वैश्य समाज का कोई प्रतिनिधित्व नहीं

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शिवराज सिंह मंत्रिमंडल विस्तार में जो विधायक और गैर-विधायक इस विस्तार में शरीक किए गए, उसे देखकर लगता है कि मंत्रिमंडल शिवराज का जरुर बना, पर विस्तार ज्योतिरादित्य सिंधिया का हुआ। इस वजह से कई जगह संतुलन गड़बड़ा गया। जिस राजनीतिक चातुर्य और बुद्धिमत्ता की पार्टी से उम्मीद की जा रही थी, वह कहीं नजर नहीं आई! भाजपा को बनियों और महाजनों की पार्टी कहा जाता है, पर विस्तार में वैश्य समाज का कोई प्रतिनिधि नहीं है। संतुलन की सारी कोशिशें ठाकुर, दलित और आदिवासी में उलझकर रह गई! सिंधिया को साधने की कोशिश में क्षेत्रीय संतुलन भी नहीं रहा! ये सबकुछ आगे शिवराजसिंह की मुश्किलें बढ़ा सकता है।    

जब से मंत्रिमंडल के विस्तार की कवायद चली, तभी से कुछ नामों को लेकर जमकर चर्चा रही! गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह, रामपाल सिंह, राजेंद्र शुक्ला, विजय शाह और यशोधरा राजे सिंधिया ऐसे नाम थे, जिन्हें शामिल नहीं किए जाने की हवा गरम थी! पर दो नामों को छोड़कर सभी ने शपथ ली। गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह के नाम पर ज्यादा पेंच था। लेकिन, दोनों को जगह मिली। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के सहयोग से भारतसिंह कुशवाह और ब्रजेंद्र सिंह मंत्रिमंडल में शामिल किए गए, पर वे चेतन कश्यप को शामिल नहीं करा सके, जिनकी पूरी उम्मीद थी। यशोधरा राजे को भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के दबाव में मंत्री बनाया गया है। जबकि, उनके नाम को लेकर शुरू से ही संशय था।

क्षैत्रीय संतुलन के नजरिए से देखें  तो कुछ जिलों और क्षेत्रों की पूरी तरह उपेक्षा की गई। इंदौर से उषा ठाकुर को मंत्री बनाया गया जो महू से विधायक हैं! इससे पहले तुलसी सिलावट को शामिल किया गया था, जो सांवेर से हैं। ऐसे में इंदौर शहर से फिर कोई भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं है। जबकि, रमेश मेंदोला को मंत्रिमंडल में लिया जाना तय माना जा रहा था। मुख्यमंत्री मालिनी गौड़ को लेना चाहते थे, पर उषा ठाकुर और मालिनी गौड़ दोनों में किसी एक ठाकुर को ही लेना था, इसलिए उषा ठाकुर को मौका दिया गया। भोपाल से फिर विश्वास सारंग को जगह मिली, जबकि विष्णु खत्री का नाम सबसे आगे था। बताते हैं कि उनके पिता कैलाश सारंग ने फिर अस्पताल कार्ड खेलकर बेटे को मंत्री बनवा दिया। ये अस्पताल कार्ड क्या है, ये भाजपा के लोग अच्छी तरह जानते हैं। धार के बदनावर से सिंधिया समर्थक राजवर्धनसिंह दत्तीगाँव को मंत्री बनाया गया, तो नीना वर्मा को छोड़ दिया गया। जबकि, विक्रम वर्मा की वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें मौका दिए जाने के आसार थे। रायसेन जिले से रामपाल सिंह या सुरेंद्र पटवा को मंत्री नहीं बनाए जाने से भी जिले में मायूसी है। पर, दोनों का दामन दागदार होना, इसका सबसे बड़ा कारण है। यहाँ से सिंधिया समर्थक और कांग्रेस के बागी प्रभुराम चौधरी को जगह दी गई।  

मालवा क्षेत्र में असंतुलन का सबसे बड़ा प्रमाण मंदसौर-नीमच क्षेत्र रहा! यहाँ से तीन लोगों को मंत्री बनाया गया। जगदीश देवड़ा और ओमप्रकाश सकलेचा भाजपा के विधायक हैं और हरदीपसिंह डंग उन बाग़ियों में हैं, जिन्होंने कांग्रेस से विद्रोह किया था। इस कोशिश में झाबुआ और रतलाम पूरी तरह छूट गया। बड़वानी से प्रेमसिंह पटेल जरूर पहली बार मंत्री बने, जबकि उनकी बदकिस्मती रहती थी कि जब भी चुनाव जीते सरकार नहीं बनी! राजनीतिक कयास लगाए जा रहे थे कि शिवराज सरकार के मददगार बने चार निर्दलियों और बसपा, सपा के तीन विधायकों में से किसी को शामिल किया जा सकता है! पर, इनके साथ पहले कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने धोखा किया, अब भाजपा ने भी इन्हें किनारे कर दिया। देखना है कि इन्हें निगम, मंडलों में कहीं जगह दी जाती है या नहीं! वैसे एक संभावना यह कि इनमें से किसी को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाया जाए!    

इस पूरे मंत्रिमंडल विस्तार की कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है विंध्य क्षेत्र की उपेक्षा। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की झोली भरने का सबसे बड़ा काम इसी इलाके ने किया था! भाजपा यदि सत्ता पाने के मुहाने तक पहुंची, तो उसके पीछे विंध्य की बड़ी भूमिका रही! पर, जब रेवड़ी बाँटने का मौका आया तो विंध्य को किनारे कर दिया गया। लगता है कि पार्टी ने राजेंद्र शुक्ला को ही पूरा विंध्य समझ लिया है। यहाँ से रामकिशोर कांवरे और बिसाहूलाल सिंह को जगह दी गई! जबकि, किसी ब्राह्मण को मौका नहीं मिला। विंध्य क्षेत्र में लगातार दो विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा। विंध्य में भाजपा ने पिछले चुनाव में 24 सीटें जीती, पर प्रतिनिधित्व उस हिसाब से नहीं दिया। इस इलाके में ब्राह्मण राजनीति के अपने अलग ही समीकरण हैं, जिनकी उपेक्षा की गई! इससे ब्राह्मणों की नाराजी सामने आ सकती है, जो पार्टी भारी पड़ेगी।

विंध्य की ही तरह महाकौशल क्षेत्र की अनदेखी की गई। यहाँ से सिर्फ रामखिलावन पटेल को मंत्रिमंडल में जगह दी गई! संजय पाठक को लेकर पहले से ही समझा जा रहा था कि उन्हें नहीं लिया जाएगा, वही हुआ भी! लेकिन, अजय विश्नोई को भी भुला दिया गया। महाकौशल की कई सीटों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व है और हार-जीत में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है, पर महाकौशल से ब्राह्मण चेहरा ही नदारद है। ग्वालियर-चंबल इलाके के भिंड जिले से दूसरी बार विधायक बने सिंधिया के समर्थक रणवीरसिंह जाटव को विस्तार में शामिल किए जाने की चर्चा थी! लेकिन, अंतिम समय में रणवीरसिंह जाटव की जगह मेहगाँव से पहली बार चुनाव जीते और अब पूर्व विधायक हो गए ओपीएस भदौरिया को शपथ दिलाई गई! इस नजरिए से कहा जाए तो मंत्रिमंडल के विस्तार में मुख्यमंत्री की उतनी नहीं चली, जितनी उम्मीद की गई थी।

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