सुशासन से कुशासन का सफर

बात 1999 के अगस्त महीने की है , पश्‍चिमी बंगाल के उतरी दिनजपुर में एक भीषण रेल दुर्घटना होती है , 290 लोग मारे जाते हैं, और तत्कालीन रेल मंत्री नितीश कुमार इस घटना की अपने ऊपर जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे देते हैं। उस समय पहली बार लोगो ने नितीश के अंदर एक अलग तरीके के नेता को देखा। वहां नितीश नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा देते हैं, और वहां बिहार में लालू यादव चारा घोटाले मैं जेल जाने से पहले अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमत्री की गद्दी सौंप देते हैं। जब 2005 का चुनाव आया , तब बिहार की जनता के पास दो विकल्प थे, यह उसको चुनने का जिसने नैतिकता पर सिर्फ भाषण नहीं दिया पर उसपे अमल भी किया और यह उसको जो की मुख्यमत्री सिर्फ इसलिए बनी क्यूंकि उनके पति पार्टी के मुखिया थे।

24 नवंबर 2005 को नीतीश जी मुख्यमत्री की शपथ लेते हैं। बिहार मे लालू राज का अंत और नितीश युग की शुरुआत हो चुकी थी 2005 से 2020 के 15 साल के अंतराल में समय का चक्र काफी बार घूम चूका है और सुशासन बाबू , जैसा की मीडिया ने नितीश को नाम दिया, अब कुशासन कुमार के नाम से प्रसिद्ध हो  रहे  हैं। और क्यों न हो? पिछले साल कुछ घंटो की बिन मौसम बरसात ने पटना को वेनिस बना दिया और पूरा शहर बरसाती पानी में एक हफ्ते तक डूबा रहा। न शासन दिखा , न प्रशासन।  पटना के रहवासी को यही समझने में समय लग गया कि आख़िरकार हुआ क्या ? बाद में पता चला कि जो बरसाती नाले पटना से पानी निकलने के लिए अँगरेज़ बना गए थे वो सफाई नहीं होने के कारण बंद हो गए। अंग्रेज़ो को गए हुए 70 साल से ज्यादा हो गए, नितीश जी को मुख्यमंत्री बने हुए 14 साल  गए, लेकिन पटना मे नए नाले नहीं बन पाए.  बरसाती पानी इतना जमा हुआ की झारखण्ड के कोयला खदान से पंप लाने पड़े ताकि पानी को निकला जा सके और वो भी तब संभव हुआ जब केंद्र के बीजेपी के नेता और पटना के सांसद रवि शंकर प्रसाद ने अपना मोबाइल यहां वहां घुमाया।

इन सब के बीच बिहार सरकार के प्रचार विभाग ने जनता को यह बताने के लिए की नितीश स्थिति पर नज़र बनाये हुए हैं, चित्र जारी करती है जिसमें मुख्यमत्री साहब अपने  आवास की छत पे खड़े होकर पटना को निहार रहे हैं कुछ दिनों बाद एक और चित्र जारी होता है जिसमे नितीश अपने ख़ास बाबू लोगो के साथ आपदा प्रबंधन पर बैठक ले रहे हैं और मुस्कुरा भी रहे हैं।  शायद वो बिहार की किस्मत पे  मुस्कुरा  रहे थे। समय निकलता है और एक साल बाद कोरोना का कहर बिहार पे टूटता है। कुछ दिनों पहले मेरी बात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में एक वरिष्ठ अधिकारी से हुई। जब मैंने उनसे हाल चल पूछा तब उन्होंने तपाक से जवाब दिया , ‘बिहार मैं बहार है , नीतीशे कुमार है । उनका  कटाक्ष सीधा अपने निशाने पे लगा । बात निकली तो पता चला की पूरा मंत्रालय बिहार को ले के चिंतित है , बिहार मै कोरोना की जांच ना के बराबर हो रही है, कांटेक्ट ट्रेसिंग सिर्फ किताबो तक सीमित है और जो 70 दिन का लॉक डाउन बाकी राज्यों ने अपनी स्वास्थ्य चिकित्सा को समृद्ध करने में लगाए , वही बिहार सरकार ने वह 70 दिन ‘यहाँ-वहां-कहाँ-कहाँ’ की बात करने में ही निकाल दिया, न वेंटीलेटर का इंतज़ाम किया , न कोरोना  मरीज़ो के लिए बिस्तर जोड़े गए। वो हर चीज़ के लिए हमारी तरफ (केंद्र सरकार) देख रहे हैं , अधिकरी ने रुआँसे स्वर में कहा।

बिहार में कम से कम 17000 टेस्ट रोज होने चाहिए , पर हो रहे हैं 2400 से भी काम।  बिहार में कोरोना की रोकथाम के लिए हो रहे इंतज़ाम का नमूना कुछ देर बाद ही  देखने को मिल गया  जब नितीश ने अपने घर पर ही 3 डॉक्टर और 3 नर्स की टीम ड्यूटी लगवा दी ताकि उनको अगर कोरोना हो जाये तो बाहर पटना के किसी चिकित्सालय में ना जाना पड़े। नितीश खुद 87 दिनों तक अपने आवास से बाहर नहीं निकले और तब ही निकले जब स्थिति बद से बदतर हो चुकी थी पिछले हफ्ते जो केंद्र से 3 लोगो की ‘टीम पटना गई उसने भी दिल्ली आकर बिहार सरकार की पोल खोल दी, न हॉस्पिटल में डॉक्टर है , न पीपीई किटस और न ही कोई है जो घंटो से पडी हुई  कोरोना पीड़ितों की लाशो को हटाए। सुशासन से कुशासन का सफर तय करने में लालू को 15 साल लगे, नितीश भी शायद उनके पथ पर ही चल रहे हैं।

-अभिनन्दन मिश्रा
(लेखक संडे गार्जियन में पत्रकार हैं)

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