सत्यवती : राज्य के लिए कठोर निर्णय लेने वाली रानी

मुझे क्षमा करो, पुत्र और सिंहासन पर बैठकर इस अनाथ राज्य को सनाथ करो! पुत्र विचित्रवीर्य की मृत्यु के उपरान्त दुखी और निराश सत्यवती ने भीष्म से अनुरोध किया। काल का चक्र अद्भुत गति से घूमा था और उसने घूमकर सत्यवती को वहां पहुंचा दिया था, जहाँ पर कोई भी स्त्री नहीं पहुंचना चाहती होगी। सत्यवती, हस्तिनापुर नरेश की विधवा रानी सत्यवती, जो आज सबसे समृद्ध होकर भी सबसे निर्धन हो गयी थी। निषाद कन्या सत्यवती,  जिनके सम्मुख एक पुत्र था, जो उनके पति की प्रथम पत्नी से उत्पन्न था तो वहीं सत्यवती की आत्मा में आज हाहाकार मचा हुआ था, क्योंकि एक पुत्र तो वह विस्मृत कर चुकी थीं। क्या वह पुत्र विस्मृत कर चुकी थीं? या आज अचानक से याद आ गया क्योंकि आज आवश्यकता थी? दोनों ही पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य के निस्संतान गुजर जाने के बाद वह जैसे शून्य में ही सिमट गईं थीं। एक अंधकार भरी राह उनके सम्मुख थी और अब इस पर चलकर ही अपने साम्राज्य की रक्षा करनी थी। ऐसे में ऋषि पाराशर के वह नेत्र सत्यवती से जैसे प्रश्‍न पूछ रहे थे हे मत्स्य कन्या? क्या महलों की रानी बनकर प्रसन्न हो? हम एक कुटिया में ही प्रसन्न रह सकते हैं? अब तो एक पुत्र भी है! नन्हे कृष्ण द्वैपायन की ओर देखते हुए पाराशर ऋषि ने कहा था, या फिर अपने वचनानुसार तुम जाने के लिए भी स्वतंत्र हो।

सत्यवती के सम्मुख उस समय भी निर्णय लेने की घड़ी थी, उन्हें निर्णय लेना था कि वह ऋषि पाराशर के साथ रहकर अपने पुत्र और पति के संग का आनन्द लें या फिर वह अपने पिता के उस विश्‍वास पर खरी उतरें, जिस विश्‍वास के साथ उनके पिता उन्हें नौका चलाने के लिए भेज देते थे! वह सोच रही थीं कि एक वह घड़ी थी जब वह अपने पुत्र को छोड़कर चली आईं थीं और आज वह घड़ी है जब एक भी पुत्र उनके पास नहीं है।

-सोनाली मिश्रा

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