‘ये आज़ादी मैंने खुद कमाई है’

दरवाज़े पर ठक-ठक हुई, मैं लिखते-लिखते उठ गई। दरवाज़ा खोला सुखद आश्‍चर्य, सामने वाली ख़ुशमिज़ाज 72 वर्षीय वर्मा आँटी दरवाज़े पर अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ खड़ी थी। मुझे आश्‍चर्य भी हुआ क्योंकि कॉलोनी में घूमते-घूमते  हैलो-हाय वाला परिचय था हमारा। मीठे स्वर में उन्होंने कहा तुम्हें डिस्टर्ब तो नहीं किया बेटा, क्या थोड़ी देर मैं तुमसे बात कर सकती हूँ , मैंने कहा – क्यों नहीं।

झिझकते हुये उन्होंने बात शुरू की जहाँ तक मैं उनके परिवार के बारे में जानती हूँ एक बेटा और बेटी हैं दोनों शादीशुदा। बेटा विदेश में है साल में एक बार आता है। बेटी इंडिया में है अभी छह या सात महीने पहले अंकल का देहांत हुआ, पर आंटी उसी जिं़दादिली से जीती रही, किटी में जाती रहीं। ख़ुद का बड़ा सा मकान है। मैं क्या सोचती हूँ आजकल अगर मैं किसी से शेयर करूँ तो शायद लोग मुझे स्वार्थी समझेंगे। तुम्हारे अंकल ने मेरा खूब ख़्याल रखा, बच्चे भी रखते है पर मेरे से एक गलती हो गई। मैंने उन्हें एक निर्भर लालच या मेरा अतिरिक्त प्रेम और केयर उनकी मुझसे उम्मीदे बढ़ा गया। अंकल ने मेरे लिये मकान, पेंशन, कुछ डिपाजिट्स छोड़े हैं। जब वो थे सारी जिं़दगी उन्होंने एक मोटी राशि मुझे घर खर्च के अलावा अलग से दी कि मैं जैसे चाहे खर्च करूँ उन्होंने कभी हिसाब नहीं मांगा। मैंने एक दो किटी की, दो बच्चे गोद लिये संस्था में एक बुजुर्ग का खर्चा भी। बाकी सारा बचा, साल भर इकठ्ठा करती और जब दोनों बेटे, बेटी आते तो एक मोटी रकम उन्हें देती, पहले ना नुकुर करते वो फॉर ग्रांटेड लेने लगे और मैंने खुद के लिये कुछ नहीं रखा मेरे लिये अंकल जो थे। अब मैं राशि देने में असमर्थ हूँ फिर बच्चे भी खुद समर्थ हैं पर थोड़ा रिश्तों में खिंचाव महसूस करती हूँ आजकल।

बेटा कहने लगा है अगर आपको कुछ हो गया तो हमें उतनी दूर से आने में समस्या होगी, इतने बड़े घर का क्या करोगी। आप सब बेच-बाच के कनाड़ा चलों। बेटी- दामाद कहते है सब बेच के हमारे साथ रहो। हो सकता है इसमें उनका प्यार छुपा हो, पर मैं आत्मनिर्भर रहना चाहती हूँ। अपनी बीमारी में अपना पैसा सुरक्षित रखना चाहती हूँ। किसी को परेशान नहीं करना चाहती । पैसे के लिये बच्चों के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहती। घूमना चाहती हूँ। महिलाओं के ग्रुप के साथ कार्यक्रम भी बन गया है। उनका कहना है इस उम्र में मैं घर बैठकर भजन करूँ। कुछ हो गया तो। “देखो बेटा होना होगा तो वो सबके बीच भी हो सकता है। तुम मुझे स्वार्थी समझोगी तुम्हारे अंकल बहुत अच्छे थे पर उनके जाने के बाद मैंने अपनी अस्मिता पहचानी। वरना हमेशा दूध में शक्कर की तरह घुली रही। पैसे की अहमियत समझी। जिम्मेदारियों की वजह से अपने प्रिय काम समाज सेवा (जिसे मेरे बच्चे पैसे फूंकना कहने लगे है अब, क्योंकि उनकी राशि बंद हो गई है) को भूल बैठी थी। अब मैं अपनी जिं़दगी जीना चाहती हूँ मुझे लगा तुम्हे अगर बताऊँगी कि मैं क्या सोचती हूँ तो शायद तुम समझोगी।

 “क्यों नहीं आंटी, हमेशा दूसरों की जिं़दगी जीते अगर आप को संतुष्टि ना मिली, एक कुछ ना होने का अहसास बना रहा तो अब उसे पूरा करने का आपको पूरा अधिकार है। आपके बच्चे कहीं नहीं जायेंगे लौट के उन्हें यही आना है। घर बड़ा है तो क्या उनके कमरे भी है। आपको सलीके से अच्छी ज़िंदगी जीने का पूरा अधिकार है बस्स वो उठ खड़ी हुई। ‘आज बहुत हलकापन लगा तुम्हें बताके कि मैं क्या सोचती हूँ’। अब उनके जाते ही मैंने सोचना शुरू किया कि अति भावुकता में मैंने अपने जीवन के बारे में कुछ नहीं सोचा। मुझे भी आखिऱ बुढ़ापे में अपनी आज़ादी चाहिये, अपने जीवन के निर्णयों की बागडोर किसी के हाथ में नहीं दूँगी। अपने जीवन की जिम्मेदार स्वयं बनूँगी। बच्चों का स्नेह चाहिये, उन पर निर्भरता या उनके ताने नहीं चाहिये।

मैं ये नहीं कहती कि हमारी परवरिश में कोई खोट है पर हमारे परिवार के दूसरे सदस्यों, बच्चों की अपनी जिं़दगी भी है जो वो अपने परिवार की जिम्मेदारियों के चलते थोड़े हमारे प्रति लापरवाह हो जाते है तो क्या हर्ज़ है थोड़ी जमा पूंजी हम अपने लिये रखें, परिवार व बच्चों के लिये स्नेह और उनकी ज़रूरत के समय के लिये कुछ राशि। कुछ लोगों को बड़ा बुरा लगता है अगर उनसे पूछती हूँ कि आपने वसीयत लिख दी क्या उन्हें लगता है, मैं आज ही उनके मरने की तमन्ना कर रही हूँ पर क्या आप चाहेंगे आपके सपनों के घर के सदस्य आपके वसीयत ना लिखने पर आप की लाश पर ज़मीन ज़ायदाद के लिये झगड़े ? वैसे भी आपकी अपनी जिं़दगी है सारी जिं़दगी के संघर्षो के बाद ये आज़ादी हाथ आई है तो इच्छायें पूरी करने के लिये कुछ रकम का होना ज़रूरी होना नहीं आपके बैंक में। आपकी अपनी कमाई आज़ादी आपकी जिं़दगी में।

ये आज़ादी मैंने ख़ुद कमाई है
हालांकि कई रातों की नींदे गवांई है
रखा था स्वाभिमान ताक पर कई बार
बाती दिये में कई बार टिमटिमाई है
ये आज़ादी मैंने ………..
गोया सारा इलजाम मेरे सिर था
जेल में तड़पने की सजा भी पाई है
अहसानमंद हूँ तेरा ए हालात
जो तूने बार-बार ठोकर लगाई है
ये आज़ादी मैंने ………..
कब तक ना निकलता पत्थर से पानी
हथौड़ी जो उसने जम कर लगाई है
बह निकली मैं खिलखिलाती झूमती
अब ये राह मेरे साथ आई है

बेटे को कनाडा फोन लगा कर कहा कि मुझे वहाँ ज़रा भी अच्छा नहीं लगता वैसे भी तुम लोगों को इंडिया आना अच्छा लगता है सो तुम लोग ही आ जाना। सो सोच रही हूँ आज सभी पुरानी दोस्तों के साथ कैफे में नास्टेल्जिया जाये ठहाकों के साथ और पूछा जाये मुस्कुरा के …… और क्या कह रही है ज़िंदगी।

-ममता तिवारी

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