सहमा हुआ कला संसार: ठहरकर देखने-समझने का वक़्त

कलाकार बिरादरी के एक बड़े वर्ग में अंदरूनी स्तर पर इतनी खलबली पहले कभी नहीं देखी गई। वह भी तब, जब इक्कीसवीं सदी की पहली चौथाई में प्रायः यह सभी जानते हैं कि भले ही तमाम सामाजिक सरंचनाओं में उलटफेर हो जाए या समूची मानव जाति खतरे के कगार पर हो, तब भी कला इन सारी दुनिश्‍चित्ताओं और जीवन-मृत्यु के उहा-पोह के बीच से अधिक परिपक्व हो पुनर्नवा होती रहेगी। फिर यह खलबली, चिंता या घबराहट भरा भय कला तबके के एक हिस्से में आखिर किसलिए है? क्या यह आम भारतीय मनोविज्ञान है, जो आसन्न संकट के खतरे को अपने-अपने तईं तात्कालिकता में देखने-अनुभव करने का आदी है।

मूल बात तो यह है कि यह संकट कला के साथ नहीं है। यह केवल कलाकारों के साथ है। किसी भी कला ने मौजूदा परिवेश तक पहुँचते हुए कई सारी पीढ़ियों की यात्रा की है। जाहिर है कि समय-समय पर इसमें रुकावट, व्यवधान और आमूल-चूल परिवर्तन भी आए हैं। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह ने तो श्रीकृष्ण की रासलीला से शुरू हुई, और बाद में कथक नृत्य शैली में विकसित हुई इस परम्परा को न केवल नर्तक की वेशभूषा से परिवर्तित किया, बल्कि उसमें ऐसा बहुत कुछ जोड़ दिया जो बाद में ’घराने’ के रूप में ढलकर आज तक प्रतिष्ठित है। लखनऊ घराना लास्य अंग से जाना जाता है। कौन जानता था कि कश्मीर का एक लोकवाद्य किस तरह भारतीय शास्त्रीय वाद्य की परंपरा में संतूर के रूप में पंडित शिवकुमार शर्मा ले आएंगे। राजस्थान के पंडित रामनारायण सारंगी को संगत की कतार से अलग कर परिपूर्ण एकल वादन में ढाल देंगे।

विश्‍व में जितने भी बड़े कला आंदोलन हुए हैं, क्या उनके खड़ा होने और लगातार बढ़ते प्रभाव के पीछे उस समय की देश-काल की परिस्थितियों ने केंद्रीय भूमिका नहीं निभाई थीं? क्या विज्ञान और तकनीकी विकास के कारण भिन्न कलाओं ने अपनी जड़ों के साथ रहते हुए भी अपने परिधान और आकल्पन नहीं बदले हैं? तब क्या आज के कलाकार आपदा के इस समय को भविष्य में खड़े होकर किसी इतिहास की दृष्टि से नहीं देख पा रहे हैं? क्या वे इस आपदा की अनिश्‍चितता में अपने सारे कला-व्यवहारों को जस का तस बनाए रखना चाहते हैं? क्या उन्हें थोड़ा भी अंदेशा नहीं है कि यह दुरूह समय उनकी भिन्न-भिन्न कलाओं की रीति-प्रक्रिया, रंग-रूप, विषय-वस्तु, प्रस्तुति-आकल्पन या अनुभव को ही बदल सकता है। यह कहीं-कहीं बदलना शुरू भी हो गया है। आखिर हम साहित्य में किन बदलाव के धुंधले संकेत देख पा रहे हैं। अभी तो अस्सी के दशक की कविता की चेयर-रेस इन दिनों खेली जा रही है।

भविष्य की कविता पर कोई कुछ तीर चलाने के लिए तैयार ही नहीं है। यानी साहित्य काल्पनिक युध्द के साथ इन दिनों वास्तविक परस्पर युध्द में अधिक उलझा हुआ है। संगीत-नृत्य और रंगकर्म जैसी प्रदर्शनकारी कलाएं इस अनिश्‍चित दौर में डिजिटल माध्यम में अपना विकल्प तलाश रही हैं। होना तो यह चाहिए कि रंगकर्म में सेट और प्रॉप से बचते हुए बिना तामझाम के कम पात्रीय प्रस्तुतियों या मोनोलॉग (एक पात्रीय) पर जोर दिया जाता और अपने-अपने घर में इन्हें तैयार किया जाता। लेकिन निदेशक की भूमिका इसमें अपेक्षाकृत कम हो जाती और उन्हें अपना थोड़ा व्यापक प्रभामण्डल कायम रखने में अवरोध दिखता। पर यह समयानुकूल होता और बेहद कम दर्शक सँख्या में किसी भी अहाते, छत या ऐसी ही कोई अन्य जगह सुरक्षा एहतियातों को ध्यान में रख इसके प्रदर्शन किए जा सकते। वर्षो से स्थापित कई बड़े थिएटर ग्रुप कुछ शहरों में आडिटोरियम पर होने वाले खर्च पर दुख जताते रहे हैं। यह भी कि टिकिट बिक्री से उनका रिहर्सल का खर्च भी नहीं निकलता। यह सच भी है। प्रस्तुति की जगह और तरीके अब बदलना होंगे। तब क्या रंगकर्म-प्रदर्शन की अवधारणा में परिवर्तन करने के विचार-मंथन के लिए इस आपदा ने पर्याप्त समय नहीं दिया है? क्या बादल सरकार की रंग-दृष्टि को जमीन पर विस्तारित करने और व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता नहीं है?    यह भी सच है कि नृत्य-संगीत, रंगकर्म और चित्रकला से जुड़े हजारों-हजार कलाकारों की जीविकोपार्जन की मूलभूत समस्या भी इसी समय की अप्रत्याशित उपज है। लेकिन यह डरावना परिदृश्य कमोबेश हर क्षेत्र में बढ़ा है। अन्य जगह स्थिति अधिक त्रासद है। फिर रोजगार के क्षेत्र में जिस तरह असंगठित सेक्टर की बात होती है, वहीं कला में नहीं। सही मायने में कलाकार भी असंगठित क्षेत्र में ही अपनी-अपनी प्रतिभाओं के साथ काम करते हैं। इन्हें या इनके ग्रुप को मिलने वाला सरकारी अनुदान मनरेगा से अधिक भूमिका नहीं निभाता है। वह भी सबके लिए अनुपलब्ध है। इसके लिए जो करना पड़ता है, उसकी चर्चा यहाँ करना व्यर्थ है। कला को बचाने की जो सीमित गहमागहमी कलाकारों में है, वह साधारण अर्थ में खुद को बचाने की है। स्थापित कलाकारों को इस आपदा से कोई दुष्प्रभाव भले ही न हुआ हो, लेकिन नए, ऊर्जावान और सम्भावना से भरे युवाओं के सामने धुंधलका बुरी तरह छाया हुआ है। उन्हें खुद ही इसे दूर करना होगा। अंततः अपने को बचाते हुए ही वे अपनी कला को भी बचा पाएंगे।

क्या कला-बाजार में चित्रों की कीमतों में गिरावट आएगी और कला में विनियोग करने वाले धनाढ्य वर्ग को अब अधिक जोखिम के साथ यह सट्टा खेलना होगा। भारतीय परिवेश में ऐसे कई सवाल हैं, जिनका उत्तर आज नहीं है। यह दीगर बात है कि पिछले दिनों विश्‍व की सबसे बड़ी नीलामी संस्था ’सोथबी’ ने ऑनलाइन नीलामी में निर्धारित अनुमान की अपेक्षा कई गुना अधिक में चित्रों को बेचा और बिक्री के नए कीर्तिमान बनाए। इसमें जीन मिशेल का वर्ष 1982 में बनाया अनटाइटल्ड हेड (कागज पर एक्रिलिक, स्याही) 9 मिलियन डॉलर के अनुमान से अधिक लगभग 15 मिलियन डॉलर में बिका। लेकिन यह कलाकारों की दुनिया से अधिक बड़े व्यापारियों और विनियोगकर्ताओं का शतरंजी-संसार है। ऑनलाइन स्ट्रीम के साथ ही ’सोथबी’ ने अपने न्यूयॉर्क, हांगकांग और लंदन के कार्यालयों में फोन पर भी बोलियां लेने की सुविधा रखी थी। भारत में भी कला की ऑनलाइन बिक्री के कई प्लेटफॉर्म हैं। लेकिन अभी इसे आम प्रचलन में आने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा। गैलरी में चित्रकार अपनी प्रदर्शनी कब लगा पाएगा, यह कोई भी निश्‍चित दावे से आज नहीं कह सकता। इस वर्ष जिन्होंने गैलरी बुक कर रखी थी, उनमें निराशा होना स्वभाविक है। शो के लिए तैयार काम उनके स्टूडियो या घर में जगह घेरे हुए है। यह अपूर्व स्थिति है।

इस सन्दर्भ में कालीघाट चित्र शैली का जिक्र जरूरी है। 18वीं शताब्दी के मध्य में ग्रामीण बंगाल से बहुत सारे कलाकार, उस समय तेजी से विकसित होते हुए कोलकाता आते हैं और कालीगंगा के घाट पर काली मंदिर (स्थापित 1798) के बाहर अपने चित्रों को बेचने के लिए गुमटियां लगा लेते हैं। उन्होंने देवी-देवताओं और तीर्थ-स्मृति के चित्र बनाना शुरू किए, जो पर्यटकों और तीर्थयात्रियों में बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गए। शुरू में विशेष तरह के कपड़े और हस्तनिर्मित रंगों से इन चित्रों को बनाया जाता था। स्थान के कारण यह ’कालीघाट चित्र शैली’ के नाम से जानी जाने लगी। 1830 से 1930 तक इस चित्र शैली ने अपना खूब विकास किया। लेकिन सस्ते लिथोग्राफ प्रिंट ने इनके बाजार को साफ कर अपना आधिपत्य जमा लिया और यह शैली विलुप्त हो गई। कला इतिहासकार डब्ल्यूजी आर्चर की वर्ष 1953 में इस पर
लिखी किताब ’पेंटिंग: द स्टाईल ऑफ कालीघाट’ प्रकाशित हुई। कला मर्मज्ञ ए एन सरकार मानते थे कि कालीघाट स्कूल ऑफ पेंटिंग भारत में शायद पहला स्कूल है, जो वास्तव में आधुनिक और लोकप्रिय रहा। इन चित्रों में आधुनिकता के प्रति आश्‍चर्यजनक आत्मीयता देखी जा सकती है। वे स्वदेशी स्त्रोतों की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इनका प्रभाव जैमिनी रॉय के चित्रों में देखा जा सकता है।

लिथोग्राफ की तकनीक ने सौ वर्ष की इस परम्परा को समाप्त कर दिया। यह आपदा तो बहुअर्थों में अत्यंत विकराल है। आने वाले समय में कलाओं में क्या-कैसे परिवर्तन होंगे, यह कल्पनातीत है। इस सहमे हुए कला संसार को थोड़ा ठहरकर ही देखने और समझने के अतिरिक्त हमारे पास अंततः क्या बचा है?

-राकेश श्रीमाल

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