टूटे हुए पुल पर बैठकर सिसकते विकास की पीड़ा

बिहार के गोपालगंज में गंडक नदी पर 264 करोड़ की लागत से बना पुल जमीन पर खड़ा नहीं रह सका। उदघाटन के अवसर पर लगाए गये हार-फूल पूरी तरह सूखे भी नहीं थे कि उससे पहले ही पुल किसी अल्पमत सरकार की भांति ढेर हो गया। आठ वर्षों से निर्मित हो रहा सरकारी विकास आठ सप्ताह भी जीवित नहीं रह सका।

पुल की मौत पर विपक्ष चीत्कार कर रहा है। चैनलें आँसू बहा रही है। जनता उदास होकर टूटा हुआ पुल देख रही है।विकासवादी सरकार का कहना है कि ऐसी छोटी-मोटी घटनाएँ तो होती रहती हैं। पुल बनाना सरकार की जिम्मेवारी है। उसे खड़ा रखना सरकार का दायित्व नहीं है। इन दिनों नदी भी विपक्षी दल की भांति व्यवहार करने लगी है। वह सुशासन का दावा करने वाली सरकार की किरकिरी करने पर आमादा है। थोड़ा सा सम्हलकर बहती तो कौनसा आसमान टूट जाता। नए-नवेले पुल का थोड़ा तो ध्यान रखना था। लेकिन निष्ठुर नदी अपने बहाव के साथ पुल भी बहाकर ले गयी। इतने महंगे विकास का इस तरह बह जाना निश्‍चय ही चिंताजनक है। राज्य के चुनाव पास है और विकास ढह गया। खड़ा पुल बह गया और ढेरों सवाल खड़े हो गये। अब सरकार क्या जवाब दे।

इन दिनों पुल और विधायकों का कोई भरोसा नहीं है। पुल नदी की लहरों में तो विधायक स्वार्थ की लहरों मेँ बह जाते हैं। जनता कभी पुल देखती है तो कभी अपने भाग्य विधताओं को निहारती है। असंतोष की जब बाढ़ आती है तो सरकार विधायकों सहित पाँच सितारा होटल जैसे सुरक्षित स्थल का आश्रय लेती है। जनता नंगे पाँव जमीन पर खड़ी रहती है और सरकार होटल के रेशमी गद्दों पर बैठकर प्रजातन्त्र बचाने का संघर्ष करती है। यह तय करना मुश्किल है कि पुल और राजनीति मेँ कौन ज्यादा तेजी से गिर रहा है। पुल के रहने न रहने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन सरकार का रहना जरूरी है। यदि सरकार रहेगी तो पुल फिर से बन जायेगा।

वैसे सरकारी विकास की अपनी गति और नियति होती है। तेजी से चलती सरकार का विकास अक्सर घोंघे की गति से सरकता है। कई बार तो यह गति इतनी धीमी होती है कि राजधानी से निकला विकास सत्तर-पचहत्तर साल में भी गाँव तक नहीं पहुँच पाता है। आखिर सरकार विकास को कितना धकेले। उसके पास और भी हजार काम हैं। अब यहाँ सरकारी विकास आठ वर्षों तक लगातार चलता रहा। तब कहीं जाकर फाइलों से जमीन पर उतरकर पुल की शक्ल ले सका। सरकार पुल तो बना सकती है,लेकिन उसके खड़े रहने की गारंटी तो नहीं ले सकती। जब जीवन का कोई भरोसा नहीं तो सरकारी पुल का कैसे भरोसा किया जा सकता है। वैसे सरकार ने पुल पर लिखवा दिया था कि हम विश्‍वास का सेतु बनाते हैं। लेकिन जब विश्‍वास ही खंडित हो जाये तो फिर सेतु की क्या बिसात।

वैसे सरकार खुद खड़े रहकर तो विकास नहीं कर सकती। उसके पास और भी काम हैं। इसलिए सरकार विकास का ठेका दे देती है। जब ठेके पर विकास होता है तो उसके टिकाऊपन की गारंटी साक्षात ब्रह्मा भी नहीं ले सकते। आखिर ठेकेदार कभी पेट होता है। उसे अफसरों की कोठियों की मजबूती का भी ध्यान रखना होता है। नेताओं को चढ़ावा भी भेंट करना होता है। इन सब बाधाओं को पार करने के पश्‍चात यदि किसी तरह विकास के रूप में पुल खड़ा हो जाता है तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। इतना खर्च करके सरकार ने भले ही महीने भर के लिए ही सही,विकास तो किया।

सरकार को प्रजा के रोजगार की भी चिंता है। यदि सरकारी विकास चिर स्थायी रहेगा तो फिर रोजगार के अवसरों का सृजन कैसे हो सकेगा। सरकारी विकास ढहकर रोजगार के अवसर निर्मित करता है।सरकार की यह विकासवादी सोच सचमुच प्रजातांत्रिक धरोहर  है।

सुधीर कुमार चौधरी

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