शिक्षकों का स्थान माइक्रो साधन ले सकेंगे कभी ?

हम उस सदी के उपासक हैं जहाँ छोटे से नर्सरी स्कूल में अबोध बच्चे तक के दाखिले का समूचा दारोमदार उसकी नर्सरी राइम्स के स्वर एवं निहायती सलीके भरे थैंक यू मैम!, से लेकर गुड ऑफ्टर नून कहने की काबिलियत पर टिका हैं । इस समय में देश के प्राइमरी स्कूल में प्रवेश पाने के फिलहाल यही मापदंड रह गये वहीं अपने से तिहाई वजनी छोटे भाई को गोद में उठाकर चुप कराने या गीली लकड़ियों वाले चूल्हे को फूँक मारकर सुलगाने की योग्यता कर दी जाए तो उच्च मध्यम वर्ग को इन विद्यालयों में शायद दाखिला न मिले बल्कि हाय तौबा मच जाए!

यह उदाहरण तकनीकी जगत के जाने माने विशेषज्ञ जितेंद्र भाटिया जी के एक लेख में उन्होंने शिक्षा के तकनीकी करण होने के संदर्भ में लिखा था जिसके आशय स्पष्ट थे समानता के सारे संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद हमारे व्यावहारिक मापदंड ऐसे बन चुके हैं कि निचले आर्थिक/सामाजिक स्तर का कोई पंछी इन शिक्षा संस्थाओं में पर नहीं मार सकता । विद्यालय जहाँ एक संस्था का रूप लेकर इक्क्सवीं सदी के शिक्षाविद  विचारकों  की चिंता  का केंद्र बन गया वहीं छल का रूप लेकर यही विद्यालय आर्थिक अवसरों का दफ्तर बनते जा रहे हैं । सिद्धांतों का व्यापार करती  अर्थ तंत्र  के इर्द -गिर्द घूमने वाली शिक्षण संस्थाएं विराट मानव बोध के बजाय एक ऐसा नया व्याकरण रच रहा जिसमें समय केवल घड़ी के कांटें पर आकर टिक गया उसमें जो गुजरा हम नहीं जानना चाहते । आजाद भारत की शिक्षा तकनीकी रूप में जरूर बदल गई बल्कि तरक्की कर गई  किन्तु अपनी सोच और विचार में नहीं ।
 जो भविष्य नई चुनौतियां लेकर खड़ा हैं उसे वर्तमान के कई सदमों से टकराना हैं । जिस विराट सोच और दृष्टी सम्पन्नता की परिकल्पना हम भविष्य में शिक्षा से करते हैं उस शिक्षा का भविष्य ही हम ठीक तरह नहीं जान पा रहे क्या शिक्षकों का स्थान माइक्रो साधन ले सकेंगे कभी । क्या अशांति भरे समय में शांति का विज्ञान सीखा पायेगी तकनीक से अर्जित शिक्षा । अतीत का जाप करते -करते हम बाजारू सस्ते नोट्स के व्यापार पर केंद्रित हो गए और उसे ही शिक्षा मानने लगे ।  अपने स्वदेशी स्वाभिमान को गिरवी रखकर अंतर्राष्ट्रीय  संस्थानों में पदों की दौड़ में खुद को देखने के  लालसा हमारी अपनी शिक्षा  का स्वभाव बदल रहा जो भारतीय मानस के अनुरूप तो नहीं । गरीबों की शिक्षा अक्षर ज्ञान से शुरू होती हैं पर उदाहरण अमीरों के रचे जाते ।विश्‍वविद्यालय, महाविद्यालय और विद्यालय क्या कर रहे, क्या धूल भरी पगडंडियों तक उनकी दृष्टी पहुँच उतनी सम्पन्न हैं ।

वेब सेमिनारों का सुंदर कलेवर नए परिवेश में आया जरूर लेकिन वो कितना कारगर हैं प्रायोगिक रूप में या सिर्फ रिपोर्ट उद्योग की खाना पूर्ति मात्र हैं यह भी शोध का विषय हैं । क्या भविष्य में मनुष्य शिक्षक पूरी तरह से निरस्त कर दिया जायेगा ? जिस तकनीक को मनुष्य ने बनाया वह मनुष्य का स्थान ले लेगी।  शिक्षण संस्थान पतन की बलि चढ़ जायेंगे । भारत  में भी 22 मार्च से लॉकडाउन कर दिया गया उसके बाद से जैसे जिंदगी थम-सी गई कोरोना ने न सिर्फ हमारी दिनचर्या बदली बल्कि पूरा का पूरा जीवन भी। निजी विद्यालय में मार्च में परीक्षाएं हो जाती है और अप्रैल में फिर ने नयी कक्षाएं शुरू हो जाती है.लेकिन विद्यालय -महाविद्यालयों की पढ़ाई की जगह ऑनलाइन क्लासेस ने ले ली और यह विकल्प शिक्षा का हिस्सा बन गया पर इस त्वरित सुविधा से स्पष्ट हैं हम गतिशील जीवन जीने के आदि जो हो चुके हैं पर इस गतिशीलता में हम यह भूल गए की वर्गभेद की खाई बढाती ऑनलाइन शिक्षा किसी भी रूप में सिर्फ और सिर्फ उच्च और मध्यम वर्ग के अनुरूप ही हैं जबकि हमारे यहाँ बच्चे कक्षाओं में विधिवत शिक्षकों की मौजूदगी में अध्ययनरत रहकर भी कई बार विषय वस्तु को समझने में चूक जाते हैं वहां एक डिजिटल माध्यम उनका शिक्षा में  भविष्य निर्धारित कर सकेगी । विशेषकर जिन परिवारों के बच्चे पढ़ते महंगे स्कूल में लेकिन उन परिवारों  में कोई इतना पढ़ा-लिखा नहीं होता। यह भी विचारणीय हैं । क्या कक्षा,व्हाइट बोर्ड,खेल का मैदान, पुस्तकालय से लेकर प्रार्थना कक्ष का स्थान डिजिटल कक्षा ले पायेगी आखिर इस तरह की शिक्षा का भविष्य कैसा होगा ? इन सबमें जो सबसे बड़ी चुनौती उन मध्यम परिवारों की हैं जो ऑनलाइन क्लासेस के लिए एंड्रयाईड फोन/कम्प्यूटर/ टेबलेट, ब्राडबैंड कनेक्शन,प आदि की सुविधा आर्थिक तंगी से जूझते समय में इसे जुटाने के विषय में सोच भी नहीं सकते । समय के साथ आगे बढ़ना जरुरी हैं लेकिन सबको साथ लेकर अपनी तासीर को समझते हुए । जहाँ आय स्त्रोत सिकुड़ रहे वहीँ शिक्षा अर्जन सिर्फ एक चुनौती बनकर रह गई । आनन-फानन में डिजिटल कक्षाएँ शुरू कर  देना कितना सही स्थानीय प्रशासन और सरकारी तंत्र इस ओर ध्यान दे, अन्यथा डिजिटल शिक्षा कहीं एक बड़े वर्ग का शिक्षा से वंचित रह जाने का कारण न बन जाय । निश्‍चित ही हम एक ऐसे युग में हैं जहाँ हम स्वयं दुविधा में हैं किस बात पर गर्व करें किस पर शर्मिंदा हो। अतीत से अपने वर्तमान की तुलना उपलब्धि हमें आश्‍वस्ति देती हैं पर उस अतीत  से जन्मी संवेदनाएं प्रेरणा लेने का स्वभाव हमारे भीतर मरता जा रहा यह वर्तमान की शिक्षा नहीं सीखा पा रहीं दुनिया को सर्वाधिक संत,उपदेशक महात्मा विचारक और सृजक देने वाले भारत में भविष्य की शिक्षा पर विचार की नहीं चिंतन वर्तमान का सबसे बड़ा चिंतन परक शोध हैं कोरोना कालखंड ने हमें इसका एक आइना जरूर दिखाया शिक्षा  में बाजार और हथियार से ऊपर की सोच ही शिक्षा में भविष्य की सही खोज हो सकेगी  ।

-डॉ.शोभा जैन

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