निजी कंपनियों द्बारा कोयले की लूट से और बिगड़ेगा पर्यावरण

अभी हाल में अपने ही बनाए ‘गो-गो’ और ‘नो-गो’ क्षेत्रों के कानूनी प्रावधानों को ठेंगे पर मारते हुए सरकार ने इकतालीस कोयला खदानों को अनुमति दी है। ‘आत्म’निर्भरता’ के ताजे सरकारी नारे के तहत दी गई इन अनुमतियों में उन जंगलों, नदियों, जमीनों आदि की कोई परवाह नहीं की गई है जिनसे इंसानी जीवन की बुनियादी जरूरतें जुडी हैं। उलटे कहा जा रहा है कि ये खदानें ‘कोविड-काल’ में बढी बेरोजगारी से निपटने में मददगार साबित होंगी।

घने जंगलों को काटकर खनन करने के लिए सरकार ने निजी कम्पनियों को छूट दे दी है, जबकि जंगलों को उजाडे बिना, देश की जरुरत पूरी करने के लिए पर्याप्त कोयला भंडार भारत के पास मौजूद है। समझ नहीं आ रहा कि हमारी सरकार वन्य जीव अभयारण्यों को, जो कि जैव-विविधता के खजाने हैं और प्रकृति अनुकूलन की राह पर देश को चलाने के रास्ते हैं, पर लूट की छूट क्यों दे रही है? जून में 41 कोयला खदानों की नीलामी के विरुद्ध झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर करने का ऐलान किया था। इससे पहले उन्होंने भारत सरकार को चिट्ठी लिखकर, कोयला खदानें निजी कम्पनियों को देने पर रोक लगाने का निवेदन किया था। इनके साथ-साथ छत्तीसगढ़ के ‘वन एवं पर्यावरण मंत्री’ ने जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्रदूषण बढाने वाले इस उल्टे काम को रोकने का निवेदन किया था। उनका कहना था कि हसदेव अभयारण्य जैसे घने जंगलों में खनन नहीं होना चाहिए। इस खनन के विरुद्ध कांग्रेस भी लामबंद हुई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी इस नीलामी को निरस्त करने की अपील की थी।

कुल 41 खदानों में से 29 झारखंड, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हैं और बाकी की 12 खदानें उडीसा व महाराष्ट्र में। ऊपर से बडी बेशर्मी के साथ भारत सरकार कह रही है कि इन खदानों के द्वारा हम कोरोना से बचने के लिए अवसर सर्जित करेंगे। साथ में आत्मनिर्भर बनने की भी बात कही जा रही है। गृहमंत्री ने 2.8 लाख लोगों को नौकरी दिलाने और 33 हजार करोड़ रुपयों का निवेश लाने के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी कोयला खनन के संदर्भ में ‘लालीपाप’ देने की बातें कही हैं।
अलबत्ता, भारत के किसी भी राजनेता ने घने जंगलों, जल, जमीन की बर्बादी को उजागर नहीं किया है। इन खदानों से नदियां, जल, जंगल, जमीन, जानवर सब बर्बाद होगें, वे इस बात को छिपा रहे हैं। इस नीलामी से हसदेव अभयारण्य  के 87 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल में लगे घने जंगल नष्ट हो जायेंगे। इसी तरह महाराष्ट्र में बंदेर और मध्यप्रदेश में गोटी टोरिया (पूर्व) कोयला खनन क्षेत्र 80 प्रतिशत से अधिक जंगलों से ढंका हुआ है। खदानों से दामोदर व बकरी जैसी नदियों का जलागम क्षेत्र पूर्णतः नष्ट हो जायेगा।

भारत सरकार ने घने जंगलों पर प्रतिबंधित कोयला खनन की नीति ‘गो-गो’ अनुकूल परिस्थितियों में ‘आगे बढने’ यानि ‘गो-गो’  और घने जंगलों, जलस्रोतों आदि के इलाकों में हर हाल में ‘रोकने’ यानि ‘नो-गो’  की नीतियां को भी एकदम दरकिनार कर दिया है, क्योंकि अब जो खनन दिया जा रहा है वो घने जंगलों में होगा। यह सरकार जहां एक तरफ हर घर में नल से जल देने की बात कर रही है, वहीं जल देने वाली नदियों को सुखाने व मारने का काम भी कर रही है। देश के घने जंगलों में कटाई शुरु होने से जल का गहरा संकट पैदा होगा, इस पर सरकार ने विचार नहीं किया है। दूसरी तरफ, सरकार जलवायु परिवर्तन से लडने की अपनी प्रतिबद्धता भी भूल रही है और जंगलों को बचाने वाली नीतियों की अनदेखी कर रही है।

कोयले की जरुरत का गणित देखें तो भारत का कुल उत्पादन 72 करोड़ टन रहा है, जबकि कोयले की कुल खपत 80.1 करोड टन रही है। भारत में कोयले के 14800 करोड टन के ऐसे भंडार हैं जिनके होते हुए नए जंगलों के ‘गो-गो’ क्षेत्रों को काटने की जरुरत नहीं है। ‘कोल इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक भविष्य में भारत को 150 करोड़ टन कोयले की सालाना जरुरत का अनुमान है। इस हिसाब से घने जंगलों के बाहर अभी भी हमारे पास 14800 करोड़ टन का भंडार है। ऐसे में अगले कई दशकों तक भारत को अपने जंगलों को बर्बाद करके कोयला खनन करने की आवश्यनकता नहीं हैं। फिर भी सरकार अपनी जैव-विविधता के भंडारों को नष्ट करने का कार्य क्यों कर रही है, यह समझ से परे है। देश में अभी 600 से अधिक कोल-ब्लॉक हैं, जबकि केवल 50-60 कोल ब्लॉकों से ही अधिकांश कोयला निकाला जाता है। इसलिए जंगलों में खनन की नीलामी करना भारत के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, जल व अन्न सुरक्षा के विपरीत है।

सरकार के इस गलत काम को रोकने के लिए हम सभी को एकजुट होकर जल, जंगल, जमीन, जंगलवासी और जंगली जानवरों को बचाने के लिए एक मुहिम खडी करनी चाहिए। इस मुहिम की शुरुआत जिन पांच राज्यों में कोयला खनन के पट्टे दिए गए है, वहीं से होनी चाहिए। हम सबको यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह खनन केवल उन पांच राज्यों का नुकसान नहीं करेगा, बल्कि पूरे देश व दुनिया के पर्यावरणीय संकट को जन्म देगा। इसलिए हम सभी की इस काम के लिए बराबर जिम्मेदारी है। ‘कोविड महामारी’ के बुरे वक्त में, जबकि सरकारों को इस महामारी से बचने के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए था, जल, जंगल, जमीन, जंगलवासियों व जंगली जानवरों के विरुद्ध सरकारी मोर्चा खोलना उचित नहीं है। यदि सरकार ने इन कोयला खदानों की अनुमति रद्द नहीं की तो उसे भारी विरोध झेलना पड़ेगा। सरकार वैसा नहीं करके उसी चीन के बताये रास्ते पर चलेगी जिसकी आर्थिक प्रतियोगिता के वैश्‍विक जंजाल में दुनिया का सबसे बड़ा नेता बनने की चाह हमारे देश के विरुद्ध है, तो भारी नुकसान झेलना होगा।

देश की जनता को सोचना चाहिए कि आत्मनिर्भरता के लिए जल, जंगल, जमीन को बर्बाद करके, आर्थिक लाभ की खातिर अपनी सनातन सम्पदा को निजी कम्पनियों को सौंपना खतरनाक होगा। ‘कोविड महामारी’ के समय ही सरकार ने गलत कदम उठाए हैं और उसे जनता का विरोध झेलना पडेगा। भारत के जंगलों को नष्ट करके कोयला खनन हेतु नीलामी करना नैतिकता व न्याय नहीं है। भारत सरकार की नजर में भी नैतिक व न्याय नहीं होगा, लेकिन फिर भी भारत सरकार ने चंद कंपनियों के दबाब में आकर लोकतंत्र पर सवाल खड़े किए हैं।  भारत की आम जनता आजीविका, जीवन, जमीर, जलवायु-परिवर्तन, जल, अन्न, स्वास्थ्य-सुरक्षा हेतु नैतिक व न्याय की लड़ाई के लिए एकजुट होकर साझे भविष्य को नष्ट करने वाले कोयला खनन की नीलामी को रुकवाएगी।

-राजेन्द्र सिंह

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