जाओ तो जरा स्टाईल से…

आज एक चिट्ठी आई। उसे देखकर बहुत पहले सुना हुआ एक चुटकुला याद आया ।

एक सेठ जी मर गये। उनके तीनों बेटे उनकी अन्तिम यात्रा पर विचार करने लगे। एक ने कहा ट्रक बुलवा लेते हैं। दूसरे ने कहा मंहगा पडेगा। ठेला बुलवा लें। तीसरा बोला वो भी क्यूँ खर्च करना। कंधे पर पूरा रास्ता करा देते हैं। थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा। इतना सुनकर सेठ जी ने आँख खोली और कहा कि मेरी चप्पल ला दो, मैं खुद ही चला जाता हूँ।

चिट्ठी ही कुछ ऐसी थी। एक बीमा कम्पनी की। लिखा था कि अपने अंतिम संस्कार का बीमा करा लें। पहले बताया गया कि यहाँ अंतिम संस्कार में कम से कम 5000 से 6000 डालर का खर्च आता है और अक्सर तो 10000 डालर तक भी चला जाता है अगर जरा भी स्टेन्डर्ड का किया। साथ में पिछले 10 सालों में बढ़े दाम का ग्राफ भी था। पहली नजर में ग्राफ देख कर लगा की इन्होंने भारत के पेट्रोल के भाव का ग्राफ क्यूँ भेजा है? पेट्रोल छिड़क कर जलाएंगे क्या घी के बदले? फिर ध्यान से पढ़ा तो इनके पैकेज का भाव था जो पिछले 10 सालों में बढ़ा था। जरा विचारिये कि जब तक आप का नम्बर आयेगा तब तक मुद्रा स्फीति की दर को देखते हुए यह 25000 डालर तक भी हो सकता है। अब अंतिम संस्कार का मामला है, चाहे जो भाव कर दें, करना तो पड़ेगा। यूरोप घूमना तो मंहगाई के चलते आप टाल भी लो।  

आगे बताया गया कि आप अपनी मनपसन्द का ताबूत चुनिये, डिजाईनर। जिसमें आप को आराम से रखा जायेगा। कई डिजाईन साथ में भेजे ताबूत सप्लायर के ब्रोशर के साथ। सागौन, चीड़ और हाथी दाँत की नक्काशी से लेकर प्लेन एंड सिंपल तक। उसके अन्दर भी तकिया, गुदगुदा गद्दा और न जाने क्या क्या।

फिर आपके साईज का सूट, जूते, मोजे, टाई आदि जो आपको पहनाये जायेंगे पूरी वामिंग और मेकअप के साथ। फेमस मेकअप स्पेशलिस्ट मेकअप करेगी, वाह!! यह तो हमारी शादी में तक नहीं हुआ। खुद ही तैयार हो गये थे। मगर उस समय तो खुद से तैयार हो नहीं पायेंगे तो मौका भी है और मौके की नजाकत भी। मलाल इस बात का रह जाएगा कि न तो जिसने सजाया उसको देख पायेंगे और न ही सज धज हम कितने राजा बाबू लगे वो देख पायेंगे।

फिर अगर आपको गड़ाया जाना है तो प्लाट, उसकी खुदाई, उसकी पुराई, रेस्ट इन पीस का बोर्ड आदि- आदि। अगर जलाया जाना है तो फर्नेस बुकिंग और ताबूत समेत उसमें ढकेले जाने की लेबर। सारे खर्चे गिनवाये गये। साथ ही आपको ले जाने के लिये ब्लैक लिमोजिन आयेगी उसका खर्चा। अभी तक तो बैठे नहीं हैं उतनी लम्बी वाली गाड़ी में। चलो, उसी बहाने सैर हो जायेगी। वैसे बैठे तो ट्रक में भी कितने लोग होते हैं? मगर लेकर तो ट्रक में ही जाते हैँ।

हिट तो ये है कि आप हिन्दू हैं और राख वापस चाहिये तो हंडिया का सेम्पल भी है और उसे लकड़ी के डिब्बे में रखकर, जिस पर बड़ी नक्काशी के साथ आपका नाम खोदा जायेगा और आपके परिवार को सौंप दिया जायेगा। हिन्दुत्व का इतना विश्‍वव्यापी डंका बज रहा है और कोई बता रहा था कि हिन्दुत्व खतरे में है।  इतने पर भी कहाँ शांति-फूल कौन से चढ़वायेंगे अपने उपर, वो भी आप ही चुनें। गुलाब से लेकर गैंदा तक सब च्वाइस उपलब्द्ध है।

अब जैसी आपकी पसंद वैसा बीमा का भाव तय होगा। चाहो तो इत्र भी छिड़क देंगे। थोड़ा एक्स्ट्रा दाम और दे देना। अम्मा कहा करती थीं कि जितना गुड़ डालोगे, उतनी मीठी खीर बनेगी। खीर तो चलो अगर मीठी बनाते तो खाते भी खुद ही न। यहाँ तो जब निकल लेंगे उसके बाद की खीर पकवाई जा रही है। तब से रोज उस बीमा वाले का फोन आता है कि क्या सोचा? जल्दी करिए वरना देर हो जायेगी। आधा दिल तो उसकी हड़बड़ी देखकर बैठा जाता है की पट्ठे ने कहीं कुंडली बांचना तो नहीं सीख लिया है इसलिए उसे पता है देर हो जायेगी? कोई आश्‍चर्य नहीं होगा की उसने कुंडली बांचना सीख लिया हो इस हड़धप में कि भावी विश्‍वगुरु की विधा में पारंगत रहेंगे तो काम ही आयेगा।  

क्या समझाऊँ उन्हें कि भाई, यह सब आप धरो। हम तो भारत के रहने वाले हैं। समय से कोशिश करके भारत लौट जायेंगे। यह सब हमको शोभा नहीं देता। हमारे यहाँ तो दो बांस पर लद कर जाने का फैशन है, अब किसी का कंधा दर्द करे कि टूटे। यह उठाने वाला जाने और उस पर खर्चा भी उसी का। अपनी अंटी से तो खुद के लिये कम से कम इस काम पर खर्च करना हमारे यहाँ बुरा मानते है।

भाई, अमरीका/कनाडा वालों, आप लोगों की हर अदा निराली है। कम से कम ये वाली अदा तो आपकी आपको ही मुबारक।

-समीर लाल ‘समीर’

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