टाइम कैप्सूल: मरने के बाद जीने की तलब और अमरता का कौतुहल

अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के सुनहरे क्षणों में मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल रखे जाने के कथा प्रपंच के राजनीतिक समापन के बाद मानवीय प्रवृत्तियों में ऐतिहासिकता की ललक और महत्वाकांक्षाओं से उदभूत सवालों का फलक पर उभर आना स्वाभाविक है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ’जिसने भी धरती पर जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्‍चित है।’ शरीर की नश्‍वरता के आगे ही आत्मा में अन्तर्नीहित अमरता का भारतीय दर्शन आगे बढ़ता है, जो कर्मो की प्रधानता और प्रमुखता को स्थापित करता है। कर्म प्रधानता के दर्शन के आगे सवालों के सिर खुलते हैं कि मरने के बाद आपको कौन याद करेगा, कौन बिसार देगा, आपको कब तक याद किया जाएगा, आपके बारे में क्या कहा जाएगा…? अच्छाई और बुराई की देहरी पर इन सवालों में पसरा मानवीय मनोविज्ञान और महत्वाकांक्षा ही इतिहास की प्रणेता है। इतिहास में अजरता-अमरता का यह कौतुहल ही कभी पाषाणों, कभी शिलालेखों, कभी ताम्रपत्रों और कभी-कभी टाइम कैप्सूलों के रूप में सामने आता है। टाइम कैप्सूल इतिहास के प्रमाण के लिए दस्तावेजीकरण का नया प्रारूप है। भारत के टीवी चैनलों में फिलवक्त दिखाए जा रहे ’चाणक्य’ या ’चन्द्रगुप्त मौर्य’ जैसे ऐतिहासिक सीरियलों में यह डायलॉग अक्सर सुनने को मिलता है कि ’बलशाली सम्राट अपना इतिहास खुद लिखते है।’ यहां बलशाली होने के मायने यह नहीं है कि प्रजा की राजा के बारे में क्या राय है, बल्कि यह है कि राजा खुद अपने बारे में क्या सोचते हैं? राजा का यही सोच ही निरंकुशता का पर्याय है।

शिलालेखों और ताम्रपत्रों में राजा-सम्राटों के गुणगान का इतिहास हजारों साल पुराना है। वर्तमान काल-खण्ड की तासीर कुछ सौ साल पहले वाली दुनिया से अलग है। ऑडियो-वीडियो के मौजूदा दौर में इतिहास की संरचनाओं के टूल अब बदल चुके हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, जबकि टाइम कैप्सूल जैसी अवधारणाओं की उपयोगिता भी सवालों के घेरे में है, राम-मंदिर के निर्माण-स्थल के 2000 फुट नीचे टाइम-कैप्सूल की स्थापना कौतुक पैदा कर रही थी। बहरहाल, राम मंदिर ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने इस बात को गलत बताया है कि पांच अगस्त के शिलान्यास-समारोह के दिन टाइम कैप्सूल जमीन के अंदर गाड़ा जाएगा।

राम-मंदिर के स्थापना समारोह में टाइम कैप्सूल के जिक्र ने इतिहास में दर्ज होने की ख्वाहिशों की मीमांसा को नए आयाम दिए हैं। टाइम कैप्सूल एक कंटेनर होता है, जिसमें मौजूदा वक्त और हस्तियों से जुड़े दस्तावेज रखे जातें है। कंटेनर एलॉय,पॉलीमर, पाइरेक्स मटेरियल के बनते हैं। टाइम-कैप्सूल के भीतर वैक्यूम होता है। आग इसे जला नहीं सकती है और जमीन के भीतर हजारो साल तक इस नुकसान नहीं होता है।

वैसे टाइम कैप्सूल का प्रचलन विदेशो में ज्यादा है, लेकिन भारत भी इसके इस्तेमाल मे पीछे नहीं रहा है। भारत में इंदिरा गांधी(1973) में नरेन्द्र मोदी (2011) में अपने-अपने टाइम कैप्सूल जमीन मे उतार चुके हैं। सबसे पहले इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को लाल किले के सामने जमीन पर टाइम कैप्सूल गाड़ा गया था। यह वह दौर था, जबकि भारत में कांग्रेस के गलियारों में ’इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा बहुतायत में प्रचलित था। इस टाइम कैप्सूल में आजादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर आजादी की बाद की घटनाओं और तथ्यों से जुड़े दस्तावेज रखे गए थे। दस हजार शब्दों के इस दस्तावेज का नाम था-’इंडिया आफ्टर इन्डिपेन्डेंस’। इंदिरा गांधी की सरकार ने इस दस्तावेज को तैयार करने का काम इंडियन कांउन्सिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च को सौंपा था। इंदिरा-सरकार की इस पहल पर उस वक्त काफी राजनीतिक वाद-विवाद हुआ था। इंदिरा गांधी पर आरोप लगा था कि उन्होने अपना और अपने परिवार का महिमा मंडन किया है। बाद में 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार के दौर में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई लाल किले के सामने गड़े इस काल-पत्र को खोद निकाला था। लेकिन सरकार ने कभी यह नही बताया कि उस काल-पत्र में क्या लिखा था?

टाइम कैप्सूल की महत्वाकांक्षाओं से मोदी का नाम पहली बार नहीं जुड़ रहा है। 2011 में मोदी भी, जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, टाइम कैप्सूल गाड़ने के मामले में विपक्ष की आलोचनाओं का शिकार हो चुके हैं। विपक्ष का कहना है कि यह काल-पत्र गांधी नगर स्थित महात्मा मंदिर के नीचे गाड़ा गया था। इसमे मोदी की उपलब्धियों का बखान किया गया था। वैसे यह जानकारी भी सामने आई है कि विश्‍व हिंदू परिषद के महासचिव अशोक सिंहल भी 1989 में गर्भ गृह के सामने एक ताम्र पत्र गाड़ चुके हैं। उस वक्त राम मंदिर का शिलान्यास भी हुआ था।

इतिहास में दर्ज होने की चाहत के कई आयाम है। वर्तमान घटनाओं की इबारत भविष्य की लिपि होना जरूरी नहीं है। हर सभ्यताओं के अपने तकाजे होते हैं, अपने सवाल होते हैं। समय अपने हिसाब से ऐतिहासिक पात्रों की समीक्षा करता है। इसलिए भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के इस कथन को कभी भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि- ’अगर मरने के बाद भी जीना है तो एक काम जरूर करना कि पढ़ने लायक कुछ लिख जाओ या फिर लिखने लायक कुछ कर जाओ।’

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