घर-घर ना रहा,बार-बार ना रहा

अब जब घर-बार की बात कर रहा हूँ तो आप यह न सोचिए कि मैं घर के साथ अंग्रेजी के बार की बात कर रहा हूँ। न बीयर बार की बात है न डाँस बार की बात है, ये बार तो शाश्‍वत हैं, चलते रहेंगे लेकिन अभी तो शनिदेव की तरह सरकार की दृष्टि घर-बार पर पड़ गई है, मैं बात उसी की कर रहा हूँ। इस दृष्टि के कारण अभी अपना घर-बार घर-बार नहीं रहा। घर यानी अपने स्थायी रूप से रहने का स्थान या यूँ भी कह सकते हैं कि अपने घरेलू काम-काज करने का स्थान।

गुस्सा तो आता है इन चीनियों पर, एक यही वायरस फैलाने को मिला था, घरों को जेल बनाकर रख दिया। लॉकडाऊन से अनलॉक होना भी कहाँ आसान रह गया है। चारों ओर खौफ़ का मंजर है और टीवी चैनल रात-दिन रामसे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह खौफनाक डरावने सीन क्रिएट करने में लगे हुए हैं। समझ में नहीं आ रहा कि यह सरकार को डराने के लिए है या कि पब्लिक के लिए! जेहन में यह प्रश्‍न तो है ही कि ये चैनल वाले भी डरते हैं या केवल डराते ही हैं!

चलिए मूल बात पर आता हूँ। बात घर-बार की कर रहा था। अब घर भी कहाँ घर रहा। लॉकडाउन ने घर में ही दफ्तर खुलवा दिया। वर्क फ्राम होम यानी घर से ही दफ्तर का काम करो। यहाँ भी वही न खाने का टाइम फिक्स न नहाने-धोने का और ऊपर से घरवाले-घरवाली की बक-बक,चख-चख अलग फुल टाइम ब्याज समेत! अब और कसर रह गई थी तो सरकार ने हमारा घर-हमारा विद्यालय की योजना सिर पर दे मारी।

अरे भाई, मास्टरों पर जुल्म करना था तो और कुछ कर डालते, पैरेंट्स ने क्या बिगाड़ा था! क्या माँ-बाप भी इतने पढ़े-लिखे और फुर्सतीराम हैं। और यदि घर पर ही पढ़ा लेते तो स्कूल क्यों भेजते। अब आप कह रहे हो कि घंटी-थाली बजाकर क्लास शुरु करो और अवकाश के पहले भी घंटी-थाली बजाकर सूचना दो,यानी घर में खुद को चपरासी बना दिया। शनिवार को मस्ती की पाठशाला! अरे भाई, कोरोना तो पहले ही सारी मस्ती निकाल चुका है। और फिर आप कहते हो कि शाम के वक्त में दादा-दादी, नाना-नानी बच्चों को कहानी सुनाएँ! अरे हुजूर, अब तो वे खुद ही कहानी बन चुके हैं, वे क्या कहानी सुनाएंगे! और फिर अपन भी तो काम-धंधे वाले ठहरे। अपना नौकरी-धंधा संभालें कि अपना घर आपका विद्यालय होने दें। वैसे भी काम-धंधों को ग्रहण लग चुका है और फिर यदि वर्क फ्राम होम से ना-नुकूर की तो वे टेक रेस्ट एट होम कह देंगे। डर है कि कहीं हमारा घर-हमारा विद्यालय नहीं होने दिया तो बच्चों की निगाह के साथ सरकारी निगाह का भी खौफ़ है।

लॉकडाउन के दौरान मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा में ताले पड़ गए। सरकार भविष्य की आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी स्कीम भी तो ला सकती है , हमारा घर-हमारा धर्मस्थल क्योंकि इन चीनियों का भरोसा भी नहीं रहा, कल को और कोई वायरस छोड़ दिया कभी तो! प्रयोगधर्मी सरकार हमारा घर-हमारा बैंक, हमारा घर-हमारा कार्यालय, हमारा घर-हमारा थाना,हमारा घर-हमारा न्यायालय और हमारा घर -हमारी सरकार तक भी तो पहुँच सकती है। ऐसी स्थिति में हम तो यही गा और गुनगुना सकते हैं- घर-घर ना रहा, बार-बार न रहा, सरकार हमें तेरा ऐतबार ना रहा!

-डॉ. प्रदीप उपाध्याय

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