वहां घुटनों के बल, यहां सिर चढ़ा है बादल!

ही अब जरूरी नहीं रह गया है, खेल के अलावा भी कुछ ऐसी बातें हैं, जो जीत के लिए जरूरी हैं। अभी इंग्लैंड-विंडीज के बीच खेले गए तीसरे टेस्ट की पहली पारी में इंग्लैंड ने पहले खेलते हुए 369 रन बनाए। दूसरे दिन इंग्लैंड आउट हो गई और विंडीज बल्लेबाजी के लिए आ गई। तीसरे दिन लंच के पहले विंडीज टीम 197 रन जोड़ कर आउट हो गई। इंग्लैंड ने फटाफट खेलना शुरू किया और खेल समाप्ति से सात ओवर पहले दो विकेट पर 226 रन बनाकर पारी खत्म कर दी और विंडीज को फिर खेलने बुला लिया। याद रखें, अभी दो दिन का पूरा खेल बाकी था। समझ नहीं आ रहा था कि इंग्लैंड के कप्तान जो. रूट ने दो विकेट पर 226 रन बना कर ही पारी क्यों खत्म कर दी? दूसरी पारी टी-20 के अंदाज में खेली थी इंग्लैंड ने। रूट ने 56 गेंद में 68 रन ठोक दिए थे। इस हिसाब से तो चौथे दिन ही मैच खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन मैच तो पांचवें दिन में जाकर खत्म हुआ।
अब गणित यह रहा कि इंग्लैंड को यह पता चल गया था कि तीसरे टेस्ट के चौथे दिन जबर्दस्त बारिश होने वाली है और संभव है उस दिन एक भी गेंद नहीं फेंकी जा सके। ठीक ऐसा ही हुआ, जैसा मौसम विभाग ने चेताया था। चौथे दिन का खेल पानी में बह गया। पांचवे दिन बारिश के दस फीसद आसार थे यानी कुछ भी हो जाए, मैच तो उस दिन खेला ही जाएगा। इंग्लैंड में बारिश की भरमार रहती है तो यहां स्टेडियम में पानी की निकासी का जबर्दस्त इंतजाम रहता है, वरना हमारे यहां अगर इतनी बारिश हो जाए तो दो दिन मैदान सूखने में ही लग जाते हैं। आखिरी दिन मैच शुरू हुआ और विंडीज टीम तीसरे टेस्ट के साथ सीरीज भी हार गई, जबकि पहला टेस्ट विंडीज ने जीत लिया था और दूसरे में इंग्लैंड की जीत हुई थी। यह निर्णायक मैच था। करीब चालीस साल से इंग्लैंड अपने घर में विंडीज से सीरीज नहीं हारा है, यह रिकार्ड इस बार भी कायम रहा। अगर चौथे रोज बारिश नहीं होती तो इस तीसरे टेस्ट मैच की पटकथा कुछ और ही होती।

पिछले साल मास्को में जब होटल से निकल रहा था तो रिसेप्शन पर खड़ी महिला ने पूछा ‘छाता या बरसाती नहीं है तुम्हारे पास?’ मेरा सवालिया चेहरा देख, उसने बताया था ‘अभी दस मिनट में बारिश शुरू होने वाली है। आधे घंटे रुक जाओ, फिर दिन भर धूप ही रहेगी।’ बिलकुल वैसा ही हुआ। बाद में तो मेरा मौसम विभाग उस होटल की रिसेप्सनिस्ट ही हो गई थी कि रात को ही पूछताछ कर लेता था कि कब होटल से बाहर निकलना है और कब लौटने का तय करना है। मुझे कभी छतरी या बरसाती की जरूरत नहीं पड़ी और कभी भीगा भी नहीं। छतरी या बरसाती वे लोग ही रखते हैं, जो कामकाजी होते हैं, तय समय पर तय जगह पर पहुंचने वाले। अपने साथ ऐसी कोई बंदिश नहीं थी तो यूं ही मौसम की खबर से काम चल गया।

हमारे यहां बारिश का मौसम शुरू होने से पहले अटकल पंजे बारह शुरू हो जाता है। एक दिन खबर आती है कि इस बार बारिश खूब होने वाली है। फिर कहीं से दूसरी खबर यह आती है कि मानसून इस बार कमजोर है। अब देश इतना बड़ा है (रूस से तो बड़ा नहीं ही है) तो कभी पूरब में ज्यादा-कम बारिश के आसार आते हैं तो कभी पश्‍चिम में। उत्तर में बाढ़ का अंदेशा होता है तो साउथ में सूखे का डर। मानसून की शुरुआत केरल से होती है। इस बार कहा गया एक हफ्ता जल्दी आएगा मानसून, फिर खबर आई एडवांस चल रहा है और आया अपने समय से दो दिन बाद। फिर वही कि कितना बरसेगा! जून में इतना बरसा कि कहा गया जुलाई में कोटा पूरा हो जाएगा। जुलाई सूखा निकल गया। मालवा में बारिश की खबर हर बार गलत ही निकली। बादल आए, छाए और बिना बरसे ही निकल गए। ऐसा पूरे महीने भर होता रहा। झमाझम बारिश की खबर बारिश में गल गई।

क्या विदेशों के बादल उतने आवारा नहीं होते हैं, जितने हमारे यहां के कहे जाते रहे हैं? क्या वहां के बादल किसी और मिट्टी के बने होते हैं कि उन्हें पढ़ना आसान होता है और हमारे यहां के इतने मुश्किल कि समझ से बाहर हैं? क्या वहां बादल बिलकुल सरकारी नौकर की तरह हैं और हमारे यहां छुट्टे मजदूर? वहां के बादल गरजते भी हैं और बरसते भी हैं, जबकि हमारे यहां यह शक ही बना रहता है कि गरज रहे हैं तो क्या मालूम बरसेंगे या सूखे ही गुजर जाएंगे। हमारे मौसम विभाग की मशीन में गड़बड़ है या बादलों की हठधर्मी है कि इन मशीनों को तो हाथ भी नहीं धरने देना है। क्या विदेशों के बादल घुटनों के बल हैं और मशीनों के गुलाम हैं कि ‘जो हुक्म मेरे आका’ कहकर बरसने या तरसाने लगेंगे? क्या हमारे यहां के बादल इतने नकचढ़े हैं कि मौसम विभाग की भद पिटवाने में ही उन्हें मजा आता है? यहां-वहां के बादलों का चरित्र अलग है या मशीनों की तकनीक का फर्क है? शायद इसीलिए आज भी भारत का किसान घाघ और भड्डरी दंपती के फार्मूलों पर ज्यादा भरोसा करता है, वेदर-रिपोर्ट पर कम। उसे तो ‘तीतर जैसी बादरी, रही शनिचर छाय’ या ‘चींटी ले अंडा  चढ़े तो नदियां भरपूर’ जैसे आजमाए दोहों पर ही ज्यादा यकीन है। आश्‍चर्य होता है कि जब दुनिया के कई देश अपनी सुविधा से बारिश को काबू में करने की कोशिश में हैं, हम आज भी एक दिन का पक्का मौसम नहीं बता पा रहे हैं। क्या हर दिन हमारा मौसम महकमा अपनी ही बात इसलिए तो नहीं बदलता रहता है कि कभी तो कोई तुक्का ऐसा होगा, जो तीर की तरह निशाने पर लग जाएगा।

दावे के साथ तो कोई भी देश नहीं कह सकता, पांच-दस फीसद की गलती कहीं भी हो सकती है, लेकिन हमारे यहां सही का फीसद भी इतना नहीं है। इस मजाक पर अब कोई नहीं हंसता कि आज मौसम विभाग ने बारिश का कहा है तो घर से छतरी ले जाने की कोई जरूरत नहीं है या फिर हम यह मान लें कि बादल, बारिश और बिजली हमारे लिए साइंस का नहीं, कल्पना और रोमांस का विषय है, आसमानी-सुल्तानी बात है। ऐसे में तो उस शायर की ही बात ठीक लगती है- ‘बरसात का बादल तो दीवाना है, क्या जाने, किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।’

प्रकाश पुरोहित
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

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