महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार की भूमिका

5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का बहुप्रतीक्षित भूमिपूजन होने जा रहा है। इस भूमिपपूजन से आम आदमी के जीवन में कोई फर्क आये या न आये पर महाराष्ट्र की राजनीति में जरूर फर्क आ सकता है। वैसे तो महाराष्ट्र में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवसेना इनकी गठबन्धन से बनी सरकार है, पर वह चलती है सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार के इशारों पर। वैसे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बीच -बीच में अपना अधिकार जताने की कोशिश जरूर करते है, पर आखिर शरद पवार उनकी लगाम खींच ही लेते है। तीन बेमेल पक्षों के मेल से बनी यह सरकार उस तिनपहिया कुर्सी की तरह है जिसका एक भी पहिया अगर अपनी जगह से खिसक जाए तो वह गिर पड़े।

कांग्रेस और शिवसेना के विचार तो बिलकुल ही उत्तर ध्रुव दक्षिण ध्रुव जैसे होते हुए भी यह सरकार बनाने का करिश्मा शरद पवार ने कर दिखाया। इधर शिवसेना अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए उतावली थी, उधर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस सत्ता से दूर रहकर बेचैन थे। हालांकि सोनिया गांधी शिवसेना के साथ सरकार बनाने के लिए बिलकुल भी राजी नही थी, पर शरद पवार के मनाने पर वह राजी हो गयी। अब जब भी कांग्रेस इस सरकार से नाराज होती है तो शिवसेना और कांग्रेस में सुलह कराने का जिम्मा शरद पवार को ही उठाना पड़ता है। कई बार तो स्वयं शरद पवार के पार्टी के मंत्री भी सरकार से नाराज हो जाते है। ऐसी सरकार चलाना किसी सर्कस चलाने से कम नही। शरद पवार ही है जो इस सर्कस को संभाले हुए है। ऐसे में जब 5 अगस्त को होने वाले राम मंदिर के भूमिपपूजन की बात चली तो शरद पवार ने कहा कि, ‘ कुछ लोगों को लगता है कि राम मंदिर बनाने से कोरोना खत्म हो जाएगा। अगर ऐसा होने वाला हो तो राम मंदिर का भूमिपपूजन जरूर करे।’ इस अर्थ का विधान करके इस विषय पर अपनी नाराजी जताई ।

महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार हमेशा से एक कद्दावर नेता रहे है। उनकी बातों को नजरअंदाज करना बड़ी मुश्किल बात होती है। जब यह सरकार बन रही थी तब उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य को मुख्यमंत्री बनाने की पूरी तैयारियां हो चुकी थी, पर शरद पवार के कहने पर उस पर रोक लगा दी गई और उद्धव ठाकरे को  किसी भी सदन के प्रतिनिधि ना होते हुए भी मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसा कहा जाता है और वह सच भी है कि महाराष्ट्र में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने मुख्यमंत्री उसे ही बनाया जाता है जिसके नाम को शरद पवार हरी झंडी दिखाते है ! ऐसा होते हुए भी शरद पवार कभी सीधी चाल नही चलते, कभी सीधे बोल नही बोलते। उनकी हर बात, ‘ कही पे निगाहे कही पे निशाना’ जैसी होती है। अभी भी उनका राम मंदिर के संबंध में किया विधान भले ही प्रधानमंत्री की ओर इशारा करता नजर आ रहा हो पर वह उद्धव ठाकरे को अयोध्या न जाने का दिया गया संदेश है। अयोध्या के बहाने कही फिरसे शिवसेना और भाजपा में नजदीकियां ना बढ़ जाये यह डर शरद पवार को सता रहा है। अगर ऐसा होता है तो फिर हाथ आई हुई सत्ता देखते- देखते हाथों से फिसल सकती है। शरद पवार यह भली भांति जानते है कि अगर शिवसेना और भाजपा एक हो जाते है तो उनकी पार्टी कभी भी सत्ता में नही आ सकती।

पिछले विधान सभा चुनावों के नतीजे अभी पूरे आये भी नही थे, पर भाजपा को पूर्ण बहुमत नही मिल सकता यह तय हो चुका था, तभी शरद पवारने बिना मांगे भाजपा को अपना समर्थन घोषित कर दिया था। तब भी  शरद पवार का भाजपा शिवसेना एक दूसरे से दूर ही रहे यही उद्देश्य था। अभी अभी उन्होंने शिवसेना सांसद संजय राउत को दिए एक साक्षात्कार में यह बात खुद कबूली है। अबकी बार भी रातों रात शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ हाथ मिलाकर सरकार स्थापित करना और सिर्फ 80 घंटों में वापस अपने चाचा के खेमे में लौटकर फडणवीस सरकार गिरा देना यह भी शरद पवार की ही चली हुई चाल थी, ताकि शिवसेना और भाजपा के बीच की दूरियां गहरी खाई में परिवर्तित हो जाये। ऐसी चाल चलके पवार ने शिवसेना को अपने साथ आने पर मजबूर कर दिया।

ऐसी परिस्थितियों में सवाल यह है कि, क्या शरद पवार को नाराज करके मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अयोध्या जाने का साहस जुटा पाएंगे ? जिसके बलबूते पर सरकार बनी भी है और टिकी भी है उसे नाराज करना याने खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। भाजपा की और से या राम मंदिर ट्रस्ट की और से उद्धव ठाकरे को भूमिपपूजन समारोह का न्योता आना बिलकुल तय है। राजनीति के बदलते रंग भांपकर शिवसेना ने बहुत पहले ही ‘मराठी मानुस’ की संकुचित भूमिका त्यागकर खुद को हिंदुत्ववादी घोषित कर दिया है। ऐसे में उद्धव ठाकरे का अयोध्या न जाना उनकी हिंदुत्ववादी छवि को धूमिल कर देगा, जिसकी उनको और उनकी पार्टी को बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अब अयोध्या जाकर सरकार को दांव पर लगाये या न जाकर पार्टी की छवि को दांव पर लगाये यह फैसला उद्धव ठाकरे को करना है। 

-मुकुंद परदेसी

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