राजनीतिक सीढ़ियां के चयन में माहिर केजरीवाल

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार की सत्ता के आसमान के आगे एक बालिश्त औकात रखने वाली दिल्ली-सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कार्यकलापों ने उन्हें अखिल भारतीय परिदृश्‍य पर हावी राष्ट्रीय नेता बना दिया है। अरविंद केजरीवाल के नए-नए तजुर्बों ने उन्हें लीक से हटकर काम करने वाले एक नेता के रूप में नई पहचान दी है। उन्हें राजनीतिक-एडवेंचर पसंद है। उन्होंने देश की राजनीति को अपना अंदाज बदलने के लिए मजबूर किया है। सरकार के एक साल के रिपोर्ट-कार्ड को लेकर कांग्रेस और भाजपा उनकी बखिया उधेड़ने में लगी है, लेकिन आलोचनाओं से उनके अंदाज में कोई फर्क नहीं पड़ा है। केन्द्र-सरकार के कोप-भवन में लगातार पस्त होने के बावजूद मौका मिलते ही वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पंजा लड़ाने से बाज नहीं आते हैं। शायद यह उनकी ‘राजनीतिक-यूएसपी’ है। केजरीवाल कहते है कि सरकार चलाना या राजनीतिक करना कोई ‘रॉकेट-साइंस’ नहीं है, सवाल आपकी नीयत का है कि आप जनता के काम करना चाहते हैं अथवा नहीं…। हम तो दिल्ली में अपने एजेंडे को बखूबी अंजाम दे पा रहे हैं। मोदी-सरकार कुछ क्यों नहीं कर पा रही है, यह आपके शोध का विषय है?

अन्ना-आंदोलन की पतवार थामकर राजनीति के समुन्दर में उतरे अड़तालीस साल के अरविंद केजरीवाल के औपचारिक राजनीतिक सफर की शुरुआत गांधी जयंती, 2 अक्टूबर 2012 है याने बमुश्किल चार साल पुरानी है। कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक परम्पराओं में उपजे नेताओँ के हिसाब से वो नौसिखिया है। लेकिन भारत के जो राजनीतिक धुरन्धर उन्हें अनाड़ी या नौसिखिया मान कर उनसे भिड़े, उन्होंने मुंह की खाई है। राजनीति में ऊंचाइयां हासिल करने के लिए सीढ़ियों का चयन करने के हुनर में वो माहिर हैं। सार्वजनिक जीवन में अपनी छवि को विस्तार देने के लिए उन्होंने सबसे पहले अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल-आंदोलन की सीढ़ी का इस्तेमाल किया। लोकपाल आंदोलन ने उनकी छवि में ईमानदारी का नूर भर दिया था। नवम्बर 2012 में आम आदमी पार्टी का गठन करने के बाद राजनीतिक ऊंचाई हासिल करने के लिए अरविंद केजरीवाल ने नेहरू परिवार की उत्तराधिकारी यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के घपलों पर पैर रखकर अभूतपूर्व राजनीतिक छलांग लगाई। अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक-ट्रेक पर यह उनका रिकार्ड ‘लांग-जम्प’ था। दिल्ली में यूपीए की सरकार थी और सोनिया गांधी के दामाद होने के नाते राबर्ट वाड्रा तत्काकालीन भारतीय राजनीति की सबसे कमजोर नस थे, जिसको छूते ही यूपीए और कांग्रेस की राजनीति कसमसाने लगती थी। राबर्ट वाड्रा पर उनके आक्रमण ने उनकी हैसियत पर निर्भीकता का लेबल चस्पा किया था। उसके बाद केन्द्रीय विधि मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट के घपलों की कहानी तो उनके लिए हल्की-फुल्की कवायद भर थी।

2013 के विधान सभा चुनाव में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराकर केजरीवाल ने ‘जॉयन्ट-किलर’ का मैडल जीत कर अपने रुतबे का लोगों के सामने बयां किया था। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद केजरीवाल ने भारत के सबसे अमीर व्यक्ति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी उद्योगपति मुकेश अंबानी और उनकी कम्पनी रिलायंस के खिलाफ एफ.आय.आर. दर्ज कराने के आदेश जारी किए थे। मुकेश अंबानी जैसी शख्सियत के खिलाफ एफ.आय.आर. दर्ज करके केजरीवाल जनता के बीच अपनी यह छवि बनाने में सफल रहे कि सरकार चलाते वक्त वो किसी की भी परवाह नहीं करते हैं। उनके इस कदम ने उन्‍हें एक दमदार और समझदार राजनीतिक-प्रशासक के रूप में स्थापित कर दिया था। अपने दूसरे कार्यकाल में दिल्ली सरकार को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और पुलिस के अधीन करने के मसले पर मोदी सरकार से उनकी भिड़ंत ने उनके राजनीतिक-वजूद को आसमान पर पहुंचा दिया है।

वैसे अरविन्द केजरीवाल ने जनहित के कई काम किए हैं और उनके लेखेजोखे से जनता खुश है। यह इससे पता चलता है कि देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद अरविंद केजरीवाल सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता हैं। मोदी को 50 फीसदी लोग पसंद करते हैं तो केजरीवाल 39 प्रतिशत लोगों के पसंदीदा हैं। इतने कम समय में राजनीतिक हैसियत की इतनी ऊंचाई हासिल करने वाले शायद अरविंद केजरीवाल भारत के पहले नेता होंगे।

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