‘मदारी-राजाओं’ के डमरूओं पर नाचती राजभवन की ‘अंतर-आत्मा’

गहलोत-सरकार को गिराने की साजिशों के बीच राजनीतिक-माहौल में अंतरात्मा की आवाज और लोकतंत्र के तकाजों की एंट्री चौंकाने वाली है। एक, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत ने राज्यपाल कलराज मिश्र से अनुरोध किया है कि वो केन्द्र सरकार के दवाब में काम नहीं करें, बल्कि आत्मा की आवाज सुनकर न्यायपूर्वक संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करें। दूसरी ओर, सत्ता-पलट के घोर अलोकतांत्रिक षड्यंत्रों में आहत लोकतंत्र की कराहने की आवाज सुप्रीम कोर्ट के गलियारों से आई है। सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान के स्पीकर सीपी जोशी व्दारा दायर याचिका की मूल प्रार्थना (प्रेयर) का विस्तार करते हुए जस्टिस अरूण मिश्रा ने मसले को लोकतंत्र की मर्यादाओं से जोड़ दिया है। जस्टिस मिश्रा का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए। स्पीकर ने राजस्थान हायकोर्ट के इस फैसले को रोकने की मांग की है कि उच्च न्यायालय स्पीकर को विधायकों को अयोग्य ठहारने की प्रक्रिया को रोकने के निर्देश नही दे सकता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट यह पूछ रहा है कि वो विधायकों की सदस्यता क्यों रद्द करना चाहते हैं? अशोक गहलोत और सीपी जोशी के अनुरोध और उनकी मांग सुस्पष्ट, सुनिश्‍चित और सीधी रेखा में है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और राजभवन में जायज तर्क-वितर्क को वृत्ताकार बना कर घुमाने के प्रयास किए जा रहे हैं। सवाल यह है कि सत्ता के महाभारत में आत्मा की आवाज पर लोकतंत्र की रहनुमाई के पीछे कौन-सी मंशाएं काम कर रही हैं?

द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंखनाद से महाभारत शुरू होने के प्रसंग से सभी वाकिफ हैं। ’पांचजन्य’ भगवान श्रीकृष्ण का शंख था, जिसकी आवाज में न्याय की अनुगूंज अंतर्निहित थी। यह कलयुग है और कलयुग में सत्ता के चीर-हरण के पलों में भारतीय-गणतंत्र के ’मदारी-राजा’ अंतरात्मा का डमरू बजाते हैं। डमरू शिव का प्रिय संगीत ध्वनि यंत्र है। इसमें सृजन और विध्वंस, दोनों के स्वर छिपे हुए हैं। एक रिसर्च के अनुसार डमरू से 14 प्रकार की ध्वनि-तरंगे निकल सकती हैं। जबकि अंतरात्मा की आवाजों की गिनती करना मुश्किल होता है। आवाजों की विविधता ही अंतरात्मा और डमरू की समानता है। डमरू की क्षमताओं का उपयोग मदारी के कौशल पर निर्भर है, जबकि राजनीतिक मदारी का कूट-कौशल तय करता है कि उसकी तान पर लोगों की अंतरात्मा कितना चहकेगी, चीखेगी या चिल्लाएगी?

अंतरात्माओं के राजनीतिक शास्त्रार्थ में नीति-अनीति के कोई नियम नहीं होते। सुप्रीम कोर्ट और राजभवन में आत्माओं की ताजा अकुलाहट के प्रसंग गहलोत-सरकार के सत्ता-पलट से जुड़े हैं। यह सौ-सौ चूहे खाकर बिल्लियों के हज पर जाने जैसा मसला है। राजभवन और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े सभी क्रियाकलापों पर यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है। नीति-अनीति के बीच डमरू से निकलने वाली 14 किस्म की ध्वनि-तरंगों के समान ही राजनीतिक सत्ता के सुरूर और मतवालेपन में भी आत्मा की आवाज लड़खड़ाने, बड़बड़ाने और गड़बड़ाने लगती है। आत्मा का बहकना और मचलना अप्रत्याशित और अनुमानों से परे होता है।

सियासी आत्मा की फितरत वैसे भी बड़ी मगरूर होती है। गम की दहलीज और सत्ता के सिंहव्दारों पर उसकी प्रतिक्रियाएं एक समान होती हैं। अब, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आंगन में, लोकतंत्र की आत्मा एकाएक सक्रिय हो उठी है, बैकड्रॉप में कई पुरानी घटनाएं चीखती नजर आती हैं। भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाने में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका सवालों से परे नहीं रही हैं। मोटेतौर पर माना जाता है कि न्यायालय की प्राथमिक भूमिका लोगों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करना है। चुनावी प्रतिस्पर्द्धा से उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनजर सत्ता प्रतिष्ठानों के दुरूपयोगों को रोकने का महती दायित्व भी न्याय पालिका का है। लेकिन ऐसे कई मामलो में न्यायपालिका की भूमिका आश्‍वस्त करने वाली कभी भी नहीं रही है। मसलन, चुनावी बॉण्ड योजना से जुड़े मसलों के साथ ही ईवीएम के उपयोग पर रोक लगाने वाली 20 विपक्षी दलों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लोग एकतरफा मानते हैं।

जब अशोक गहलोत राज्यपाल कलराज मिश्र से आत्मा की आवाज सुनने का अनुरोध करते हैं तो बैक-ड्रॉप में महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक के राज्यपालों के करतब गुलाटी खाने लगते हैं। मध्य प्रदेश, मणिपुर और गोवा में अल्पमत होते हुए भाजपा-सरकार का सत्तारोहण लोकतंत्र के आर्तनाद को उदघाटित करता है। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, और मणिपुर में संविधान को ताक में रख कर भाजपा सरकार की ताजपोशी लोकतंत्र का मखौल उड़ा रही है। राजस्थान केन्द्र सरकार का अगला निशाना है।

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