सर्वहारा के लेखक थे उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद  ( 31 जुलाई1880-8 अक्टूबर 1936) की जयंती 31 जुलाई को मनाई गई।  मुंशी प्रेमचंद नाम आते ही हमारे मनोमस्तिष्क में एक निहायत ही शरीफ, नेकदिल और सीधेसादे लेकिन ओजस्वी इंसान की छवि उभर आती है। मुंशी प्रेमचंद हकीकत में थे भी ऐसे ही। उनकी यही सहजता, सरलता और सादगी उनके लेखन में भी झलकती है। अपनी इसी विशेषता के चलते वे महज 56 वर्ष की अल्पआयु में ही इतना सारा लेखन कर गए जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते। उनका जन्म वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्हें नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू और फारसी भाषा में हुई। पढ़ने का शौक उन्हें बचपन से ही लग गया। 13 साल की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ ‘शरसार’, मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया ।

प्रेमचंद का हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं पर एक जैसा अधिकार था। अपना शुरुआती लेखन उन्होंने उर्दू भाषा मे किया, लेकिन बाद में उन्होंने हिन्दी भाषा को ही ज्यादा तरजीह दी। उर्दू भाषा में उन्हें महारथ हासिल होने के वजह से उनकी हिन्दी मे लिखी कहानियों में भी उर्दू का इतना बढिया समावेश हुआ करता था कि पढने वाला उनकी सराहना करे बगैर नही रह पाता।

दरअसल अधिकांश पाठकों के साथ ऐसा होता है कि बचपन में उनकी लिखी कहानियां कोर्स में होने की वजह से सरसरी तौर पर केवल परीक्षा में पास होने इतने अंक आ जाए इसी उद्देश्य से पढ़ी जाती है। यही मेरे साथ भी यही हुआ। लेकिन कालांतर में जब साहित्य पढ़ने में रुचि जागृत हुई तब एक दिन बड़े ही अनमने ढंग से प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ पढ़ने में आ गई, कहानी पढ़ते ही दिमाग जैसे सुन्न हो गया फिर तो उसके बाद लगातार पंच परमेश्‍वर’, ‘गुल्ली डंडा’, ’दो बैलों की कथा’, ’ईदगाह’, ’बड़े भाई साहब’,  कफन , ठाकुर का कुआँ, ’सद्गति’, ’बूढ़ी काकी’, ’तावान’, ’विध्वंस’, ’दूध का दाम’, ’मंत्र’ आदि आदि कहानियों को एक ही बैठक में पढ़ डाला। बाद में उनके कई उपन्यास भी बडे चाव से पढे।

उनकी कहानियों की एक विशेषता है कि वे पाठकों को सोचने के लिए विवश कर देती है। उनकी अधिकांश कहानियों का अंत ऐसे ट्विस्ट के साथ होता है कि पाठक उसकी कल्पना ही नही कर पाता। और उनकी इसी विशेषता के चलते वे सदी के महानतम लेखक कहलाये। अपने लेखन के शुरुआती समय मे ही देशभक्ति के भावना से ओतप्रोत अपने पहले ही कहानी संग्रह ’सोजे-वतन’ यानी देश का दर्द की लोकप्रियता के असर ने अंग्रेजी हुकूमत पर ऐसा असर डाला कि उन्होंने इस पर रोक लगाने और लेखक को भविष्य में इस प्रकार का लेखन न करने का आदेश दे दिया। इसी वजह से ही बाद में उन्हें नाम बदल कर लिखना पडा।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद को साहित्य की हर विधा में महारथ हासिल थी। वे जिस विधा में अपनी कलम चलाते उसे एक अलौकिक स्वरूप प्रदान कर देते थे। वे सर्वहारा के लेखक थे। उनकी कहानियों के अधिकांश नायक दबे-कुचले दलित, किसान या फिर समाज से तिरस्कृत किए गए आम आदमी हुआ करते थे, जिन्हें वे अपनी कलम की जादूगरी से नायकत्व प्रदान कर दिया करते थे। अपने साहित्यिक जीवन मे उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है। प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। गोदान उनकी कालजयी रचना है। कफन उनकी अंतिम कहानी मानी जाती है।

उनके लिए आचार्य द्विवेदी का व्यक्तव्य था कि ’प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित अपमानित और सर्वहारा की आवाज थे।’ प्रेमचंद के लेखन की यही आत्मा या ताकत थी जिसकी वजह से शरतचंद्र चटोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया।  प्रेमचंद ने अपने लेखन की उर्दू विरासत को हिन्दी में इस प्रकार समाहित किया कि वे हिन्दी के महानतम लेखक कहलाए। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की ऐसी अनमोल विरासत है जो आगामी कई सदियों तक सबका मार्गदर्शन करती रहेगी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुंशी प्रेमचंद अपने तैंतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में साहित्य की ऐसी अनमोल विरासत सौंप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमीत।

लोकेंद्र नामजोशी

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