मंत्रिमंडल का विस्तार: क्या ये वही शिवराज हैं?

मध्य प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही, उनको जो राजनीति  में रूचि रखते हैं , लुभाती रही है।गुरुवार को भोपाल में जब 28 नेता (ना की विधायक) पद और  गोपनीयता की  शपथ ले रहे थे, तब सभी खुश थे, सिवाए भाजपा के मध्य प्रदेश के बड़े नेता जिसमे सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्य प्रदेश भाजपा के उभरते हुए सितारे नरोत्तम मिश्रा और कैलाश विजयवर्गीय शामिल हैं।
दुःख का कारण सबका एक ही था – जो चाहा वो ना हुआ। आनंदित थे तो सिर्फ़ ज्योतिरादित्य  सिंधिया।

आप कल्पना कीजिये की मध्य प्रदेश मे मंत्री मंडल के गठन की कवायद चल रही  हो और शिवराज और नरोत्तम जैसे कद्दावर नेताओ को २ दिन तक दिल्ली मे डेरा डाले रखना पड़ रहा हो, ताकि उनके करीबियों को मंत्री बना दिया जाए! यह वही शिवराज  हैं जिनका नाम, कुछ महीनों पहले तक, भाजपा के शीर्ष 5 राष्ट्रीय नेताओं में गिना  जाता था पर जब समय का चक्का घुमा तो ऐसा चला की वह अपने चहेतो को मंत्री तक नहीं बनवा पाए। नरोत्तम मिश्रा तो यह मान के चल रहे थे की उनको उप-मुख्यमंत्री का प्रभार दिया  जायेगा।

अंत में शिवराज ने खुद को और उनके समर्थकों को यह बोल के दिलासा दिया कि समुद्र मंथन से जो विष निकलता है उसे भगवान शिव पी जाते हैं और अमृत सभी में बंटता है। यह कटाक्ष शायद महाराज पर था या भाजपा के शीर्ष नेताओ पर, यह तो शंकर जाने यह शिवराज! 
फिलहाल शिवराज के कुल 33 मंत्रीओ में से शायद 5 ही ऐसे नाम हैं जो शिवराज के ‘खेमे’ के  कहे जा सकते है जबकि 11 महाराज के बताये हुए नाम हैं।

एक और चीज़ जिसने शिवराज को इस बार परेशान किया और आगे भी करती रहेगी वह यह है की जिन 16 मूल भाजपा नेताओं ने इस बार मंत्री पद की शपथ ली, उसमे से 9 पहली बार मंत्री बने हैं जिसमे इंदौर से विधायक उषा ठाकुर भी शामिल हैं जो की कैलाश विजयवर्गीय की प्रतिद्वंद्वी मानी जाती हैं। यहाँ पर इस बात का भी उल्लेख करना जरूरी होगा की कैलाश ने अपने खास और इंदौर से ही विधायक रमेश मेंदोला के लिए मंत्री मंडल में एक स्थान सुनिश्चित करने के लिए काफी हाथ पैर मारे, पर अंततः उन्हें निराशा ही हाथ लगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने साफ़ संकेत दे दिया है की वह मध्य प्रदेश में शिवराज और कैलाश से आगे निकलना चाहती है और शायद वह रास्ता भाजपा के अध्यक्ष जे पी नड्डा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर में महाराज के आँगन  से निकलता हुआ दिख रहा है।

मध्य प्रदेश की राजनीति मे इस तरह का उतावलापन आख़िरी बार  2013 – 14 में दिखा था जब शिवराज व्यपयाम के चक्रव्यूह में फस गए थे। उन दिनों भी रोज कयास लगते थे की शिवराज आज गए की कल गए। लेकिन उस बार वह सही – सलामत उस चक्रव्यूह से बाहर आ गए थे । लेकिन इस बार परिस्थितियां और मुश्किल दिख रहीं हैं। अगले कुछ दिनों मे होने वाले मध्य प्रदेश के 24 सीट के  उपचुनाव के नतीजे काफी महत्वपूर्ण हैं। यह नतीजे बहुत हद तक यह बता देंगे की आने वाले समय में भाजपा मध्य प्रदेश मे किसकी तूती बोलेगी।

दिल्ली के सत्ता के गलियारिओ में चल रही हवाओ की मानें तो शिवराज की मुख्यमंत्री की कुर्सी अब एक बेवफा महबूबा की तरह हो चुकी है, कब रूठ कर किसी और के साथ चली जाए, कोई नहीं बता सकता।

(अभिनन्दन मिश्रा दिल्ली से प्रकाशित संडे गार्डियन में पत्रकार हैं)

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