प्रदेश की सियासत में असली खेल पार्ट-2 शुरु होगा अब!

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प्रदेश में कमलनाथ सरकार के तख्ता पलट अभियान से जो राजनीतिक खेल शुरु हुआ था उसके पार्ट-1 का पटाक्षेप शिवराज मंत्रि-परिषद के विस्तार के साथ पूरा हो गया है। राज्य की सियासत में असली खेल पार्ट-2 शुरु होगा अब, क्योंकि उपचुनाव की तारीखों का भले ही ऐलान न हुआ हो लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ही चुनावी मोड में आ गये हैं। अब इनकी कोशिश अधिक से अधिक स्थानों को जीतने की है। कांग्रेस के सामने लक्ष्य बहुत बड़ा है और उसे 24 में से डेढ़ दर्जन से अधिक सीटें जीतना होंगी ताकि फिर से सरकार बनाने का जागती हुई आंखों में जो स्वप्न वह संजो रही है वह साकार हो सके। जबकि भाजपा के सामने वैसे तो 24 सीटें जीतने का लक्ष्य है लेकिन यदि वह आधे स्थान भी जीत जाती है तो उसकी सरकार आगामी आमचुनाव तक चलती रहेगी। भाजपा के पास शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र सिंह तोमर की जिताऊ जुगलजोड़ी तो है ही और अब उसमें लटके-झटके और आम जनमानस से संवाद करने की कला में माहिर ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं कुशल संगठनकर्ता के रुप में प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा भी जुड़ गए हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह चुनाव प्रचार में ऐसे चेहरों को आगे करे जो शिवराज, तोमर और सिंधिया की त्रिमूर्ति के मुकाबले अपनी बातों को ज्यादा असरकारक ढंग से जनमानस के बीच रख सके। जहां तक मैदानी जमावट का सवाल है उसमें दिग्विजय सिंह तो सिद्धहस्त हैं लेकिन अन्य मोर्चो पर भी कांग्रेस को कुछ चेहरों को तैयार करना होगा जो पार्टी की बात प्रभावी ढंग से मतदाताओं तक पहुंचा सकें।
जिस प्रकार कांग्रेस का लक्ष्य बड़ा है उसी प्रकार उससे बड़ा लक्ष्य सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी है, उन्हें उन 19 विधायकों को जिताकर फिर से विधानसभा में पहुंचाना है क्योंकि उनके भरोसे ही इन विधायकों ने अपनी सदस्यता दांव पर लगाई है। उनके लिए यह भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है कि जिन 11 को मंत्री पद से उनके कारण नवाजा गया है उन सभी को जितायें, ताकि इससे उनकी पसंद पर जन-स्वीकृति की मोहर लग सके। सामान्यत: सारे के सारे मंत्री जो चुनाव मैदान में हैं और चुनाव जीत जायें ऐसा कभी-कभी अपवाद स्वरुप ही हुआ होगा, अक्सर देखा गया है कि कुछ बड़े विभागों के मंत्री भी चुनाव हारते रहे हैं। मतदाता आजकल मंत्रियों को हराने में अधिक आनंदित होने लगे हैं। यदि सिंधिया उन सभी को जिता लेते हैं जिन्होंने उन पर विश्‍वास कर इस्तीफा दिया है तो ही वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ यह कह सकेंगे कि उन्होंने जो कुछ किया उस पर जनता ने मोहर लगा दी है। विधायकी छोड़ी और जो मंत्री बने उनके सामने चुनाव जीतने की भारी-भरकम चुनौती मुंह बाये खड़ी है, क्योंकि अब उन्हें अधिक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। भाजपा के क्षत्रपों के सहयोग और उनके मंत्री बनने से भाजपा के जिन कार्यकर्ताओं में असंतोष है वह जब तक तिरोहित नहीं होगा, उनकी जीत शायद संभव न हो पाये। कुछ मंत्रियों को तो दोहरे विरोध का सामना करना पड़ेगा, एक तो रुठे हुए भाजपाइयों का और दूसरे कांग्रेस का, क्योंकि कांग्रेस पूरी ताकत से सिंधिया के कुछ खास सिपहसालारों की घेराबंदी करने जा रही है, खासकर तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर, प्रभुराम चौधरी, ओपीएस भदौरिया, बृजेन्द्र सिंह यादव, गिरराज दंडोतिया इनमें शामिल हैं। इसके साथ ही सीधे कांग्रेस से भाजपा में गये बिसाहूलाल सिंह, ऐंदल सिंह कंसाना और हरदीप सिंह डंग को भी सबक सिखाने की कांग्रेस ने ठान ली है।
भाजपा के सामने एक बड़ी समस्या यह है कि शिवराज सरकार में जो उसके अपने विधायक जगह पक्की मान रहे थे, उन्हें निराशा हाथ लगी है और उनकी निराशा को आशा में कैसे बदले। कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हुए हैं, हालांकि इसमें उन विधायकों की सीधी हिस्सेदारी नजर नहीं आई लेकिन यदि उनके समर्थक कुछ कर रहे हैं तो इससे संदेश यही जा रहा है कि सब कुछ वैसा सामान्य नहीं है जैसा कि दर्शाने की कोशिश की जा रही है। दलबदल करने वाले जो आठ विधायक मंत्री बनने से चूक गये हैं उनमें से पांच अनुसूचित जाति वर्ग के हैं और इसको लेकर कांग्रेस दलितों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए एक हथियार के रुप में उपयोग करने की रणनीति बना रही है इसमें उसका चेहरा फूल सिंह बरैया हैं। भांडेर, अम्बाह, गोहद, करेरा और अशोकनगर सुरक्षित से जीते विधायक मंत्री बनने से वंचित हो गये हैं। 16 विधानसभा क्षेत्रों में से अधिकांश में दलित वर्ग और खासकर जाटव समुदाय का प्रभुत्व रहता है, इसी इलाके में बहुजन समाज पार्टी भी अपना असर रखती है और कांग्रेस की नजर भी इन्हीं पर टिकी हुई है, इसलिए दलित मतदाताओं को अपने-अपने पाले में करने के लिए भाजपा, कांग्रेस और बसपा में दांवपेंच की राजनीति तेज हो गयी है।
शिवराज ने सेट किया उपचुनावों का एजेंडा
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने के अवसर पर वर्चुअल रैली को सम्बोधित करते हुए चुनावी एजेंडा तय कर दिया है जिसके तहत एक तरफ तो उनके एक हाथ में होगा घोषणाओंऔर उपलब्धियों का पुलिंदा तो दूसरे हाथ में होगी कमलनाथ सरकार पर आरोपों की मूसलाधार झड़ी। इसमें सीधा-सीधा हमला किस प्रकार का होगा उसके लिए उन्होंने चार ‘डी‘ की शब्दावली ईजाद कर ली है। जिसमें तीन ‘डी‘ तो हैं दलाल, दंभ और दुर्भावना और इन पर ही कांग्रेस को उत्तर देना थोड़ा मुश्किल रहेगा, खासकर ऐसा उत्तर देना जो लोगों के गले उतर सके। कमलनाथ सरकार को दलालों की सरकार कहते हुए उन्होंने मंत्रालय को दलालों के अड्डे की संज्ञा दी है। इस मुद्दे पर वे जमकर कमलनाथ को घेरेंगे तो चौथे ‘डी‘ के रुप में उनके निशाने पर दिग्विजय सिंह होंगे। दिग्विजय का निशाने पर होना स्वाभाविक है क्योंकि भाजपा अंदर ही अंदर यह महसूस करती है कि असली गेमचेंजर यदि कांग्रेस में कोई बचा है तो वह दिग्विजय सिंह ही हैं क्योंकि वे कांग्रेस के असंतोष को सहेजने में सफल रहने के साथ ही संगठन पर हमेशा अपनी पकड़ बनाये रखते हैं। जहां शिवराज क्षेत्र की जरुरतों के अनुसार योजनाओं की घोषणा करेंगे, निर्माण कार्यों की योजनायें उपचुनाव वाले क्षेत्रों में प्राथमिकता से बजट आवंटन कर आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे तो इसे भांपते हुए ही कमलनाथ ने रतलाम जिले के सैलाना में यह कहते हुए मुख्यमंत्री की घेराबंदी की है कि वे जहां भी जायेंगे वहां कोई न कोई झूठी घोषणा अवश्य करेंगे और प्रचार-प्रसार की राजनीति करते हुए बड़े-बड़े ऐलान भी उनके द्वारा किए जायेंगे। हमेशा की तरह यह भी कमलनाथ ने जोड़ा कि प्रदेश की जनता सीधी-सादी, भोली-भाली भले ही हो लेकिन समझदार है और यह जनता उपचुनावों में सीधे इन्हें घर बिठायेगी। देखने वाली बात यही होगी कि प्रदेश की जनता शिवराज की घोषणाओं को अब किस रुप में लेती है और चुनाव नतीजों में वह यह बतायेगी कि उसे कमलनाथ और शिवराज में से किस पर अधिक भरोसा है। कांग्रेस की रणनीति मूल रुप से लोकतंत्र के साथ विश्‍वासघात और 15 माह में सरकार द्वारा किए गए जनहितकारी फैसलों पर निर्भर है तो वहीं इसके साथ ही वह भाजपा के असंतुष्टों पर भी नजर लगाये हुए है। जिस ढंग से उसकी सरकार गिरी है उसी ढंग से वह फिर सत्ता में आने की सोच रही है तो यह उसके लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि एक तो भाजपा में रुठों को मनाने की और दूसरे दल में सेंध लगाने की कला में सबसे अधिक माहिर शिवराज सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा उसके पास हैं तो वहीं दूसरी ओर भाजपा में नेता से अधिक संगठन प्रभावी होता है।

और यह भी

ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा यह कहे जाने पर कि टाइगर अभी जिन्दा है, को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कांग्रेस के आदिवासी नेता अजय शाह ने ट्वीट किया है कि टाइगर अभी जिन्दा है पर लोकतंत्र शर्मिन्दा है तो वहीं कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री उमंग सिंघार ने भी अपने ट्वीट में सिंधिया पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि अगर टाइगर हो तो अब तक आस्तीन में क्यों थे। पूर्व मंत्री और अब भाजपा से कांग्रेस में लौटे चौधरी राकेश सिंह तो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बकौल सिंधिया टाइगर अभी जिन्दा है तो फिर भविष्य के लिए इस जंगल के बचे हुए खरगोश व अन्य जीव भयभीत हैं। अभी तो चुनावों की घोषणा नहीं हुई और तरह-तरह के जीव- जंतुओं को प्रतीक बनाना प्रारंभ हो गया है, जब तारीख का ऐलान हो जायेगा तब पता नहीं एक-दूसरे के लिए और क्या-क्या उपमायें दी जायेंगी।

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