राजनीति और अपराध के गठजोड़ से उपजता विकास

यह कहना मुश्किल है कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराधों का राजनीतिकरण। लेकिन यह  तय है कि दोनों एक-दूसरे में इस तरह घुले-मिले हैं जैसे दूध में पानी। दोनों को एक-दूसरे से अलग करना नामुमकिन है। इनका जनम-जनम का साथ है।  कहा गया है कि घृणा अपराध से करो, अपराधी से नहीं। लेकिन हमारी राजनीति बेहद उदार और विशाल हृदय है। उसे अपराध और अपराधी दोनों से ही परहेज नहीं है। यह दोनों को गले लगाने के लिए सदैव तत्पर रहती है। इसकी पाचन शक्ति की कोई सानी नहीं है। यह अपराध को आसानी से पचा लेती है। बल्कि अपराध इसे पौष्टिकता प्रदान करते हैं। राजनीति नियमित रूप से इनका सेवन कर अपनी सेहत बनाये रखती है। सीधा सा गणित है। यदि राजनीति सेहतमंद रहेगी तो प्रजातन्त्र भी स्वस्थ रहेगा। जनता भी संतुष्ट रहेगी। प्रजातन्त्र और भूखी जनता की सेहत का ध्यान रखना राजनीति का कर्तव्य है।

कहा जाता है कि महान संत महर्षि वाल्मीकि पहले डाकू थे। बाद में उन्होंने घोर तपस्या करने के उपरांत अमर ग्रंथ रामायण की रचना की। हमारी राजनीति उस परंपरा की वाहक है। यह सारे चोर, डाकूओं और अपराधियों को सहर्ष आश्रय देती है। राजनीति मेन आकर उनका काया परिवर्तन हो जाता है। राजनीति की गंगा में डुबकी लगाकर सारे अपराधी अपराधमुक्त हो जाते हैं। राजनीति उन्हें साथ लेकर चुनाव लड़ती है। स़फेद चोला ओढ़कर ये  गुंडे से माननीय हो जाते हैं। इनकी सारी कालिख धुल जाती है।सभी माननीय जनता का कल्याण करने में जुट जाते हैं।  कहावत है कि चोर-चोर मौसेरे भाई। राजनीति में नेता और अपराधी मौसेरे नहीं बल्कि सगे भाई होते हैं। राजनीति और अपराध में अद्भुत सामंजस्य होता है। अपराधी राजनीति को बाहुबल और शक्ति प्रदान करते हैं। राजनीति उन्हें ऐसा कवच प्रदान करती है जिसे कानून भेद नहीं सकता है। वैसे भी राजनीति का पेड़ कोई हवा में नहीं उग जाता है। यह काले धन की खाद और अपराध का जल पाकर फलता-फूलता है। राजनीति अपराध के लिए अमृत होती है तो अपराध राजनीति के लिये संजीवनी। दोनों की लिव इन रिलेशनशिप से ही ‘विकास’ का जन्म होता है।

सूर्यग्रहण के समय चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य आकर सूर्य को ढँक लेता है। उसी तरह राजनीति अपराध को पूरी तरह आच्छादित कर देती है। अपराध दिखलायी देना ही बंद हो जाते हैं। सूर्य ग्रहण तो अल्पकालिक होता है। लेकिन राजनीतिक ग्रहण न केवल दीर्घकालिक बल्कि स्थायी होता है। यह न्याय और सत्य के सूर्य को पूरी तरह ढँक लेता है। इस घुप्प अंधेरे में प्रजातन्त्र को कुछ दिखलायी नहीं देता है। व्यवस्था अंधी हो जाती है। प्रकाश का ब्रांड लगाकर राजनीति अंधेरे का व्यापार करने लगती है। अंधेरे में सपने बेचना बेहद आसान होता है। अबोध जनता रोशनी के सपनों मे डूबी रहती है।

राजनीति और अपराध का सह अस्तित्व अटूट है। दोनों एक-दूसरे के परस्पर पूरक हैं। राजनीति अपराध को संरक्षण प्रदान करती है। अपराध राजनीति को समृद्ध और बलशाली बनाते हैं। राजनीति का आभा मण्डल दमकाने में अपराध का महत्वपूर्ण योगदान होता है। बदले में राजनीति अपराध के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कर देती है। अपराध का चेहरा दमकने लगता है। इस राजनीतिक वाल्मीकियों को देखकर जनता निहाल हो जाती है।   राजनीति और अपराध के गठबंधन के कारण व्यवस्था जरूर धर्म संकट में रहती है। खाकी वर्दी तो बेहद असमंजस में रहती है। जिनका इनकाउंटर करने के लिये ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती है वे नेतागिरी का चोला ओढ़ लेते हैं। कालांतर में उनकी सुरक्षा में खाकी वर्दी को तैनात कर दिया जाता है। खाकी वर्दी उन्हें सलामी देने के लिए विवश हो जाती है। हद तो तब होती है जब राजनीति का चोला ओढ़े अपराध खाकी वर्दी को रक्त से लाल कर देता है। वर्दी शहीद होने के लिये अभिशप्त हो जाती है। रक्तरंजित वर्दी के सवालों का कोई जवाब सत्ता के सिंहासन पर आसीन राजनीति के पास नहीं होता है।

राजनीति और अपराध की लिव इन रिलेशनशिप शान से जारी रहती है। कानून भीष्म पितामह के समान बेबस होता है। कानून की बेचारगी गहरे तक सालती है।

-सुधीर कुमार चौधरी

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