पांच रुपये के अभाव में समृद्ध मध्यप्रदेश में मौत का तांडव

मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ी स्थिति की चर्चा तो होती है किंतु उसके  निदान की दिशा में कोई काम नहीं होता। प्रदेश की केबिनेट के एक सदस्य और उसके ठीक बाद मुख्यमंत्री का संक्रमित होना प्रदेश के लिये चिंता का विषय है , विशेषकर इसलिये कि प्रदेश के मुखिया का पीरियाडिकल चेक अप होता है और उनके स्वास्थ्य के लिये एक अमले को सदा सजग रहना होता है। हालांकि पूरा प्रदेश उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहा है किंतु उनके संक्रमित होने से इस व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी हैं।

यह तो अब सभी जान चुके हैं कि कोविड एक ऐसी बीमारी है जिसमें जरा सी भी चूक मंहगी साबित हो सकती है। फिर भी अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति के बहाने ही सही प्रदेश की जनस्वास्थ्य व्यवस्था पर नजर डाली जानी चाहिये। 10 साल पहले का स्वघोषित स्वर्णिम मध्यप्रदेश और 5 साल पहले का स्वघोषित समृद्ध मध्य प्रदेश आज किस अवस्था में खड़ा है यह गुना की एक मार्मिक घटना से सामने आ रहा है। गुना के अस्पताल में मात्र 5 रुपये के लिये हुई एक मौत किसी महिला के शेष जीवन को गहन अंधकार से भर देती है। पांच रुपये के अभाव में वह अस्पताल की पर्ची न कटवा पाने से अपने बीमार पति  को भर्ती न कर पाने के कारण उसे बचा नहीं पाती है। एक महिला के जीवन की सारी आशायें लुट गईं उसके पति की मौत हो गई। उसका मासूम बेटा पिता को छू- छूकर गुहार लगाता रहा , पापा उठो न और निर्दयी प्रशासन उसकी ओर नजर डालने भी तैयार नहीं हुआ। क्या ये घटनायें हमें झकझोरतीं हैं अगर नहीं ? तो क्या एक सभ्य समाज के रूप में हम असफल नहीं  हैं ?क्या कभी समृद्ध मध्यप्रदेश के नायकों को भी ऐसी घटनायें झकझोरतीं  हैं? रोज ब रोज जनस्वास्थ्य को लेकर प्रदेश में जो सवाल खड़े हो रहे हैं  क्या उन पर सभी दलों को चिंतित नहीं होना चाहिए ?

भोपाल में एक ही महिला की कोरोना रिपोर्ट दोपहर में नेगेटिव होती है और शाम को पॉजिटिव हो जाती है एक भोपाल नगर निगम कर्मी जिसने अपना सैंपल ही नहीं दिया न ही टेस्ट कराए वह कोरोना पॉजिटिव हो जाता है। इंदौर में 250 मौतें रिकार्ड से चंपत हो जातीं हैं? मुरैना में कोरोना के क्वारेन्टीन सेंटर में लोगों को भोजन ना मिलने के लिए विरोध में प्रदर्शन करना पड़ता है! पन्ना में क्वॉरेंटीन सेंटर में कोई किशोर आत्महत्या कर लेता है ,सतना में एक महिला को पर्ची कटवाने के लिये इतनी देर लाइन में खड़े रहना पड़ता है कि उसकी बच्ची की गोद में ही मौत हो जाती है और इससे भी बढ़कर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी के गृहनगर रायसेन में क्वारेनटीन सेंटर के भोजन में इल्लियां भ्रमण करतीं मिल जातीं हैं क्या यह केवल अव्यवस्था है ? या प्रशासन को घुटने तले रखने वाले गिरोहों का निडर प्रदर्शन ? यह सवाल ही वह सवाल है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता।

खुद स्वास्थ्य मंत्री चौधरी ने यह बताया है कि प्रदेश में सरकार का 85% इंफ्रास्ट्रक्चर खाली पड़ा है। हजारों बेड सूने हैं अस्पतालों में मरीज नहीं है तब फिर इतनी अव्यवस्था क्यों हैं? इतना बड़ा इफ्रास्ट्रक्चर खाली पड़ा है फिर मरीज निजी अस्पतालों में क्यों भेजे जा रहे हैं ? जब मरीज निजी अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं तो अराजकता का शिकार शासकीय चिकित्सालय क्यों हो रहे हैं ? क्या प्रशासन शासन इस पर कभी गौर करता है ? जब अस्पताल प्रशासन पर मात्र 15% का बोझा  है तब हमारे अस्पताल क्यों डगमगा रहे हैं ? क्या समोसा बैठकें इन पर विचार करतीं हैं?
आज हमें ऐसे जनव्यवहार के लिये प्रशिक्षित किया जा रहा है कि किसी भी समस्या का निदान उसके हल में नहीं बल्कि किसी नयी हेडलाईन को फेककर उस समस्या से ध्यान हटाने में है। क्या रोज हैडलाइन बनाने से यह समस्याएं हल हो सकती हैं या शासन को गहरे उतर कर इन दुरावस्थाओं पर सोचना चाहिये। क्या हम जन स्वास्थ्य देने में एक राज्य के रूप में पूरी तरह असफल हो रहे हैं ? क्या जन स्वास्थ्य प्रशासनिक लापरवाही का इस तरह शिकार होगा कि ’उठो न पापा की मासूम चीखें उन्हें सुनाई भी न दें। मैं एक नागरिक के रूप में शर्मिंदा हूं क्या समृद्ध मध्यप्रदेश के स्वयंभू नायक भी शर्मिंदा हैं ? क्या अपेक्षा की जा सकती है कि वीआइपी न तो अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होंगे न ही जनता के, क्योंकि हर मौत किसी न किसी घोंसले को उजाड़ देती है।

-भूपेन्द्र गुप्ता

(लेखक स्वतंत्र विश्‍लेषक व पत्रकार हैं)

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