मोदी-शाह लोकतंत्र से ही लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं..

योगेंद्र यादव

 

आपातकाल की 45वीं सालगिरह! मुझे याद है, 1975 के 26 जून की वो सुबह ! अपने पिता का अवसन्न चेहरा! रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने आपातकाल का ऐलान किया और अपने गांव में रेडियो पर इसे सुनकर मेरे पिता के चेहरे पर दुख और क्रोध की काली छाया मंडराने लगी थी। तब मैं बमुश्किल 12 साल का था।  लेकिन, आगे आने वाले 19 महीने मेरे लिए गहरी राजनीतिक शिक्षा के रहे। मिजाज से नरमपंथी और हरचंद कानून को मानकर चलने वाले मेरे पिता ने उन दिनों आपातकाल के विरोध के कुछ प्रतीकात्मक तौर-तरीके निकाल लिए थे और, ये सब देखकर गांव में ज्यादातर लोग भय और हैरत में थे।

हमलोग देश में हो रही घटनाओं की सच्चाई जानने के लिए हर सांझ बीबीसी रेडियो सुनते थे। एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में मैंने अपने कस्बे में इमरजेंसी के खिलाफ एक भाव भरा भाषण दिया था। 1977 में जब चुनावों की घोषणा हुई तो हमारे पूरे परिवार ने जनता पार्टी के पक्ष में अभियान में हिस्सा लिया। मतगणना का वो दिन तो खैर मैं कभी भूल ही नहीं सकता जब इंदिरा गांधी की हार का जश्न मनाते लोगों के हुजूम के बीच मैं खड़ा था। इंदिरा गांधी के अधिनायकवाद से लड़ाई की वो घड़ी और उससे जुड़ी याद हमारे भीतर प्रेरणा का ज्वार जगाती है।

तो क्या एक बार फिर से इस देश पर इमरजेंसी आयद होने का अंदेशा है? क्या हम एक अघोषित आपातकाल के दौर में रह रहे हैं? क्या मौजूदा सरकार इमरजेंसी के वक्त की ही तरह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हरण कर लेगी, मीडिया पर सेंसरशिप लगाएगी और  विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल देगी? ‘अघोषित इमरजेंसी’ से ये बोध जगता है कि आपातकाल के दौर में जो अनुभव हुए थे, कुछ वैसा ही अब भी चल रहा है, अंतर बस इतना है कि जो कुछ चल रहा है वो भरपूर नजर नहीं आ रहा है और अपने असर में तनिक नरम है। लेकिन ये बात सच नहीं है। मोदी के शासन में 1975-77 का दौर अपने को दोहरा नहीं रहा। हमारा दौर इमरजेंसी के दौर की तुलना में बेहतर भले जान पड़े लेकिन असल में उस दौर से कहीं ज्यादा बुरा हो सकता है।

इमरजेंसी के बारे में हम इतना भर कह सकते हैं कि वो एक असामान्य स्थिति थी, रोजमर्रा के शासन के ढर्रे से बहुत अलग हटकर हुआ उस वक्त। आज का समय एकदम ही अलग है जब असामान्यता खुद में एक चलन बन चुकी है। इमरजेंसी आयद करने के लिए तो कानून का जरिया तलाशने की जरुरत थी लेकिन लोकतंत्र के मर्म को छलने और बदलने के लिए यह कत्तई जरुरी नहीं। आपातकाल की एक शुरुआत थी और इसी नाते, कम से कम कागजी तौर पर ही सही, उसके अंत की भी एक तारीख थी।

आज हम जिस शासन में रह रहे हैं उसकी शुरुआत का बिन्दु तो बिल्कुल स्पष्ट है लेकिन कोई नहीं जानता कि इसका अंत कब होगा। लगता नहीं, कि निकट भविष्य में इस अंधेरी रात को चुनौती देता लोकतांत्रिक विहान फूटेगा। हमारे देश में ‘लोकतंत्र पर कब्जा’ जमाने की घटना कब की हो चुकी है। संविधान लागू होने के साथ इस देश में गणतांत्रिक मुल्क होने का जो पहला अध्याय खुला था, वो कब का बंद हो चुका है।

मैं इसे ‘लोकतंत्र पर कब्जा’ का ही नाम दूंगा। क्योंकि जिस शै पर कब्जा जमाया गया है, उसका नाम लोकतंत्र है। कब्जा जमाने के लिए जिस तौर-तरीके का इस्तेमाल किया गया है वो भी लोकतांत्रिक ही जान पड़ता है। यानी लोकतंत्र के औपचारिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके लोकतंत्र के मर्म को बदलने का काम किया गया है।

यही संदेश है ‘हाऊ डेमोक्रेसी डाइज:ह्वाट हिस्ट्री रीविल्स अबाउट अवर फ्यूचर ‘ नाम की किताब का। हार्वर्ड के राजनीतिविज्ञानी दो प्रोफेसर, स्टीफन लेवित्स्की तथा डेनियल जिब्लेट द्वारा लिखित और साल 2018 में प्रकाशित इस बहुचर्चित किताब में बताया गया है कि हमारे अपने वक्त में लोकतंत्र का नाश कैसे लोकतांत्रिक तरीकों से हुआ है। किताब हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र का खात्मा यों ही बड़े बेआवाज, धीमे और ना नजर आने वाली टेक पर होता है। लोकतंत्र का यह खात्मा अक्सर लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राजनेताओं के हाथों होता है और इस खात्मे के लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल होता है। किताब में एक जगह आता है,  ‘अधिनायकवाद की तरफ ले जाते चुनावी रास्ते का एक त्रासद विरोधाभास ये है कि लोकतंत्र के हत्यारे लोकतंत्र की ही संस्थाओं का इस्तेमाल करते हैं और बहुत महीनी से, धीरे-धीरे तथा विधि-सम्मत ढंग से लोकतंत्र की हत्या कर देते हैं।’

कोई सैन्य तख्तापलट नहीं होता, इमरजेंसी सरीखी कोई संवैधानिक सेंधमारी नहीं होती बल्कि अधिनायकवादी शासक रोजमर्रा के राजनीतिक व्याकरण को बदलकर लोकतंत्र का खात्मा कर डालते हैं। इसमें कुल तीन तरकीबें एक-एक कर आजमाई जाती हैं, जिनका जिम्मा फैसला सुनाने का होता है उन निर्णायकों को कब्जे में ले लिया जाता है, जिन खिलाड़ियों से मुकाबले का मैदान सजा होता है उन्हें एक किनारे खिसका दिया जाता है और फिर खेल के नियम नए सिरे से लिख दिए जाते हैं। इस किताब में भारत का जिक्र नहीं आता लेकिन मोदी एवं शाह के वक्त के भारत के साथ किताब में दिए गए उदाहरणों का साम्य बैठाकर देखना मुश्किल नहीं। फैसला सुनाने वाले निर्णायकों पर कब्जा जमाने का काम, मिसाल के लिए केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) सरीखी जांच एजेंसियों को मुट्ठी में करना,(केंद्रीय सूचना आयोग) सीआईसी और सीएजी जैसी निगरानी की संस्थाओं को निष्फल और निष्प्रभावी करना और सर्वोच्च न्यायालय के जजों को अपने प्रभाव में करना, मोदी-शाह के शासन वाले भारत में कहीं और के मुकाबले ज्यादा आसानी और पूरेपन के साथ हुआ है। मौजूदा सरकार ने मैदान के खिलाड़ियों, जैसे विपक्ष के नेतागण, मीडिया, सांस्कृतिक प्रतीक तथा व्यवसाय जगत के अग्रणी चेहरों को एक किनारे करने के लिए जो तरकीब अपनाई वो अपने-अपने देश में लोकतंत्र की हत्या करने वाले अधिनायकवादी राजनेताओं की आजमाई तरकीब से बहुत अलग नहीं है। तकरीबन सबक लेने जैसा है ये देखना कि कैसे इन राजनेताओं ने बगैर सेंसरशिप लगाए मीडिया को अपनी मुट्ठी में कर लिया। मोदी सरकार ने बस एक ही चीज नहीं की, वो ये कि राजनीति के खेल के संवैधानिक नियमों को अभी नहीं बदला। अभी तक चुनाव के नियम नहीं बदले हैं, ना ही चुनावों को स्थगित किया गया है।

ये सरकार मतदाताओं के बीच इस कदर लोकप्रिय है, मीडिया और न्यायपालिका पर इस हद तक उसका असर है कि उसे ऐसा करने की जरुरत नहीं लगती। लेकिन ये न मानें कि सरकार ऐसा नहीं करेगी। उपरोक्त किताब के लेखकों का कहना है कि : लोकतंत्र की मौत जिस ढर्रे पर होती है उसकी एक बड़ी विडंबना ये है उसमें बहाना लोकतंत्र की हिफाजत का किया जाता है। क्या आपको अब भी नहीं लगता कि किताब के लेखकों ने ये बातें 26 जून 2020 के भारत के लिए लिखी हैं ?

(योगेंद्र यादव स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )

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