चप्पल और पुलिया की लाइफ साईकल

मैंने अपनी धर्मपत्नी को समझाना चाहा की सड़क के फुटपाथ से चप्पल मत खरीदो। इन चप्पलों की गुणवत्ता के साथ-साथ उम्र भी बहुत कम होती है। मैंने सस्ता रोये बार बार, महंगा रोये एक बार कहावत का भी इस्तेमाल किया। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी मेरी धर्म पत्नी को यह हिंदी की कहावत समझ ही नहीं आयी। या कहिए की चप्पलों की चमक-दमक, उनकी नई फैशन के हिसाब से बनावट, हल्के मटीरियल से बनी वजन में हल्की होने से और कोई कील के उभार बिंदु परिलक्षित नहीं होना, इन चप्पलों को खरीदने का एक अहम कारण साबित हुआ। लाख मना करने के बावजूद चप्पल खरीद ली गयी। कीमत अदा की गई 300 रु।

मेरी आलोचनाओं के बावजूद उस एक अदद चप्पलों की जोड़ी की खरीददार मेरी पत्नी ने बड़ी शान से इन चप्पलों के डब्बे को अपने चप्पलों से भी महंगे झोले में डाला, और इस खरीद का बखान इस तरह करने लगीं जैसे उन्होंने सस्ती खरीद से बचे पैसों से देश को वर्ल्ड बैंक से ऋण लेने से जैसे रोक लिया हो। बकौल दुकानदार इन चप्पलों को बड़ी कठिन गुणवत्ता परीक्षण स्तरों से गुजरना पड़ा है। इन चप्पलों ने सत्तर किलो की महिला के लगातार एक महीने के इस्तेमाल की परीक्षा पास की है। धूप, गर्मी, ठंड, बरसात हर मौसम में इन चप्पलों को कसौटी पर कसा गया है। मेरी हर जिज्ञासा को एक नई खूबी का आवरण पहना कर, यूं ही अनुत्तरित रहने दिया गया। बीवी को क्यों भला फर्क पड़ेगा, गाड़ी कमाई तो हमारी है। मन को यही समझाया, अब खरीद गई तो खरीद गई। अब चुप रहना ही बेहतर है। अमां चप्पल ही तो है, दो अलग-अलग पांवों में पहनी जाएगी। सीमेंट लोहे की बनी कोई पुलिया थोड़ी है, जो दो तटों को जोड़ती है। जिसकी उम्र, मजबूती और कीमत परखी जाए। असामयिक टूटे तो टूटे, कौन हमारे पांव में यह चप्पल पड़नी है। टूटेगी तो कौन एक साथ दोनों टूटेगी, एक तो बचेगी। 150 रुपये बचने की तो गारंटी होगी। पता नहीं 300 रु के आर्थिक नुकसान को मैं शादी के उन शुरुआती दिनों में, जब पति अति दिलदार होता है, सोच-सोच कर बड़ा मायूस हो रहा था। और वहीं श्रीमती जी उन चप्पलों के उद्घाटन के पलों को सोच-सोच कर मन ही मन खुश हो रहीं थी।

150 रु के बचत का गणित लगाकर, मैं अपने को सांत्वना जरूर दे रहा था, पर यह तो मूर्खता पूर्वक विचार था। फिर मुझे याद आया मैं एक सरकारी मुलाज़िम हूँ। मुझे कुतर्कों के साथ-साथ बेवकूफ बनाने की भी कला विकसित करनी है। जैसे पुलिया टूटने पर यह तर्क दिया जाता है की तेज बारिश में पुलिया के खंबे जिस मिट्टी में टिके थे, उस मिट्टी के बहने से पुलिया के खंभे टिक नहीं पाए। कोई निर्माण कार्य टूटने पर इसी तरह के बेसिर-पैर जवाब दिए जाते हैं। यानि की ऐसे बेढंगे विचार मेरी निजी जिंदगी में भी आ रहे थे। कभी-कभी लगता है की यह मन भी मूर्ख जनता जैसा ही है। अंधे प्रेम में, खुशी की बेला में, पैसे की चका चोंध में, सत्ता की ताकत में कोई भी अनर्गल वाक्य बोल दो सब मंजूर है, और मन मान जाता है। ठीक इसी तरह मैं अपने मन को समझा रहा था। कल तक तो, जनता की ही तरह, मेरे मन को 300 रुपये के व्यर्थ जाने का गम भूल जाना है। तभी दूसरा मूर्खता पूर्ण विचार आया, चप्पल यदि टूटेगी तो बीवी का ही पैर लचकेगा। जब पांव में तकलीफ होगी तभी समझ में आएगा। जैसे ठेकेदार दलील देते हैं की, लोगों ने पुलिया निर्माण के दौरान आवागमन नहीं रोका, इसलिए पुलिया की नींव कमजोर रह गई, और पुलिया टूट गई। अब जनता भुगते आदि। मुझे यह समझना था की हर चप्पल और पुलिया की एक लाइफ साईकल होती है। आपका प्रेम जितना अंधा होगा, या भ्रष्टाचार जितना अधिक होगा, चप्पल और पुलिया की लाइफ साईकल उतनी ही छोटी होगी।

हुआ वही जो संशकित था। उद्घाटन के ठीक तीसवें दिन, उन चप्पलों ने मेरी पत्नी के पैर तले कुचले जाने के कारण अपना दम तोड़ दिया, और वहां गाड़ियों और प्रथम वर्षा के वेग से पुलिया ने भी अपना दम तोड़ दिया। यहां मैं सतर्क था। चप्पल टूटने पर पत्नी के मेरा कहना न मानने पर डांटने की बजाय, मैंने चप्पल के निर्माता के घटिया निर्माण सामग्री और भ्रष्ट तरीके से पैसे कमाने की तृष्णा को कोसना चालू कर दिया। अब अपनी पत्नी को नाराज नहीं कर सकता था। आखिर वह एक प्रकार की घूस ही थी, जिससे मैंने अपनी पत्नी की खुशी खरीदी थी। ठीक उसी तरह जैसे पुलिया के टूटने पर भ्रष्ट सरकारी जिम्मेदारों को गालियां दी जाती है, जिनकी खुशियां खरीदने के लिए मूर्ख जनता ने अपनी गाढ़ी कमाई अदा की थी।

अब मैं और सिहर गया था क्योंकि इन चप्पलों के जीर्णोद्धार में 300 रुपये के चप्पलों की कीमत और बढ़ने वाली थी, और इस कार्य के लिए फिर से मेरी जेब कटने वाली थी। और उस टूटी पुलिया को सुधारने के लिए, कितना व्यय आने वाला है, इसकी फ़ाइल भी चल पड़ी है। मूर्ख जनता अपनी जेब कटने के भय से कोसने का कुकरहाव करने लगी है। 

-राकेश सिंघई

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