बात पसीना बहाने की नहीं आँसुओं की हैं ..

कहने को पसीना और आँसूं दोनों ही पानी हैं पर बहने के कारण नितांत भिन्न हैं । बाजार की चपेट में आ चुके नौजवान जिम जाकर पसीना बहा रहे वहीँ एक युवा  वर्ग ऐसा भी हैं जो प्रेमचंद के घिसू-माधव हलकू की तरह जीवन बसर कर रहा। उनका किरदार तकनीक में केवल न्यूज चेनलों की  खबर बनने तक ही हैं। इसलिए एक वर्ग ठेला चलाकर पसीना बहा रहा और अपना गुजर बसर कर रहा, एक पसीना बहाने के लिए जिम का सहारा ले रहा  ।

इसलिए एक पानी तो दूसरा आँसू बनकर बह रहा । एक समय ऐसा था वस्तुओं को दो अलग -अलग भागों में विभाजित कर देखा जा सकता था उनका आंकलन किया जा सकता था एक क्रय करने के लिए ही बनी थी दूसरी विक्रय करने और दुनिया का व्यक्ति संभावित उपभोक्ता था लेकिन अब ऐसा नहीं हैं उत्पादक शक्तियां बाजार के रहमो करम हैं और इंसान केवल उपभोग करने में लगा हैं आत्मकेंद्रित, क्षणवाद सत्ता की लाग लपेट वाली प्रवत्तियों में संलिप्त वह स्वयं ही क्रेता वह स्वयं ही विक्रेता आदमी इंसान न होकर व्यवसायी बुद्धि का ढांचा बनता जा रहा रही सही कसर तकनीकीकरण ने पूरी कर दी जहाँ बाजार जाकर ठेलों पर चीजें खरीदने के लिए पूरी सूचीबद्ध तैयारी कर  घर छोड़ते थे वहीं मॉल के रूप में नयी परम्परा जन्मी विकसित हुई  फिर आज उँगलियों पर विकल्प चुनकर घर बैठे वस्तुएं उपलब्ध हो जाती हैं । पर ध्यान रहे सिर्फ वस्तुएं ही सुलभ नहीं हुई, कुछ लोग यह भी कहेंगे भावनाएं भी सोशल मीडया के फेस बुक पटल पर जीवन के एकाकीपन को उत्सव में बदल रही ।

क्या आभासीय दुनिया वाकई आदमी की भावनाओं की पूर्ति कर पा रही हैं। इससे समय जरूर काटा जा सकता हैं ये भावनाओं की भीड़ लाइक और कमेंट्स के बाद फोन बंद करते ही गायब हो जाएगी किसी अलादीन की तरह और हमें फिर लौटना होगा हमारी एकाकी दुनिया में आत्मकेंद्रित समय में इसलिए भावी परिवर्तन के अश्रुपूर्ण  स्वरूपों का शीघ्र की पूर्वानुमान लगाने में हमें जुटना चाहिए। तकनीक में डूबकर हम पसीना तो बहा रहे लेकिन आँसू कब बहेंगे इस बात की प्रतीक्षा हैं । विगत दिनों  देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर नगर निगम द्वारा एक ठेले वाले के साथ जो किया गया उसे निंदनीय भी नहीं कह सकते क्योकि उससे भी कहीं बुरा अनुभव था वो कुछ न जा सकता आँसू बहे उनकी आँखों से जिनके साथ घटनाएं घटित हुई पर बहने उनके भी थे जो इसे केवल मूक दर्शक बनकर खबरें बनाने में लगे थे । और कुछ लोग उन ख़बरों को पढ़ने में । कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिसका इल्जाम तो सबके सर होना ही चाहिए । सूचना की क्रांति का वीभत्स रूप भी शायद यही दौर देख रहा जहां भोगा बहुत कुछ जा राह पर भगाया नहीं । राजनीति से लेकर भाषा तक की शीलता का हरण हो रहा।  

गीतों के महाकवि गोपाल दास नीरज की पंक्तियां हैं — अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए/ जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए/जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर /फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। तकनीक के शीर्ष पर पहुंच चुके इस समय में इन पंक्तियों की कितनी प्रासंगिकता हैं कहने की जरुरत नहीं। कोरोना जैसे महासंकट से गुजरने के बावजूद हमारे भीतर तरलता नहीं आना किसी क्रूर युग के संकेत हैं बेरोजगारी पहले ही मुंह फाड़े खड़ी थी उस पर जो छोटा मोटा रोजगार हैं दो जून की रोटी जुटाने जितना उस पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे इससे इन दिनों अपने पर ही संदेह हो रहा हैं ये भारत ही है या कोई और देश जहाँ पसीने और आंसुओं का फर्क नहीं किया जा रहा। पथराई आँखों  से आंसुओं के प्रवाह की कल्पना कोरी हैं और एसी रूम में बैठे उन सत्ताधारियो को  पसीना आना तो दूर उसकी गंध भी जिन तक पहुँचती नहीं वे इन दोनों के ही आशय क्या समझेंगे । रोजगार और पूंजी जहाँ आवारापन से गुजर रहे जिसका भूमण्डलीकरण हो गया, पसीना बहाता श्रम मिट्टी के मोल ख़रीदा जा रहा लेकिन उसके उत्पाद सोने के भाव बिक रहे ऐसे देश में देशज मेधा, लोक चेतना ,पारम्परिक कौशल का जहाँ पूरी तरह लोप हो रहा भविष्य की चिंता रेखाएँ खींच रही । शहर कस्बें फूहड़ नकल की गिरफ्त में जा पहुंचे ऐसे देश में न पसीने की कीमत मिलेगी न आंसुओं की । हमारे भीतर की तरलता अपने प्रवाह में संवेदनाएं तलाश रही मानो तो गंगा जल,न मानो तो पानी। जल और पानी के बीच का अंतर ही हमें खोखला कर रहा  । यह सच हैं 21 वीं सदी उथलपुथल से भरी हैं किसी अधूरे  स्वप्न की तरह दिखती हैं पर हर बड़े स्वप्न के साथ अंततः निराशाएं जुड़ जाना स्वाभाविक हैं हालाँकि उसे पूरा करने की कोशिशें अभी खत्म नहीं हुई हैं इस समय की तंग सड़कों पर चलकर ही समाधान की राह खोजी जा सकेगी भविष्यवेत्ता से ऐसी ही उम्मीद की जाती जा सकती हैं ।

-डॉ.शोभा जैन, इंदौर

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