मप्र भाजपा की खुशी में गोटिया की फांस

मप्र से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए हुएउ चुनाव के दौरान विधानसभा परिसर में उपस्थिति नेताओं और मीडियाकर्मियों में से किसी को भी परिणाम सुन कर अचरज नहीं हुआ, क्योंकि परिणाम का अंदाजा पहले ही लगाया लिया गया था। सभी की रूचि केवल यह जानने में थी कि कांग्रेस के प्रत्याशी विवेक तन्खा को कितने मत मिले 62 या 63। ज्यों ही यह खुलासा हुआ कि तन्‍खा को 63 मत मिले हैं, कांग्रेस नेताओं ने नारों से हाल गूंजा दिया। उनकी आवाज भाजपा के नेताओं के नारों से अधिक थी। उनके चेहरे की चमक भाजपा के नेताओं से ज्यादा थी। जबकि भाजपा के खाते में दो सीट हैं और उसके नेताओं की आवाज अधिक ऊंची होना थी लेकिन वे जीत पर खुशी के इजहार से अधिक निर्दलीय के रूप में खड़े किए गए भाजपा महामंत्री विनोद गोटिया की हार पर स्पष्टीकरण दे रहे थे। वे यह कहते रहे कि निर्णय तो पहले से तय था। संख्या बल में कांग्रेसी आगे थे। हमने लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ा। वगैरह-वगैरह। इतना तो तय है कि भाजपा निर्दलीय प्रत्याशी नहीं उतारती तो भी परिणाम यही रहता या तन्खा को एक-दो वोट कम मिलते। लेकिन तब कांग्रेस के खेमे की आवाज इतनी ऊंची नहीं होती। तब उनके भीतर भाजपा को शिकस्त देने का भाव नहीं होता। उस भाजपा को शिकस्त देने का भाव जिस भाजपा ने लगभग हर चुनाव में कांग्रेस का दायरा समेटा है। अगर भाजपा निर्दलीय प्रत्याशी खड़ा नहीं करती तो कांग्रेस के खेमे की खुशियों में इतनी चमक नहीं होती और भाजपा की खुशियों की राह में गोटिया के हार की फांस नहीं होती। सभी जानते हैं कि भाजपा के कई मनचाहे प्रस्ताक राज्यटसभा में बहुमत न होने के कारण पास नहीं हो रहे हैं। वह चाहती है कि संसद के ऊंचे सदन में उसे बहुमत मिल जाए। इस बहुमत के लिए वह इंतजार नहीं करना चाहती। उसे जल्द से जल्द वहां कब्जा चाहिए। इसीलिए शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी की शुचिता और स्वरच्छता की छवि को दांव लगा कर हर जगह निर्दलीय उम्मीदवार खड़े किए। ऐसा नहीं है कि मप्र में भाजपा ने गोटिया को जिताने के प्रयास नहीं किए लेकिन फासला बहुत बड़ा था। भाजपा के प्रयास छोटे पड़ गए। परिणाम सबके सामने है। यहां जश्न की खुशियों में एक मलाल है कि कांग्रेस की सादगी से होने वाली जीत भी बड़ी बन गई है।

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