तकनीकी बदलाव के बावजूद सदाबहार भारतीय सिने गीतों का सम्मान कीजिए

भारतीय फिल्म इतिहास ने अपने 100 वर्ष 2013 में पूरे किये । भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के पितामह दादा साहब फाल्के ने वर्ष 1913 में पहली फिल्म राजा हरिश्‍चंद्र बनाई थी।  पहली बोलती फिल्म आलम आरा को कहा जाता है जो वर्ष 1931  में बनी, मतलब 89 साल पहले। 11 साल बाद भारतीय फिल्म उद्योग बोलती फिल्मों की शताब्दी मनाएगा । इन वर्षो में भारतीय फिल्म उद्योग ने इतनी तरक्की की कि फिल्म और टिकट की संख्या के आधार पर विश्‍व का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग बन चुका है ।  इसमें महत्वपूर्ण योगदान उस भारतीय समाज का है जो पिछले 70 वर्षो में अपनी शिक्षा और एंटरप्राइज़ के दम पर दुनिया के हर देश में अपनी जगह बना चुका है। इसने भारतीय फिल्म उद्योग को अंतर राष्ट्रीय बाजार दिया।  इसी विकास के चलते भारतीय सिने जगत ने बदलती तकनीक को तेजी से अपनाया।  इसने भी उद्योग के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पर मुझे लगता है सबसे महत्त्व पूर्ण योगदान अगर किसी  का रहा है तो वह भारतीय फिल्म संगीत है।  तकनीक में बड़े- बड़े परिवर्तन हुए ।  जैसे -जैसे तकनीक बदलती गई वैसे वैसे पुरानी तकनीक से बनी फिल्में बाजार से बाहर होती गई।  कल बनी श्‍वेत  श्याम फिल्मो का बस ऐतिहासिक महत्त्व रह गया है।  पर भारतीय फिल्म  संगीत ही ऐसा रहा जो तकनीक के बदलाव के बावजूद जिन्दा रहा ।  जिन्दा ही नहीं रहा पुरानी शराब की तरह उसका नशा बढ़ता ही चला गया। वे फिल्में  जो आज से 50 से लगाकर 75 साल या उससे भी पहले बनी , भले ही भुला दी गई हो , उनके गीत आज भी उसी चाव से सुने जाते है।  कितने ही परिवारों में पीढ़ियों की सारी पसंद बदल गई परन्तु उनकी तीन तीन पीढ़ियां एक ही गीत को पसंद करती है।  इसने उन फिल्मों  की याद को भी  जिन्दा रखा।
यू  ट्यूब के अवतरण के पूर्व तक इन गीतों के ग्राहक आपको कहीं भी मिल सकते थे।  पहले कैसेट और बाद में सीडी उद्योग इन्ही गीतों के कारण  विकसित हुआ।  यू ट्यूब के बाद यदि सीडी उद्योग  बैठ गया तो इससे भी हिंदी फिल्म संगीत के  महत्व  को समझा जा सकता है।  फिल्म संगीत का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है की यह किसी एक व्यक्ति नहीं सामूहिक प्रयास का परिणाम है। किसी गीत के लिए कोई व्यक्ति नहीं पूरी टीम को  श्रेय था।  गीतकार , संगीतकार और गायक तो सदैव महत्वपूर्ण रहे , उस जमाने में ऑर्केस्ट्रा भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा याद कीजिये फिल्म नागिन का वह गीत मन डोले ,तन डोले ।  इस टीम के लिए जितने गीतकार , संगीतकार और गायक तो महत्वपूर्ण थे उससे कम कल्याण जी ( कल्याण जी आनंद जी )  नहीं थे जिनने उस गीत में किसी अन्य इंस्ट्रूमेंट से बीन की धुन बजाई थी।  कहा तो यहाँ तक जाता था कि बीन की धुन सुनकर सिनेमा हॉल में सांप आ जाते थे।  

एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष हिंदी फिल्म संगीत का यह  भी रहा कि स्वतंत्रता  आंदोलन और उस समय बने सामाजिक मूल्यों का उन पर पूरा असर रहा।  अनेक राष्ट्रीय गीत उन गीतकारों की कलम से निकले जो गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे।  बापू की अमर कहानी , साबरमती के संत , ये देश है वीर जवानो का जैसे अनेक गीत है जो आज भी समाज में एक जज्बा पैदा करते है।  पर उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पार्टीशन से उपजी साम्प्रदायिकता का कोई असर इन गीतों के रचनाकारों पर नहीं था ।  एक ही उदाहरण दूंगा। बैजू बावरा ( 1952 ) का वह गीत जिसे आज भी सुना जाता है , मन हरि दर्शन को आज।  इसका महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि इसे लिखा शकील बदायूनी ने, गाया मोहम्मद रफ़ी ने और संगीत दिया नौशाद ने।  आज के वातावरण में थोड़ा अविश्‍वसनीय सा लगता है।  देश के विभाजन से उपजी कड़वाहट से  इन कलाकारों ने खुद को बचा लिया।  यही हिंदी फिल्म संगीत को और उंचाईयों पर ले जाता है।

भारतीय फिल्मो के 100 साल के इतिहास को देश ने पूरा सम्मान दिया।  दादा साहब फाल्के से लगा कर उन सभी लोगो को जिनका  महत्वपूर्ण योगदान रहा  देश ने याद किया।  उनकी याद को जीवंत बनाये रखने के  लिए कुछ प्रयोजन किये।  मुझे विदेशी संगीत का ज्ञान नहीं है पर अनेक लोगो से बात करने के बाद मै यह समझ पाया हूँ कि शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसका 75 से अधिक वर्ष पुराना फिल्म  संगीत  इस संख्या में सुना जाता हो ।  

 इन गीतों की जीवंतता पर बात करे।  यदि मै पिछले 25 से 50 वर्षो में रचे और लोकप्रिय हुए गीतों की बात करूं  तो पता नहीं फेहरिस्त कितनी लम्बी होगी।  50 से 75 साल के गीतों को याद कीजिये । क्या आपको नहीं लगता जिस हिंदी फ़िल्म  संगीत ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को इतनी उचाईयो पर पहुंचाया हो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।  यह किसी गीतकार, संगीतकार या गायक का सम्मान नहीं उस प्रयास का सम्मान है जो सामूहिक रूप से हुआ।  यह उस जज्बे  का सम्मान है जो आज़ादी की लड़ाई और देश के बंटवारे के जमाने में देश को नयी दिशा और हौंसला दे रहा था।  देश के संगीत और संस्कृति की महान विरासत को जिन्दा रख रहा था।

 सरकार  और समाज सोचे।  इस वर्ष कुछ गीतों  की प्लैटिनम जुबली मनाये ।  मुझे  चार  गाने याद आ रहे है।  1945 में जोहरा बाई अम्बालेवाली की गायी कव्वाली , आहें न भरी शिकवे ना किये कुछ भी न जबां  से काम लिया।  आज भी विविध भारती  पर आप अक्सर सुन सकते है।  दूसरा सी एच आत्मा का गाया प्रीतम आन मिलो ।  यह एक गैर फ़िल्मी गीत है पर किसी भी फ़िल्मी गीत से ज्यादा ही सुना जा रहा है। तीसरा नूरजहाँ का गाया फिल्म गाँव की गौरी का गीत किस तरह भुलेगा  दिल उनका ख्याल आया हुआ और चौथा  मुकेश का इसी वर्ष का गीत दिल जलता है तो जलने दे।  फिर दोहरा रहा हूँ।  ये गीत प्लैटिनम ज्युबिली मना रहे हैं, 75 वां जन्म दिन।  क्या इस उपलब्धि को ऐसे ही छोड़ देना चाहिए।  उन गीतकारों , संगीतकारों और गायको के साथ उनकी पूरी टीम के प्रति हमारा कोई दायित्व नहीं है।  मैंने अपनी बात कहने को चार गाने चुने । 45 के आसपास बहुत से हो सकते है।  अगले ही साल हम शाहजहां में के एल सहगल का गाया , मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और नौशाद का संगीतबद्ध किया उस गाने की प्लैटिनम जुबली मनाएंगे  जिसके लिए उस महान  गायक ने कहा था , इसे मेरी शव यात्रा के साथ बजाया जाए , हम जी कर क्या करेंगे , जब दिल ही टूट गया। उसी फिल्म के दूसरे गीत भी ।  प्लैटिनम जुबली से मै अपनी बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ।  एक परम्परा  प्रारम्भ कीजिये ।  उस संस्कृति से भारतीय फिल्म उद्योग और देश को बाहर निकालिये जो संगीत को वहां पहुचा  रही है जो हॉल से बाहर निकलते ही जेहन से निकल जाए ।  जो यह तर्क दे कि वक्त के साथ सब कुछ बदलता है , उन्हें बताना तो होगा कि 75 -80  साल में इन गीतों की लोकप्रियता क्यों नहीं बदली ।  यदि हमारी आध्यात्मिकता शाश्‍वत है तो उससे जुडी यह संगीत की धारा भी शाश्‍वत है , निरंतर प्रवाहित होने वाली।  जो मानते है श्रोता और दर्शक बदल गए है , उनको मै कहूंगा किसी विवाह के महिला संगीत के कार्यक्रम में जाइये। आज भी युवा उन गानों पर थिरक रहे है जो तब बने थे जब वे पैदा भी नहीं हुए थे।  

प्लैटिनम जुबली पर बात समाप्त नहीं होती।  कुछ और गाने याद कीजिये । 1935 में देवदास फिल्म का के एल सहगल का गीत बालम आया बसो मोरे मन में और 1939 का फिल्म दुश्मन का गाया गीत  करूँ क्या आस निरास भई । उसी वर्ष  पंकज मलिक का गाना पिया मिलन को जाना और 1941 में आयी बहार, आयी बहार । और 1944 में फिर के एल सहगल के  फिल्म माय सिस्टर के  गीत ए कातिबे तकदीर बता क्या मैने किया है  और दो नैना मतवाले । कुछ वर्षो बाद ये शताब्दी मनाएंगे। अगले साल का प्लैटिनम जुबली गीत जिसे बीबीसी ने कितने वर्षो बाद नूरजहां से आग्रह कर अपने स्टूडियो में गवाया और वर्ष 1982  में जब वे बंटवारे के बाद पहली  बार  हिंदुस्तान  आयी  तो लता जी के आग्रह पर गाया फिल्म अनमोल घड़ी  का गीत आवाज दे कहाँ है आज भी जब रेडियो पर आता है तो चलता मुसाफिर रूक जाता है।   1948 से लताजी ने हिंदी फिल्मो में गाना शुरू किया और 1949 में महल के गाये उनके गीत आएगा आने वाला के बाद तो वे सुनामी बन गयी ।  वर्षो से स्थापित महान गायकों को एक ही गीत से विस्थापित कर लता मंगेशकर ऐसा नाम हो गई जो भारतीय फिल्माकाश पर 70 से अधिक वर्षो तक छाया रहा। चार साल बाद यह गीत प्लैटिनम जुबली मनाएगा ।  मोहम्मद रफ़ी 1947 में नूरजहां के साथ अनमोल घडी में यहाँ बदला वफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है  गाकर पुरुष सुनामी बन गए।  इन दोनों महान गायको ने फिल्म संगीत की धारा ही बदल दी।

तलत महमूद के बिना बात खतम नहीं हो सकती है।  सीने में सुलगते  है अरमां ( तराना -1951 ), मेरी याद में ना तुम आंसू बहाना ( मदहोश -1951 ) , अंधे जहाँ के अंधे रास्ते  ( पतिता 1953 ), शाम ए  गम की कसम ( फुटपाथ 1953 ), रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाए (एक गाँव की कहानी 1957 ) इत्यादि।  पर मै याद दिला रहा हूँ वह गाना जो गैर फ़िल्मी था , तलत महमूद ने  कलकत्ता  में अस्सी साल पहले  1940  तब गाया, जब वे मात्र 16 साल के थे और  तपन कुमार के नाम से गाया करते थे ,  सब दिन एक समान नहीं है… । इस गैर फ़िल्मी गीत ने, जिसे आज भी सुना जाता है,  तलत महमूद को स्थापित किया और वे गजलों का बादशाह कहे जाने लगे।  

वर्ष 2020  में मै कुछ गीतों की प्लैटिनम जुबली मनाने का आग्रह कर रहा हूँ।  इसलिए कि इस परंपरा को बनाया जाना चाहिए।  हम ताकि कुछ ही वर्षो में हम कुछ गीतों की शताब्दी मना सके। इन गीतों के सम्मान में केंद्र सरकार डाक टिकिट जारी करे।  यह न केवल उन महान कलाकारों को याद करने का हमें अवसर देगा।  देश और दुनिया की नई  पीढ़ियों को भारतीय संगीत की महानता की याद भी दिलाता रहेगा। 

नरेन्द्र नाहटा
लेखक प्रदेश के केबिनेट मंत्री रह चुके हैं।

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