मप्र के राजनीतिक अरण्य की ‘मल्टी टाइगर’ कथा!

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क्या ही संयोग है कि शिवराज मंत्रिमंडल के ताजा विस्तार में जैसी ‘अरण्य छाया’ दिखाई दी, वैसी पहले कभी नजर नहीं आई। मंत्रिमंडल में ‘शेर का हिस्सा’ हासिल करने बाद प्रदेश की राजनीति के एक बड़े नक्षत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तगड़ा कटाक्ष किया कि ‘टाइगर अभी जिंदा है।’ हालांकि ऐसा ही दावा डेढ़ साल पहले मुख्यअमंत्री शिवराज ने सरकार गंवाने  के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र बुदनी में एक सभा में किया था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब प्रदेश की भाजपा राजनीति में असली टाइगर कौन है, इस सियासी स्पर्द्धा में कौन सा ‍टाइगर टिकेगा या फिर यहां कई टाइगरों का सह-अस्तित्व होने वाला है?

प्रदेश में ‘राजनीतिक टाइगरों’  की इस बढ़ती संख्या पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने चुटकी ली कि राज्य में ‘टाइगर’ बढ़ तो रहे हैं, लेकिन सर्कस के। उधर सिंधिया के चुनौतीनुमा डायलाॅग का कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने जवाब दिया कि हमने तो किसी जमाने में स्व. माधवराव ( ज्योतिरादित्य के पिता)  के साथ ‘असली टाइगर’ का शिकार किया है (अर्थात ये ‘टाइगर’ कहां लगते हैं)। बहरहाल जमीनी सच्चाई यह है कि प्रदेश के राजनीतिक अरण्य में अब कई टाइगरों का विचरना सियासी मजबूरी बन गई है। शिवराज मंत्रिमंडल के भारी मशक्कत और खींचतान के बाद हुए विस्तार से एक बात साफ हो गई कि भाजपा का अब लगभग ‘पूरा कांग्रेसीकरण’ हो गया है। एकजाई समझी जाने वाली और जोड़-तोड़ से सत्ता में लौटी यह पार्टी अब गुटीय खम्भों के सहारे टिकने को विवश है। 

राजनीतिक पार्टियां जब बिना पूर्ण जनादेश के सत्ता में आती हैं तो वो जनता की आंख में आंख डालकर बात नहीं कर पाती हैं। शिवराज सरकार की यही व्यथा है। मंत्रिमंडल भी वो अपनी मर्जी से नहीं बना पाए हैं। हालांकि 2018 तक भाजपा की सरकारों में भी क्षेत्रीय और जातीय संतुलन, भाजपा और संघ की नुमाइंदगी तथा आयातित व वफादार नेताअों को लेकर खींचतान मची रहती थी। लेकिन भाजपा के किसी मुख्यमंत्री के मंत्रिमंडल का विश्लेषण शुद्ध गुटीय आधार पर हुआ हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। पार्टी के भीतरी सत्ता केन्द्रों का शक्ति संतुलन मंत्रिपरिषद में झलकता था, कुछ तुष्टीकरण भी होता था। लेकिन सरकार भाजपा की ही कहलाती थी और मुख्यमंत्री उसका चेहरा हुआ करता था। हालांकि ऐसा ही संदेश प्रदेश के एक ताकतवर मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी मीडिया को देने की कोशिश की, लेकिन उसमें ज्यादा दम नहीं था। यह शायद पहली बार हो रहा है कि मंत्रिमंडल का चेहरा भले शिवराज का है, लेकिन शरीर गुटों का एक असंतुलित कोलाज भर है। शायद  इसीलिए राजनीतिक विश्लेषकों ने मंत्रिमंडल में शामिल नए 28 चेहरों में कौन किसका आदमी है, इसी नजर से देखा।

 दरसअल गुटीय कंधों पर पार्टी की पालकी ढोने का यह ‍चरित्र मूलत: कांग्रेस का है। लेकिन अब यह वायरस भाजपा में भी पूरी तरह प्रवेश कर गया है। इसका कोई कारगर वैक्सीन पार्टी के पास नहीं है। अभी तो 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, इसके नतीजे आने के बाद भाजपा की गुटीय राजनीति किस आंतरिक संघर्ष का स्वरूप लेगी, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। और यह दोनो स्थितियों में संभव है, सरकार बचने पर भी या सरकार न बच पाने पर भी। भविष्य में हर मुकाम पर सियासी गणित इसी फार्मूले के आधार पर तय होंगे। यानी इस सरकार के ‘ड्राइवर’ भले शिवराज हों, बैक सीट ड्राइविंग करने वाले हाथ कई होंगे, जिनमे एक ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं।फिलहाल सिंधिया राज्य मंत्रिमंडल में अपने 16 समर्थकों को मंत्री बनवाने में कामयाब रहे हैं, लेकिन असली चुनौती उनके कांग्रेसी डीएनए वाले समर्थकों के भाजपाई गोत्र में एकाकार होने की है। क्योंकि दोनो के राजनीतिक घनत्व भी अलग-अलग हैं। लिहाजा इसे दूध और शकर के मेल में बदलना बहुत कठिन है। इसके लिए जो त्याग’ करने होंगे, क्या उसके लिए दोनो खेमे तैयार हैं?

क्योंकि मंत्रिमंडल का विस्तार का अर्थ सदाशयता का विस्तार नहीं होता। यह मंत्रियों की शपथ ग्रहण के साथ ही दिखने भी लगा है। और मंत्री गले में हाथ डाल भी दें, लेकिन आम कार्यकर्ता क्या करेगा? जिसके खिलाफ कल तक तलवार घुमाई, अब उसी के आगे बीन बजाना ‍कितना असहज करने वाला है।अपनी सौदेबाजी की ताकत के संदर्भ में ज्योतिरादित्य का ‘टाइगर’ वाला बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल पूर्व में कांग्रेस में उनके दो वरिष्ठ प्रतिद्वंद्वी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर चुनौतीपूर्ण कटाक्ष है, बल्कि इस बात का भी स्पष्ट संकेत है कि मध्यप्रदेश में भाजपा की राजनीति भी कांग्रेस की तरह ‘मल्टी टाइगर’ वाली होगी। इसमें शिव भी होंगे, नरेन्द्र भी होंगे, कैलाश भी होंगे, नरोत्तम भी होंगे, ज्योतिरादित्य भी होंगे, विष्णु भी होंगे और उमा भी होंगी। वैसे शिवराज के इस मंत्रिमंडल में सभी तासीर और तेवर के लोग हैं। मसलन अगर कैबिनेट में ‘इमरती’ है तो ‘डंग’ भी है। ‘महेन्द्र’ है तो ‘इंदर’ भी है। ‘गोविंद’ तो पहले से थे, अब ‘गोपाल’ भी आ गए हैं। ‘कमल’ पहले से खिला था, अब ‘अरविंद’ भी खिल गया है। ‘राम’ से जुड़े तीन चेहरे हैं। प्रभुराम हैं, रामखेलावन हैं और रामकिशोर भी हैं। ‘विश्वास’ भी है और ‘प्रेम’ भी है। 

इस सियासी ‘उपवन’ से हटकर हम इसे मध्यप्रदेश के ‘टाइगर स्टेट’ होने का ‘राजनीतिक प्रतिबिम्ब’ भी मान सकते हैं। मप्र के 6 अभयारण्यों में इन दिनो 526 टाइगर बताए जाते हैं। यानी हर ‘टाइगर समूह’ का एक अपना ‘अभयारण्य’ है। कांग्रेस में तो  ‘सियासी टाइगर’ वक्ती तकाजे के मुताबिक पंजे मिलाते और भिड़ाते रहते हैं। इसी तरीके से उन्हें सत्ता मिलती और फिसलती भी है। फिर भी टाइगरों का क्षेत्राधिकार कम नहीं होता। यही  शैली अब भाजपा के राजनीतिक एरीना में खुले तौर पर दिखने लगी है। कांग्रेस में तो टाइगर ‘व्यक्ति’ रूप में ही होते हैं, लेकिन भाजपा में तो व्यक्तियों के अलावा संगठन और आरएसएस के अपने भी क्षेत्राधिकार हैं, जहां सिर्फ उन्हीं की दहाड़ सुने जाने का आग्रह होता है। यहां बुनियादी सवाल यह है कि इस ‘मल्टी टाइगर’ व्यवस्था में क्या राजनीतिक टाइगर और मजबूत होंगे या मजबूर होंगे ? कांग्रेस नेता अजय सिंह ने कहा कि प्रदेश के राजनीतिक कानन में भी टाइगर तो बढ़े हैं, लेकिन वो सर्कस के हैं। इसका सीधा अर्थ है कि सत्ता के अभयारण्य में निर्द्वंद्व विचरने वाले ‘टाइगरों’ का जमाना गया। सत्ता के फलक पर जो ‘टाइगर’ नमूदार होंगे वो रिंग मास्टर के इशारे पर केवल करतब दिखाने वाले ‘टाइगर’ ही होंगे। उनके चारों अोर लक्ष्मण रेखाएं खिंची होंगी। जबकि असली टाइगर अपने क्षेत्राधिकार से कभी समझौता नहीं करता। वह अपने ढंग और गुरूर में जीता है। लेकिन सर्कस के ‘टाइगरों’ को अपनी ‘अथाॅरिटी’ और दहाड़ भी गिरवी रखनी पडती है। शिवराज ने तो ‘टाइगर’ होने के बाद  मंत्रिमंडल विस्तार में समझौते का ‘विष’ पी लिया है। लेकिन नीलकंठ बनकर वो भी  कब तक राज कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। और फिर राज्य में विधानसभा उपचुनावों के बाद किस ‘टाइगर’ को कितना विष पीना पड़ेगा, किसे शिकार की जगह घास चरनी पड़ेगी, यह अभी तय होना है। कौन किसको आईना दिखाएगा, यह भी साफ होना है। वरना कांग्रेसी टाइगर तो अभी भी नए शिकार के लिए मौके की तलाश में हैं। यूं भी टाइगर या तो शिकार करता है या शिकार हो जाता है। मध्यप्रदेश की नई ‘राजनीतिक अरण्य कथा’ का यही सबक है। 

(अजय बोकिल सुबह सवेरे के वरिष्ठ सम्पादक हैं)

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