प्रदेश कार्यालय में पुलिस पिटाई के बाद भी एक नहीं हुए कांग्रेसी

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प्रदर्शन के दौरान पुलिस के बल प्रयोग से मप्र कांग्रेस प्रदेश अध्‍यक्ष अरुण यादव को आई चोट।

नोटबंदी के बाद की परेशानियों को भुनाने की कोशिशों के बीच ही कांग्रेस को कटनी में हवाला मामले के रूप में एक ऐसा मुद्दा हाथ लग गया है जिसका राजनीतिक फायदा वह पूरे देश में उठा सकती थी। कटनी में पहले जनता वहां के एसपी रहे गौरव तिवारी के तबादले के विरोध में एकजुट हुई फिर भाजपा के नेता भी खुल कर कांग्रेस से आए राज्‍य मंत्री संजय पाठक को घेरने में जुट गए। कटनी की इस लड़ाई में कांग्रेस ने भी मोर्चा संभाला लेकिन कांग्रेस के नेता इस ‘बड़े’ साबित हो सकने वाले मैच को ‘नेट प्रैक्टिस’ की तरह भी नहीं ले सके। अपने प्रदेश अध्‍यक्ष पर हुए लाठीचार्ज और प्रदेश कार्यालय में घुस कर पुलिस द्वारा कार्यकर्ताओं को पीटने जैसे गंभीर मामले में भी कांग्रेस नेताओं ने आक्रामकता नहीं दिखाई। कुछेक नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखे लेकिन वे भी रीट्विट करने की औपचारिकता ही निभा पाए। पार्टी वरिष्‍ठता और युवा नेतृत्‍व के पैंतरों में ही उलझी हुई है। बड़े नेताओं की सधी प्रतिक्रिया को देख कांग्रेस में यह जुमला फिर उछाला गया है कि वरिष्‍ठ नेता ही पार्टी के लिए गरिष्‍ठ साबित हो रहे हैं।

वास्‍तव में यह मुद्दाविहीन कांग्रेस के लिए एक मौका था जब वह मंत्री को हटाने का दबाव बनाती और इस घोटाले को नोटबंदी के बाद काले धन को सफेद करने के खेल से जोड़ कर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सरकार को घेरती। लेकिन, हर बार की तरह इस बार भी साबित हुआ कि कांग्रेस यहां हवाला, आरोपी मंत्री तथा भाजपा सरकार से नहीं लड़ रही बल्कि अपने खेमों और ‘चेहरे’ को आगे करवाने के संघर्ष में ही उलझी है। यही कारण है कि बड़े नेताओं ने एकदम से प्रतिक्रिया देने के बदले नपातुला राजनीतिक आकलन‍ किया और उनके समर्थक आका के इशारे की प्रतीक्षा में बैठे रहे। इस चक्‍कर में प्रदेश कांग्रेस का ऐसा आंदोलन जो पहले उसके विद्यार्थी संगठन एनएसयूआई ने शुरू किया था, ‘बचकाने’ से, धारहीन आंदोलन में तब्‍दील हो गया।

अपने नेताओं की पिटाई के बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने मंगलवार को प्रदेश भर में कुछ प्रदर्शन किए। पुतले फूंके। लेकिन, हर जगह कार्यकर्ता अपने बड़े नेताओं की गतिविधियों को टटोल रहे थे। हाल ही में राज्‍य सभा में गए विवेक तन्‍खा ने सोमवार को घटना के बाद ही सक्रियता दिखाई और तुरंत ट्वीट किए। उनके ट्वीट को पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आगे बढ़ाया। सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने दो ट्वीट किए। एक रीट्वीट करते हुए उन्‍होंने लिखा‍ कि काले धन का पर्दाफाश करने वाले ईमानदार पुलिस अफसर का समर्थन करने पर यह हाल करती है मध्य प्रदेश सरकार। विवेक तन्‍खा मंगलवार को भोपाल भी पहुंचे, लेकिन जिन दिग्‍गज नेता कमलनाथ को प्रदेश का मुख्‍यमंत्री चेहरा घोषित करने की मांग जारी है उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से समर्थकों को कोई संदेश नहीं मिला। बल्कि, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा रही कि प्रदेश अध्‍यक्ष अरुण यादव के लिए यह लाठीचार्ज मौका बन कर आया और वे इसके सहारे अपने पद पर लटकी तलवार को कुछ देर थामने में कामयाब हो जाएंगे। यह उस प्रदेश कांग्रेस कमेटी के हाल हैं जिसके कर्णधार नेता सालाना दौरे पर भी प्रदेश कार्यालय में नहीं आते।

कार्यकर्ताओं के दर्द को पूर्व सांसद सज्‍ज्‍न सिंह वर्मा की इस टिप्‍पणी से समझा जाना चाहिए जिसमें उन्‍होंने कहा कि पार्टी वरिष्‍ठ और युवा जोश को साथ लेकर, क्षेत्रीय संतुलन साधते हुए नेतृत्‍व खड़ा करे। भोपाल में हुई पत्रकार वार्ता में सांसद सिंधिया ने भी कहा था कि प्रदेश में कांग्रेस को एक चेहरा सामने कर भाजपा का मुकाबला करना चाहिए लेकिन यह कोई नहीं कह पा रहा कि वह चेहरा कौन होगा।

18 जनवरी को कांग्रेस नोटबंदी के खिलाफ देश भर में आरबीआई दफ्तर के सामने प्रदर्शन करने वाली है। भोपाल में भी प्रदर्शन होगा। हवाला मामले और लाठी चार्ज के खिलाफ भी मुहिम चलाई जाएगी लेकिन दिग्‍गजों के खेमे ध्‍वस्‍त होने तक यह कवायद व्‍यर्थ ही होगी।

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