मोदी की शह पर ‘अडानी’ के मुकाबले ‘केरल-सरकार’ की हार ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चहेते उद्योगपतियों में शुमार गौतम अडानी के समूह ने एयरपोर्ट नीलामी में केरल सरकार को पछाड़ कर तिरूवनंतपुरम विमानतल की बोली जीत ली है। सरकारी पूंजी के मुकाबले निजी पूंजी के वर्चस्व की यह स्थापना लोकतंत्र के सामाजिक तकाजों के लिए चुनौती है। किसी राज्य सरकार के मुकाबले किसी उद्योगपति की आर्थिक और राजनैतिक हैसियत में यह इजाफा पूंजी और सत्ता के केन्द्रीकरण का खतरनाक संकेत है। नीलामी के विवादास्पद पहलुओं से इतर देश के आर्थिक ताने-बाने में बदलाव का यह प्रतिबिम्ब उन काली छायाओं का विस्तार है, जो हवाई चप्पल पहनने वाले करोड़ो लोगों की भूख-प्यास को गहराने वाली हैं। केरल सरकार बोली हारने पर नाराज है। केन्द्र ने दो दिन पहले ही तीन हवाई अड्डों के निजीकरण को हरी झंडी दी थी। केरल सरकार इस मसले को मोदी सरकार के सामने उठाने जा रही है। उसका कहना है कि हवाई अड्डे की नीलामी में सबसे अधिक बोली के बराबर बोली लगाने के उसके प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने अनुमति नहीं दी है। यह रवैय्या पक्षपाती है।

27 अप्रैल 2017 को शिमला में क्षेत्रीय हवाई सम्पर्क योजना की शुरूआत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पहले एयर लाइंस में राजा-महाराजा ही सफर करते थे। देश का गरीब हवाई चप्पल पहनता है। मैं चाहता हूं कि हवाई चप्पल पहलने वाला व्यक्ति हवाई जहाज में उड़ान भरे…। मोदी की शाब्दिक मंशाओं और जुमलों के मुकाबला करना आसान नहीं है, जबकि सच्चाई यह है कि भूख और बदहाली की भागमभाग में करोड़ों लोगों की हवाई चप्पलें टूट चुकी हैं।

देश के 123 हवाई अड्डों में केवल 14 हवाई अड्डे मुनाफा कमा रहे हैं। इनमें सात का मुनाफा सौ करोड़ से ज्यादा है। मुनाफे के 14 हवाई अड्डों में से छह को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। हवाई अड्डों का निजीकरण 2003 में शुरू हुआ था। उस वक्त प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई थे। सबसे पहले दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट का निजीकरण हुआ था। मोदी सरकार ने यह क्रम जारी रखा। मोदी-सरकार ने जुलाई 2019 में अहमदाबाद, लखनऊ और मंगलुरू एयरपोर्ट अपनी पसंदीदा कंपनी अडाणी एंटरप्राइजेज को सौंप दिए थे। अगली कड़ी में गुवाहाटी, तिरूवनंतपुरम और मंगलुरू भी अडाणी समूह को सौंपे जाने थे। पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत छह हवाई अड्डों को निजी कंपनियों को सौंपने के प्रस्ताव (टेंडर) 14 दिसम्बर 2018 में आमंत्रित किए गए थे।

तिरूवनंतपुरम की नीलामी से केरल सरकार सहमत नहीं थी। केरल की आपत्ति यह थी कि उसके राज्य के एयरपोर्ट की नीलामी के पहले उनसे बात तक नहीं की गई। यह सवाल भी उठा कि हवाई अड्डों के चयन का आधार क्या है? फिर जिन हवाई अड्डों को निजी कंपनियों को सौंपा जाना है, वहां सरकार करोड़ो रूपयों का काम क्यों करवा रही है? 27 जून 2019 को संसद में उड्डयन मंत्रालय ने कहा था कि लखनऊ में 1484.84 करोड़, जयपुर में 1557 करोड़, गुवाहाटी में 142 करोड़, मंगलुरू में 254 करोड़, और तिरूवनंतपुरम में 26.67 करोड़ के काम चल रहे हैं। केरल सरकार की आपत्ति के कारण ही तिरूवनंतपुरम की नीलामी को होल्ड पर रखा गया था।

ताजा निर्णय के बाद केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर हस्तक्षेप करने की मांग की है। मुख्यमंत्री विजयन के मतानुसार केन्द्र ने केरल सरकार के दावे को खारिज करते हुए एयरपोर्ट अडाणी समूह को सौंपने का एकतरफा फैसला किया है, जबकि केरल सरकार ने अडाणी समूह के बराबर बोली लगाने की पेशकश की थी। इस परिप्रेक्ष्य में केरल सरकार के लिए उपरोक्त निर्णय के क्रियान्वयन में सहयोग देना मुश्किल होगा। केन्द्र का कहना है कि नीलामी से पहले केन्द्र और केरल सरकार में सहमति बनी थी कि केरल की बोली और जीतने वाले की बोली में 10 प्रतिशत अंतर रहने पर ही हवाई अड्डे का पट्टा केरल को दिया जाएगा। अडाणी एंटरप्राइजेज की बोली केरल की बोली में 19 प्रतिशत का अंतर था. इसलिए पट्टा अडाणी को मिल गया।

विवाद का एक पहलू यह भी है कि केरल में कम्युनिस्ट नेता पिनराई विजयन के नेतृत्व में गठित वाम मोर्चा की सरकार है। विचारधारा की जमीन पर भाजपा और कम्युनिस्टों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। वैचारिक धरातल पर केरल की वाम मोर्चा और केन्द्र की भाजपा सरकार के बीच विभिन्न मुद्दों पर खून-खराबे के स्तर तक टकराव होता रहा है। विरोधाभास यह है कि मोदी-सरकार सार्वजनिक उपक्रमों के धंधे में सरकार की भूमिका कम कर रही है, जबकि केरल सरकार कारोबार में अपना दखल बढ़ाने में लगी है। कोच्चि हवाई अड्डे के निवेश में भी केरल सरकार ने 33 फीसदी हिस्सेदारी हासिल की थी। बाकी हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात के निवेशकों के पास है। यही कारोबारी हसरतें तिरूवअनंतपुरम एयरपोर्ट के मामले में भी छलक रही थीं। मोदी सरकार ने इन हसरतों को नेस्तनाबूद कर दिया है। मसले में केरल कानूनी लड़ाई की रणनीति पर भी काम कर रहा है। फिलवक्त अडानी की राहें इतनी आसान नहीं हैं।

राज्य सरकारों के मुकाबले देश के उद्योगपतियों का मजबूत होना दर्शाता है कि सरकार के सारे संसाधन निजी क्षेत्र की तिजोरियों में जा रहे हैं। अडाणी-अंबानी की अमीरी की सुर्खियां मीडिया के मुखपृष्ठों पर फैलती जा रही हैं। अडाणी के मुकाबले केरल सरकार की हार को महज एक आर्थिक एपीसोड की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह गरीब और गरीबी की अवहेलना और अनदेखी की दर्दनाक भूमिका की शुरूआत है।

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