समस्या का समाधान

जीवन एक पैकेज है जिसमें अच्छा-बुरा, लाभ-हानि आदि जैसे समस्त अवयव सम्मिलित हैं तो उसके समाधान भी। पर आवश्यकता है बगैर हड़बड़ी या धैर्य खोये शांतिपूर्वक विचार कर हल का मार्ग खोजने की। इस मामले में मेरे दिल्ली निवासी मित्र संदीप त्रेहन ने एक सुंदर प्रसंग साझा किया है।

एक राजा ने सुंदर महल का निर्माण कर द्वार पर एक गणितीय सूत्र लिखवा दिया जिसका हल खोजना अगला उत्तराधिकारी घोषित किये जाने की प्रक्रिया थी। यह सुनकर अनेक विद्वान पधारे तथा कुछ न समझ आ पाने के कारण वापिस लौट गये। राजा भी निराश हो गये, किन्तु तभी अंतिम दिवस तीन आगंतुकों का प्रवेश हुआ जिनमें तीसरा एक साधक था, जो साधनहीन होने के साथ ही अपने साथ कुछ भी नहीं लाया था।

पहले दोनों जो अनेक पुस्तकों सहित आए थे हल निकालने में व्यस्त हो गए तथा सफल न हो पाने के कारण अंतत: जब हार स्वीकार कर बाहर हो गये तब साधक ने अपनी आंखें खोलीं और सहज मुस्कान के साथ द्वार के समीप आकर उसे धकेला तो द्वार बड़ी सरलता के साथ खुल गया।

राजा ने साधक से पूछा – तुमने ऐसा क्या किया।
साधक ने कहा – जब मैं ध्यान में बैठा तो अन्तर्मन से सबसे पहले यह ध्वनि आई पहले यह तो जांच ले कि कोई सूत्र है भी या नहीं। और इसके बाद ही हल खोजना। और मैंने वही किया।

बात का सार बहुत संक्षिप्त है। कई बार कोई समस्या होती ही नहीं और यदि होती भी है तो बहुत सतही पर हमारे विचार उसे बड़ा बना देते हैं। मन को स्थिर और शांतचित्त रखेंगे तो पाएंगे कि कालांतर  में वही बहुत छोटी या लगभग शून्य लगने लगेगी। समस्या परखने का हमारा दृष्टिकोण ही उसे स्वरूप प्रदान करता है। इसीलिए तो कहा गया है : मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। 

– विजय जोशी

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY