सियासी कसमें-वादे और उनसे मुकरने का अंतहीन सिलसिला!

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मध्यप्रदेश विधानसभा का ये पूरा कार्यकाल सियासी वादों और वादाखिलाफी का अलिखित दस्तावेज बन गया है। कांग्रेस ने मतदाताओं से किए चुनावी वादों को ‘वचन पत्र’ नाम दिया था। लेकिन, पार्टी के महत्वपूर्ण घटक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ पर किसानों, युवाओं और शिक्षकों के साथ वादा खिलाफी का लांछन लगाकर विद्रोह कर दिया। वे अपने साथियों के साथ प्रतिद्वंदी पार्टी भाजपा में चले गए । यहाँ भी उनके साथ कई वादे किए गए। लेकिन, जब उन वादों को पूरा करने की बात आई, तो आना-कानी की जाने लगी। क्योंकि, वादे करना और उन्हें पूरा करना दो अलग-अलग बातें हैं। जब ये वादे सियासत के धरातल पर लिए गए हों, तो उनसे मुकरना स्वाभाविक है। इस नजरिए से देखा जाए, तो सिंधिया ने कमलनाथ पर जो वादाखिलाफी का आरोप लगाया था, वही अब उनके साथ हुआ। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सरकार गिराने के लिए सिंधिया से वादे तो कर लिए, पर जब उन्हें पूरा करने की बारी आई, तो शिवराजसिंह चौहान उसमें कतरब्यौंत करना चाहा। नतीजा ये हुआ कि शपथ के बाद कई दिनों तक विभागों का बंटवारा टला। बाद में वादा पूरा भी किया तो अनमने भाव से।

मोहब्बत और राजनीति में कसमों और वादों की बहुत ज्यादा अहमियत होती है। लेकिन, दोनों ही स्थितियों में वादे करने के बाद समझ आता है, कि उन्हें पूरा करना आसान नहीं है। मध्यप्रदेश की राजनीति में भी बीते दो साल से वादे करने और फिर उन्हें तोड़ने का ही सिलसिला चल रहा है। किसी ने चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं से वादे किए तो दूसरे ने विद्रोह के लिए इन्हीं वादों को मुद्दा बनाया। बाद में सरकार गिराने के लिए वादे किए गए, लेकिन जब सरकार बन गई तो वादे पूरे करने में टालमटोली होने लगी। अब एक बार फिर मनमुटाव का दौर शुरू हो गया। लेकिन, अंततः जीत उन वादों की हुई जिनके कंधे पर सत्ता का सिंहासन टिका था। लेकिन, इस कोशिश में उनके साथ नाइंसाफी हो गई, जो बरसों से पार्टी के लिए जिंदाबाद के नारे लगाते नहीं अघाते थे, उनकी आधी जिंदगी पार्टी के लिए दरी बिछाते हुए बीती। इस सारी कवायद से एक बात तो साफ़ हो गई कि वादा लेने वाला यदि कमजोर हो, तो वादा करने वाला वादाखिलाफी करने में देर नहीं करता।  

प्रदेश में राजनीतिक वादों की शुरुआत कांग्रेस ने की थी, जब विधानसभा चुनाव में उसने मतदाताओं से लोकलुभावन वादे किए। इन्हीं वादों की बदौलत उसने किनारे पर बहुमत पाकर सत्ता पर कब्ज़ा भी कर लिया। विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए सत्ता से बाहर होना बेहद त्रासद था। क्योंकि, शिवराजसिंह चौहान ने भाजपा के 15 साल के कार्यकाल में लगातार 13 साल तक मुख्यमंत्री रहकर मतदाताओं से काफी नज़दीकी रिश्ता बना लिया था। वे बिना बात के किसी के भी ’मामा’ बन जाते थे। यही कारण था कि भाजपा ने छाती-माथा कूटने की स्थिति तक कांग्रेस का विरोध किया। डेढ़ साल में कम से कम डेढ़ सौ बार कमलनाथ सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। भाजपा ने आरोप भी लगाया था, कि अभी तक हम कमलनाथ सरकार को वादों वाली सरकार कहते है। लेकिन, अब हम ही कह रहे हैं कि ये वादाखिलाफी वाली सरकार है। कांग्रेस ने ’वचन पत्र’ के रूप में पाँच साल के लिए चुनावी वादे किए थे, पर सरकार से हर महीने वादों का हिसाब माँगा जाने लगा। किसानों की कर्ज माफ़ी वाले वादे को भाजपा ने सर-माथे पर उठाया। इसके अलावा कांग्रेस का दूसरा प्रमुख वादा था बेरोजगारों को भत्ता देना। कांग्रेस अपने वचन-पत्र  में किए इस वादे से एकदम मुकर गई, जो वाकई उसे महंगा पड़ा।

कमलनाथ सरकार पर लगा वादाखिलाफी का दौर ज्यादा दिन नहीं चला। कांग्रेस के ही एक गुट के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया उ़र्फ ’महाराज’ ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी से विद्रोह कर दिया। भाजपा में आकर उन्होंने कमलनाथ सरकार पर मतदाताओं से वादाखिलाफी करने और ट्रांसफर उद्योग चलाने के आरोप लगाए। कहा कि 18 महीनों में उनके सारे सपने बिखर गए। 10 दिन में किसानों की कर्ज माफी की बात की थी, पर वादा पूरा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि किसानों को बोनस और ओलावृष्टि का भी मुआवजा नहीं मिला। सिंधिया का कहना था कि मंदसौर गोलीकांड के बाद मैंने सत्याग्रह छेड़ा था, लेकिन हजारों किसानों पर से केस नहीं हटे। युवा भी बेबस हैं, उनके लिए रोजगार के अवसर नहीं हैं। पार्टी छोड़ने के लिए सिंधिया ने उन्हीं वादों आधार बनाया, जो खुद उन्होंने मतदाताओं से विधानसभा चुनाव के समय बतौर चुनाव अभियान समिति का मुखिया बनकर किए थे।  

इस बात से इंकार नहीं कि अपने ही चुनावी वादे निभाने में कांग्रेस की गति काफी धीमी रही। सरकार का सालभर पूरा होने के बाद जब ’वचन पत्र’ पर हुए काम की समीक्षा की गई, तो नतीजा अच्छा नहीं था। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था ’रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जायी।’ लेकिन, इस मामले में प्राण जाए बिना वचन झूठा पड़ गया। विभागीय समीक्षा की रिपोर्ट के मुताबिक तब सरकार के बड़े विभागों की ’वचन पत्र’ पर अमल की चाल बेहद सुस्त थी। कई विभाग तो ऐसे थे, जो कांग्रेस के वचन पत्र में फिसड्डी साबित हुए। इनमें स्कूली शिक्षा विभाग सबसे आगे था। शिक्षा विभाग में वचन पत्र के 82 बिंदू लंबित रहे। जबकि, सामान्य प्रशासन विभाग में 69 बिंदुओं पर अमल नहीं हुआ। इसी तरह से गृह विभाग के 67, पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के 64, नगरीय प्रशासन विभाग में 59, कृषि विभाग में 54, स्वास्थ्य विभाग में 55 बिंदुओं पर अभी अमल नहीं हुआ था। 50 सरकारी महकमों के 1302 में से 345 वचन ऐसे थे, जिन्हें पूरा करने से खजाने पर वित्तीय भार आना था, इसलिए इन्हें सरकार ने टाल दिया। यानी वादे और वादाखिलाफी का दौर यहाँ भी चला।

अब आते हैं प्रदेश की राजनीति की सबसे बड़ी वादाखिलाफी पर, जो होते-होते बच गई। यदि ये घटना हो जाती तो शिवराज सरकार का चौथा कार्यकाल मुश्किल में आ जाता। क्योंकि, प्रदेश की भाजपा सरकार इन्हीं खम्भों पर टिकी थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब कांग्रेस से पाला बदलकर भाजपा का पल्ला थामा, तब उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से कुछ कसमें ली थी। इनमें से कुछ थीं, खुद के लिए राज्यसभा का टिकट, केंद्र में मंत्री पद, अपने समर्थक मंत्रियों के लिए वही विभाग जो कांग्रेस सरकार में उनके पास थे, कुछ समर्थकों को राज्यमंत्री का स्वतंत्र विभाग और कांग्रेस छोड़ने वाले सभी पूर्व विधायकों को उपचुनाव में भाजपा की उम्मीदवारी। इसके अलावा और क्या वादे किए गए, इनका खुलासा धीरे-धीरे सामने आएगा। लेकिन, यहीं पेंच अटक गया। बताया गया कि सिंधिया ने अपने मंत्रियों के लिए बड़े और मलाईदार विभाग मांगे। ये थे नगरीय विकास, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, राजस्व, महिला एवं बाल विकास, परिवहन, वाणिज्यिक कर, लोक निर्माण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, स्कूल शिक्षा, उद्योग और जल संसाधन विभाग।

शिवराजसिंह चौहान इन विभागों में कुछ कटौती करना चाहते थे। क्योंकि, भाजपा के जिन गिने-चुने लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था, उनके लिए कुछ नहीं बचता। विभागों को लेकर ऐसी खींचतान मची कि मुख्यमंत्री इस मसले का हल निकालने के लिए दिल्ली तक हाजिरी लगा आए। लेकिन, दो दिन रहने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला, तो वापस भोपाल आ गए। वहाँ उन्हें कह दिया गया कि सिंधिया से जो वादे किए हैं, वो पूरे किए जाएं। दरअसल, सारा झमेला परिवहन जैसे गाढ़ी मलाईदार विभाग को लेकर था, जो भाजपा छोड़ना नहीं चाहती थी। लेकिन, आठ दिन की जद्दोजहद के बाद अंततः भाजपा को ’महाराज’ के सामने शरणागत होना पड़ा। क्योंकि, महाराज किसी कीमत पर समझौते के लिए राजी नहीं हुए। आशय यह कि भाजपा चाहकर भी अपने वादे से मुकर नहीं पाई। इस तरह वादों और वादाखिलाफी का एक लम्बे दौर का अंत हुआ। अब अगला दौर उपचुनाव में ’महाराज’ के सभी 22 समर्थकों को भाजपा का टिकट देने के वक़्त आएगा। भाजपा ने यदि तब फिर काट-छांट करना चाहा, तो हो सकता है फिर कोई नया विवाद खड़ा हो।

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