दलबदल कर पाया मंत्री पद अब चुनावी ‘भँवर’ में फंसे

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अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित अनूपपुर विधानसभा क्षेत्र में जो उपचुनाव हो रहा है उसके नतीजे से ही यह पता चल सकेगा कि राज्य विधानसभा में छठवीं बार प्रवेश कर शिवराज सरकार में हाल ही में खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मामलों के मंत्री बने बिसाहूलाल सिंह अपना मंत्री पद बचा पाएंगे या नहीं, या उनके दलबदल के बाद जिन अरमानों की पूर्ति हुई है उसे जमींदोज करने में कांग्रेस उम्मीदवार विश्वनाथ सिंह कुंजाम सफल हो जाएंगे। कांग्रेस ने कुंजाम को मैदान में उतार कर अपनी जिस राह को बिसाहूलाल आसान समझ रहे थे उसमें कांटे बिछा दिए हैं। इसका एक कारण यह है कि बिसाहूलाल ने पिछले 5 चुनाव जीते थे पंजा चुनाव चिन्ह पर, जो अब कुंजाम के पास होगा और बिसाहूलाल उस कमल निशान पर चुनाव मैदान में होंगे जिसे वह 5 बार शिकस्त दे चुके हैं। बिसाहूलाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने दलबदल के औचित्य पर मतदाताओं का विश्वास अर्जित करना और जो आज तक कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर उन्हें वोट देते रहे हैं उन्हें भाजपा के चुनाव चिन्ह पर वोट देने के लिए राजी करना ही होगा।

इस उपचुनाव में बिसाहूलाल के सामने कांग्रेस के कुंजाम एक बड़ी चुनौती बनकर इसलिए उभर रहे हैं क्योंकि वे भी गोंड जाति से आते हैं और बिसाहूलाल भी उसी जाति के हैं। विश्वनाथ सिंह कुंजाम पंचायती राजनीति के धुरंधर माने जाते हैं और आदिवासियों के इस गढ़ में कांग्रेस का पहले से ही अच्छा प्रभाव रहा है। कुछ अपने स्वयं के प्रभाव के कारण और दूसरे कांग्रेस की मजबूत पकड़ होने के कारण बिसाहूलाल 5 बार विधायक बन चुके हैं और यदि 5 विधानसभा चुनाव को ही देखा जाए तो 1998 से लेकर 2018 तक के विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा के रामलाल रौतेल से होता रहा है और रौतेल भी दो बार 2003 तथा 2013 के चुनाव में बिसाहूलाल को पटकनी दे चुके हैं। बिसाहूलाल ने 2018 के चुनावों में भाजपा के रौतेल को 11561 मतों के अंतर से पराजित किया था। जब कांग्रेस ने कुंजाम को अपना उम्मीदवार घोषित किया तब पूर्व नेता प्रतिपक्ष तथा पूर्व मंत्री अजय सिंह ने मीडिया के द्वारा पूछे जाने पर कि, क्या कुंजाम बिसाहूलाल का मुकाबला कर पाएंगे, का उत्तर देते हुए कहा मुकाबला ही नहीं करेंगे बल्कि कुंजाम चुनाव जीतेंगे भी। क्षेत्र में भले ही कांग्रेस का प्रभारी कोई भी हो लेकिन अजय सिंह का समर्थन कुंजाम की स्थिति को मजबूत करने वाला साबित हो सकता है। भाजपा यहां की जमीनी हकीकत से रूबरू है इसलिए वह ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की पूरी कोशिश कर रही है ताकि बिसाहूलाल की चुनावी वैतरणी पार हो जाए। चुरहट के भाजपा विधायक शरदेंदु तिवारी को प्रदेश महामंत्री बनाया गया है। पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला जो कि विंध्याचल में भाजपा का एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं और जिन्होंने 2018 विधानसभा चुनाव में भाजपा को इस अंचल में अच्छी खासी सफलता दिलाने में अहम भूमिका अदा की थी, को चुनाव प्रभारी बनाकर बिसाहूलाल की चुनावी वैतरणी पार कराने की जिम्मेदारी सौंपी है और साथ में पूर्व मंत्री संजय पाठक को भी यही जिम्मेवारी सौंपी है। भाजपा ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रही है इस दृष्टि से यदि यह तीनों नेता सक्रिय हो जाते हैं तब बिसाहूलाल की चुनावी राह कुछ आसान हो जाएगी। कांग्रेस ने यहां का प्रभारी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति को बनाया है ताकि अन्य वर्गों के मतदाताओं को भी साधा जा सके। कांग्रेस अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ ही अपने ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं को भी चुनावी प्रचार में लगाएगी। इस उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। भाजपा की पूरी-पूरी कोशिश होगी कि बिसाहूलाल को जिताकर कांग्रेस के इस मजबूत इलाके में अपनी पकड़ बनाए जबकि कांग्रेस इसे किसी भी कीमत पर अपना गढ़ बनाए रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएगी। भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही उम्मीदवार गोंड जाति के हैं इसलिए कोल, सवर्ण और अन्य पिछड़ा वर्गों के मतदाता प्रत्याशियों की जीत हार में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे।

1 लाख 74 हजार मतदाता वाले इस क्षेत्र में कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में 11 हजार 561 मतों के अंतर से भाजपा के रामलाल रौतेल को पराजित किया था। अनूपपुर क्षेत्र में 27 हजार गोंड,16 हजार कोल, 35 हजार सवर्ण,17 हजार पटेल और करीब 23 हजार राठौर मतदाता हैं। बिसाहूलाल का पिछले 5 चुनावों में कोल जाति के रौतेल से मुकाबला होता रहा है। रौतेल की पराजय से कोल आदिवासी निराश थे किंतु अब भाजपा द्वारा उनके धुर- विरोधी बिसाहूलाल को मुख्यधारा में लाकर रामलाल को हाशिए में ढकेलने से काफी नाराज बताए जाते हैं। जो आगामी उपचुनाव में भाजपा के लिए सिरदर्द हो सकता है। इसलिए भाजपा को कोल मतदाताओं को साधने में मशक्कत करना पड़ेगी। वैसे रौतेल बिसाहूलाल के साथ नजर आ रहे हैं, पर इतने से काम नहीं चलेगा बल्कि उन्हें अपने समाज के मतदाताओं को एकजुट कर भाजपा के पाले में ही रखने की मशक्कत भी करना होगी। संभवत यही कारण है कि क्षेत्र के सवर्ण मतदाताओं का समर्थन जुटाने के साथ ही पार्टी में लगातार उठ रहे असंतोष को कम करने के लिए भाजपा ने राजेंद्र शुक्ला और संजय पाठक को लगाया हुआ है। भाजपा और कांग्रेस में से जो भी गैर आदिवासी मतदाताओं को अधिक से अधिक अपने पाले में कर पाएगा और अपने दल में होने वाले भितरघात को नियंत्रित कर पाएगा उतनी ही उसकी जीत की संभावनाएं बढ़ती जाएंगी।

और अंत में….

बिसाहूलाल सिंह ने कांग्रेस और राज्य विधानसभा से त्यागपत्र देते समय एक बात बार-बार कही थी कि वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद कमलनाथ ने मंत्री नहीं बनाया। उनको रह-रह कर मंत्री ना बन पाने की जो टीस थी वह दल बदल कर पद पाने के साथ ही दूर हो गई। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर मतदाताओं पर निर्भर करता है कि दल बदल कर पाया मंत्री पद चुनावी भंवर में फंसा हुआ है उसे वे निकालेंगे या नहीं ।

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