नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति: देश में बुनियादी बदलाव की पहल

पिछले तीन दशकों में भारतवर्ष की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, तकनीक एवं संचार तथा पर्यावरणीय परिस्थितियां बहुत तेजी से बदली हैं। शिक्षा का अधिकार कानून तथा अन्य कोशिशों से शिक्षा की पहुँच, प्रसार तथा विस्तार बढ़ा है। साथ ही भारत में भीतर से तथा वैश्‍विक स्तर पर ढ़ेरों चुनौतियों के साथ-साथ अवसर भी उभरे हैं। शिक्षा आज गुणवत्ता, समता, समावेशिता तथा समग्रता से दूर है। शिक्षा किसी भी देश, समाज, समुदाय तथा व्यक्ति के समग्र रूपान्तरण तथा विकास का सबसे महत्वपूर्ण जरिया होता है।

इक्कीसवीं सदी का भारत की शिक्षा नीति में बुनियादी बदलाव की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही थी। अत: लम्बे इन्तजार के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू की जा रही है। साथ ही सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में शिक्षातन्त्र को समग्र, समावेशी, समान, संस्कारी तथा युगानुकूल बनाने का वादा पूरा किया है। यह स्कूली शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा तक की शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल बदलाव, लोचशीलता तथा इक्कीसवीं सदी की वैश्‍विक चुनौतियों का सामना करने में युवाओं को सक्षम बनाने के मकसद से एक बड़ी पहल है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने के लिए चिन्तन तथा विमर्श की प्रक्रिया वर्ष 2015 से ही आरम्भ थी। पूर्व इसरो प्रमुख प्रोफेसर कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में शिक्षाविदों की एक समिति ने भारतीय शिक्षा प्रणाली में स्कूली शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा एवं शोध तक के विचारणीय मुद्दों और आवश्यक परिवर्तनों के बारे में देशभर से विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से प्राप्त दो लाख से अधिक प्रतिक्रियाओं तथा सुझावों को
आमन्त्रित कर राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत केंद्रित नीति है। यह भारतीय युवाओं को आधुनिकतम शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों से भी जोड़ेगी। इसमे शिक्षा को ’ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, विचार और संस्कार’ से जोड़ने का प्रयत्न है। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सेकेण्डरी तक की शिक्षा सबको देते हुए सौ प्रतिशत जीईआर करने तथा उच्चशिक्षा में जिसमें व्यावसायिक शिक्षा भी शामिल है, जीईआर 26.3 प्रतिशत से बढ़ाकर वर्ष 2035 तक 50 प्रतिशत करना है। शिक्षा क्षेत्र में वर्तमान सार्वजनिक निवेश 4.43 प्रतिशत को बढ़ाकर 6 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य है। सबसे महत्वपूर्ण है आने वाले बीस वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था तथा स्वरूप को पूरी तरह से बदलकर विश्‍वस्तर की शिक्षा प्रणाली बनाना है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत एक केंद्रीय निकाय गठित होगा जो राज्यस्तरीय शिक्षा मण्डलों को विनियमित करेगा। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के लिए मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा में शिक्षण की व्यवस्था होगी। समान, समग्र एवं बहुविषयक शिक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए मनपसन्द विषय चयन में आजादी होगी। वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत सोच विकसित करना शिक्षा व्यवस्था का प्रयत्न होगा। सह पाठ्यक्रम जैसे खेल, व्यावसायिक शिक्षा, कला, वाणिज्य, विज्ञान हर स्तर पर होंगे। छात्र को अपने मनपसंद पाठ्यक्रम चुनने की आजादी होगी। यह बहुभाषी शिक्षा प्रणाली पर केंद्रित होगी, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाया जाएगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूलशिक्षा 10+2 प्रणाली बदलकर 5+3+3+4 प्रारूप में लागू होगी। पहली बार इसमें तीन से छ: वर्ष तक की उम्र की बच्चों के प्री-स्कूलिंग को भी शामिल किया गया है। इसमें स्कूल के पहले पांच साल में (प्री स्कूलिंग के तीन साल और कक्षा 1 और 2 सहित) फाउंडेशन स्टेज शामिल होंगे। अगले तीन साल (कक्षा 3 से 5) शिक्षा तैयारी का चरण होगा। बाद में तीन साल मध्यचरण (कक्षा 6 से 8) और माध्यमिक अवस्था के चार वर्ष (कक्षा 9 से 12) स्कूलों में अध्ययन करना होगा।  स्नातक उपाधि तीन अथवा चार साल की अवधि की होगी, जिसमें निकास के विकल्प होंगे। विद्यार्थी को एक वर्ष पूरा कर अध्ययन समाप्त करने पर सर्टिफिकेट, दो वर्ष पूर्ण कर अध्ययन समाप्त करने पर डिप्लोमा और तीन साल पूर्ण करने के बाद स्नातक डिग्री मिलेगी। जो युवा नौकरी में जाना चाहते हैं वे तीन साल का स्नातक डिग्री कार्यक्रम करेंगे। शोध में जाने के लिए चार साल का स्नातक डिग्री कार्यक्रम तथा एक साल का स्नातकोत्तर डिग्री कार्यक्रम पूरा करना होगा। हालांकि, चार वर्षीय बहुविषयक बैचलर कार्यक्रम, पसंदीदा विकल्प होगा और छात्र द्वारा साथ में प्रोजेक्ट करने पर शोध के साथ डिग्री मिले

राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत की प्रीस्कूलिंग तथा विद्यालयीन शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा तथा शोध तक लोगों की पंहुच एवं समावेशन, विषय चयन में लोचशीलता, गुणवत्ता, छात्रों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रवेश से लेकर मूल्यांकन तक कर व्यवस्था सुधारने की पहल है। शिक्षा में स्वायत्तता एवं गुणवत्ता के साथ-साथ इसका जमीनी विस्तार करना ही होगा। परन्तु इसमें कामयाबी तभी होगी जब यह धरातल पर सही रूप से लागू हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सैद्धान्तिक मूल्योंकन से अधिक महत्वपूर्ण है व्यवहारिक रूप लागू करने की प्रतिबद्धत्ता एवं इमानदारी।

डॉ. सत्येन्द्र किशोर मिश्र
(लेखक विक्रम विवि उज्जैन में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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