प्रजातंत्र का ईवेंट : एक बार फिर हैमलेटी सवाल मुंह फाड़े खड़ा था जनसेवकों के सामने

जनसेवकों के सामने एक बार फिर हैमलेटी सवाल मुंह फाड़े खडा था । टु बी आर नाट टु बी । जाएं या न जाएं जाने के पच्चीस या न जाने के बीस ! आफ र हैं तो दोनों ही ललचाने वाले । रिस्क तो लेनी ही पडेगी । पहले दोनों आफर तौल कर देख लें । क्या पता पच्चीस वाला आफर बाद में महंगा पड जाए और दो साल तक घर वापसी के दरवाजे बंद । मोल भाव नहीं जमे तो यहां हैं ही । बैठे बिठाए बीस मिल ही रहे हैं । आखिर तय किया कि सबसे पहले न जाने का आफर देखा जाए । अपने बंगले से निकल कर किसी रिजार्ट में ही तो जाना है । लेकिन यह जानना जरूरी है कि टिकाएंगे कौन से रिजार्ट में । पिछली बार के रिजार्ट की रिसेप्शनिस्ट जंची नहीं थी । अगर वही हो तो जाने से मना कर देंगे । फिर सोचा किसी एक सूरत के कारण बीस का आफर छोडना ठीक रहेगा , हो सकता है कोई दूसरी रख ली हो । आखिर हमने शिकायत तो की थी ।

हो सकता है कि जब अपने को वहां पटक दिया जाए तब नई की ड्यूटी हो । वैसे भी लाइट रात में पहुंचेगी तो कोई पुरूष ही स्वागत करेगा । फिर वहां की लाई चादरें देख कर तो श्रीमतीजी बहुत खुश हुई थीं । अब भगवान से मन्नत मांगी है कि फिर उसी रिजार्ट में रखा गया तो सोलह सोमवार करूंगी । पच्चीस वाले आफर के रिजार्ट में पिछली बार गए अपने लोग बताते थे कि वहां की रूम सर्विस वालियां बहुत सुंदर हैं । इस बार उस रिजार्ट की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाएं तो कैसा रहे ऋ वैसे भी दे भी तो पांच ज्यादा ही हैं । लेकिन वहां एक गडबडी थी । अनुभवी बताते हैं कि दशहरी आम के बदले अल्फांसो और पायरी आम टिका दिए थे । डिनर में कडकनाथ की जगह ब्रायलर परोसने पर हंगामा हो गया था । कडकनाथ का स्वाद सभी जानते हैं ।
 बगावत की नौबत आ गई थी । कहने लगे हमने हाथ तो जोडे नहीं थे । आप ही पैर पडते रहे । मत भूलो कि हम बाराती है । सत्कार ढंग से होना चाहिए वर्ना बारात लैाट जाएगी । और सच में सामान बांधे जाने लगे थे । टैक्सियां तक बुलाई गई थीं । मामला पार्टी मुख्यालय पहुंचा । वहां विचार -विमर्श हुआ कि लंबी फील्डिंग के बाद तो पकड में आए हैं । भाग गए तो फ्लोर टेस्टिंग में भद पिटेगी । इसलिए रातों रात लखन से आदमी मलीहाबाद दौडाया गया और आमों के शहंशाह दशहरी फ्लाइट से उतरे । यूं अपनी यह जगह आम के लिहाज से ठीक है । महाराष्ट्र लगा होने से हापुस लोकल मार्केट से भी मंगवाया जा सकता है । वैसे भी दशहरी से कम नहीं ठहरता हापुस । हां एक बार दशहरी का स्वाद लेने के लिए पच्चीस वाला आफर आजमाया जा सकता है । देखते हैं । अभी कुछ तय नहीं है । अगली बार देखेंगे । साफ कह देंगे कि हम जाने को तैयार हैं लेकिन दशहरी के मौसम में ।

उधर पच्चीस वाले पछता रहे थे कि बीस का आफर क्यों ठुकरा दिया । जनता क्या कहेगी दशहरी आम के लिए मतदाताओं केा धोखा दिया ! हमें कह देते । आपके वजन के बराबर दशहरी का ढेर लगा देते । माना कि यहां की कटलरी वहां की कटलरी से बेहतर है लेकिन वोटर सोचेंगे कि कप प्लेट के लिए अपनी ईमानदारी बेच दी ! कहेंगे जब बच्चे पापा, पापा आए हमारे लिए क्या लाए कह कर सामान पर टूट पडें और समझो क्राकरी टूट जाए तो  बच्चे भी कहेंगे कि इतना अनुभव होने के बावजूद अच्छी पैकिंग में नहीं लाए । बेहतर होता दो चार तौलिये ही ले आते चादरें ले आते । साबुन दाढी का सामान शैंपू टूथपेस्ट ब्रश या वहां ऐसी ही एक बार इस्तेमाल में आने वाली चीज । कोई कम चीजें थीं । पर्दे थे स्लीपर थे ,रूम फ्रेशनर थे ,डायर्री -पेन थे । और कुछ नहीं तो शो पीस ही ले आते ।

उधर पच्चीस वालों को शिकायत थी कि एक तो उन्हें फ्लाइट की बजाय एसी बस में ठूंस दिया । पांच ज्यादा दे रहे हैं तो इधर कंजूसी कर रहे हैं । फिर रास्ते में खाने की बात तो छोडो कम से कम पीने का तो अच्छा इंतजाम होना चाहिए था । रिजार्ट में उम्दा मिलने का झांसा दिया । यहां देखो तो वही डिश जो पिछली बार परोसी थी । कैसे भुलक्कड होते हैं ये ऑफर देने वाले ! सुना है कि बीस वाले तो अड गए थे कि हमें पिछली बार की रिपीट की गई डिश नहीं चलेगी । तब पंद्रह में ही मान गए थे । अब महंगाई बढ गई है । अपन तो बस पच्चीस के पहले ही प्रस्ताव में ही झुक गए । आखिर जनता भी तो कहती कि भई इतने में तो मंत्री भी बिक जाए । अगली बार गोवा का मना कर देंगे । ये क्या कि देश के देश में ही घुमा रहेे हो । अगली बार इंडिया में नहीं रहेंगे । साफ -साफ कहेंगे कि सिंगापुर या पैरिस होना । वर्ना हम जिसमें हैं उसी में ही भले ।

बीस और पच्चीस वाले दोनों में ही अनुभवी जनसेवक थे । नवानुभवी दीर्घानुभवियों के संस्मरण सुनने के लिए उनके आसपास मंडराने लगे ताकि भविष्य में काम आ सके । दोनों रिजार्ट में जनसेवक जिम स्विमिंग और बिलियर्ड का आनंद ले रहे थे । स्पेशल फिल्मों का आनंद ले रहे थे । चिकन मटन बिरयानी खा -खा कर दो दिनों में उनका वजन बढ गया । गाल फूल गए । कपडे छोटे पडने लगे । लेकिन प्रजातंत्र की उपलब्धि पर सभी खुश थे । वे इसे सालाना ईवेंट बनाने की संभावनाओं पर विचार करने लगे ।

– दिलीप गुप्ते

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