसी बात पर ठन गई और उन्होंने महेंद्र कपूर, मन्ना डे से गीत गवाने शुरू कर दिए। सेहरा के लिए ‘तकदीर का फसाना, जाकर किसे सुनाएं’ गीत महेंद्र कपूर गा रहे थे। संगीतकार रामलाल को जम नहीं रहा था। उन्होंने वी. शांताराम से कहा कि ये गीत तो रफी (जिन्हें वे रफीक कहते थे) साहब के लिए ही बना है तो वी. शांताराम ने कहा- ‘जाओ और रफी को मना लो अगर वे गाना चाहें।’ रामलाल ने रफी को कुछ नहीं बताया और घर जाकर धुन सुनाई। रफी साहब ने सुनी और खुश होकर बोले- ‘यह गीत तो मेरा हुआ।’ जब रामलाल ने हकीकत बताई तो रफी साहब ने कहा- ‘जुबान दे दी है तो यह गाना मैं ही गाऊंगा’… और ये गाना अमर हो गया।

केदार शर्मा उस समय ‘आम्रपाली’ बना रहे थे। संगीतकार शंकर-जयकिशन थे। गाने की रिकॉडिर्ंग थी और गीतकार शैलेंद्र ने सिर्फ एक लाइन ही दी थी ‘जाओ रे जोगी तुम जाओ रे।’ शंकर-जयकिशन ने कहा- ‘आज ही गाना रिकॉर्ड होगा।’ लताजी भी आ गई थीं, लेकिन गाना तैयार नहीं था। शाम तक की मोहलत चाही केदार शर्मा ने और शैलेंद्र को लेकर नेशनल पार्क चले गए। शाम तक शैलेंद्र को कुछ नहीं सूझा और दोनों निराश वापस स्टूडियो आ गए। जब शंकर ने गुस्से में पूछा ‘कुछ हुआ?’ तो शैलेंद्र के मुंह से निकल गया ‘हां’…! केदार शर्मा हैरान कि क्या होगा, एक लाइन भी तो नहीं लिखी है। तभी शंकर ने कहा ‘सुनाइए’… और शैलेंद्र ने पूरा गाना बगैर लिखे सुना दिया। सभी को पसंद आया, रिकॉर्ड भी हो गया। तो ऐसे-ऐसे कमाल के कलाकार थे उस दौर में। काम और नाम के लिए करते थे, अपनी मर्जी का करते थे और समझौता इसमें कहीं शामिल नहीं होता था। घमंड नहीं, स्वाभिमान था इन कलाकारों में, तभी तो दुनिया आज भी याद करती है और सलाम करती है।

ये भूली-बिसरी बातें आज इसलिए याद आ रही हैं कि सुशांत सिंह की खुदकुशी के बाद बहस शुरू हो गई है कि फिल्मी दुनिया पर कुछ परिवारों का कब्जा है और उनके ही इशारों पर कलाकारों के करियर बनाए-बिगाड़े जाते हैं। सोनू निगम ने कहा अभिनेता ही नहीं, गायक और संगीतकार भी खुदकुशी करते नजर आएंगे तो कुछ गीतकारों ने कहा कि उनकी हालत भी बेहतर नहीं है। ऐसा नहीं लगता परिवारवाद का रोना रोने वाले कहीं खुद ही इतने कमतर हैं कि अपने दम पर रहे हैं। जावेद अख्तर ने पिछले दिनों कहा कि मैंने रायल्टी मांगी तो लोगों ने गीत लिखवाना ही बंद कर दिया। बताइए, जिस फ़िल्मी दुनिया में पैसा पानी की तरह बहता हो, वहां पैसे का रोना क्यों? इन लोगों में कलाकार होने का एहसास ही नहीं है। जब आपको ही अपने पर भरोसा ना हो तो दुनिया क्यों करेगी? आप अगर  सौ टंच सोना हैं तो कोई क्यों दूसरी जगह जाएगा। बगैर तपे ये लोग कुंदन होने का वहम पालते हैं, तो कोई, क्यों उसे सच मानने लगा। कमतर के लिए यहां कोई जगह नहीं है। जिस में दम होगा, वही कायम रहेगा।

-प्रकाश पुरोहित

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