सांसद अनिल दवे के सहारे संघ की शरण में भाजपा

भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में तमाम कार्यक्रमों पर चर्चा और निर्णयों के साथ ही एक महत्‍वपूर्ण कदम लोकसभा की कांग्रेस की कब्‍जे वाली चार सीटों को हथियाने का जिम्‍मा चार बड़े नेताओं को दिया गया। इनमें से दो मंत्री हैं और दो राज्‍यसभा सदस्‍य। केन्‍द्रीय सामाजिक न्‍याय मंत्री थावरचंद गेहलोत तो शहडोल संसदीय क्षेत्र का प्रभार दिया गया है। केन्‍द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्‍य मंत्री प्रकाश जावड़ेकर छिंदवाड़ा में कांग्रेस के क्षत्रप कमलनाथ को घेरेंगे। राज्‍यसभा सदस्‍य और पार्टी उपाध्‍यक्ष प्रभात झा गुना में ज्‍योतिरादित्‍य सिं‍धिया की घेराबंदी करेंगे तो एक और सांसद अनिल माधव दवे को झाबुआ में कांतिलाल भूरिया के किले में सेंध लगाने की जिम्‍मेदारी दी गई है।

पार्टी ने यह जिम्‍मा बड़ी चतुराई से दिया है। झा ग्‍वालियर क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं तो गुना में सिंधिया को घेरना उनके लिए तुलनात्‍मक रूप से आसान होगा। जावड़ेकर तो पहले से ही छिंदवाड़ा में सक्रिय हैं। असली मुसीबत केन्‍द्रीय सामाजिक न्‍याय मंत्री गेहलोत की है। उन्‍हें शहडोल का प्रभार दिया गया है और वहां उपचुनाव होना है। जातिगत समीकरणों को साधने वाली पार्टी ने इस अनुसचित जनजा‍ति वाली सीट पर गेहलोत को प्रभार दे कर उनकी चुनौती बढ़ाई ही है। यहां आदिवासी नेता को प्रभार दिया जाता तो आदिवासी-दलित की खाई से उबरने का मौका मिल सकता था।

दूसरी तरफ संघ की पृष्‍ठभूमि के अनिल माधव दवे को झाबुआ सीट पर भाजपा को मजबूत करने का जिम्‍मा दिया गया है तो इसका कारण पार्टी द्वारा मालवा प्रांत के संघ कर्ताधर्ताओं की नाराजगी को दूर करना है। असल में, भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव में संघ की स्‍थानीय कार्यकारिणी की अनुशंसाओं पर गौर नहीं किया था। उपचुनाव में अपनी पंरपंरा का हवाला दे कर संघ ने सक्रियता नहीं दिखाई थी। सूत्रों अनुसार मालवा प्रांत के संघ कर्ताधर्ता लोकसभा चुनाव में पार्टी द्वारा दिलीप सिंह भूरिया को टिकट दिए जाने से नाराज थे। उन्‍होंने इस सीट पर भूरिया की बेटी और पेटलावद से विधायक निर्मला भूरिया का नाम आगे बढ़ाया था। लेकिन तब दिलीप सिंह भूरिया ने पार्टी के गुजरात कनेक्‍शन के सहारे अपना टिकट पक्‍का कर लिया था। उनके निधन के बाद भाजपा ने उपचुनाव में निर्मला को टिकट तो दिया लेकिन अपनी कम सक्रियता के कारण निर्मला को भाजपा के प्रचार का फायदा नहीं हुआ। यहां कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया की जमावट काम आ गई। माना जा रहा है कि संघ ने यदि उपचुनाव में निरपेक्ष रहने का निर्णय नहीं लिया होता तो यहां के परिणाम बदल भी सकते थे।

संघ कर्ताधर्ताओं ने झाबुआ में कैसे अपनी पकड़ बनाई है और कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग में कैसे अपना किला खड़ा किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भाजपा संघ को नजरअंदाज करने का खामियाजा भुगत चुकी है। अब दवे के बहाने वह संघ की मालवा इकाई को पिघलाने का जतन करेगी। दवे भी मालवा से हैं तथा उनका सुलझा रूप पार्टी का यह लक्ष्‍य तो पूरा कर ही देगा। जहां तक कांग्रेस को कमजोर करने की बात है तो वह बहुत कुछ कांतिलाल भूरिया की निष्क्रियता पर भी निर्भर करती है। फिलहाल तो भूरिया वहां सक्रिय बने हुए हैं।

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