स्त्री गौरव – शकुन्तला

“हे राजन, क्या आपको वास्तव में विश्वास नहीं है कि मैं सत्य कह रही हूँ?” शकुन्तला ने भरी राजसभा में दुष्यंत से प्रश्न किया। वह अपने पुत्र सर्वदमन को लेकर उस राजसभा में उपस्थित हुई थी।  छ वर्ष का बालक इतना वीर था कि वह सिंह का मुख खोलकर उसके दांत गिन सकता था। वह शत्रुओं का दमन कर सकता था। स्वर्ग की अप्सरा मेनका और ऋषि विश्वामित्र की मानस पुत्री शकुन्तला समय के उस मोड़ पर खड़ी थी, जहाँ पर उसे स्वयं की स्त्री का अहसास इस पूरे विश्व के सम्मुख कराना था। उसे अपने पति दुष्यंत की आंखों में आँखें डालकर यह बताना था कि वही उसके साथ वन में गन्धर्व विवाह करके आए थे और यह वचन देकर आए थे कि इस विवाह से उत्पन्न पुत्र ही उनके साम्राज्य का शासक होगा। परन्तु इस गंधर्व विवाह को ही वह नहीं विस्मृत कर बैठे थे अपितु वह शकुन्तला को ही विस्मृत कर बैठे थे।

एक पुरुष जब प्रेम करता है तब वह राजा के रूप में प्रेम करता है या पुरुष के रूप में? क्या राजा होने की मर्यादाएं उसे प्रेम करने के उपरान्त ही समझ आती हैं? जैसी अब दुष्यंत की समझ में आ रही थी। वह इस विवाह को अपनी प्रजा के सम्मुख कैसे अपनाएं? कैसे वह यह भरी राज सभा में कहें कि यह बलशाली पुत्र उनका ही पुत्र है? कैसे कहें? शकुन्तला को एक बार पुन: कठोर दृष्टि से देखते हुए कहा- “हे स्त्री, मेरा तुम्हारे साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है।  मैं तुम्हें नहीं जानता और तुम्हारे साथ धर्म, अर्थ और काम किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। अत: तुमने जो कहा वह मैंने सुना और अब तुम जाओ!”

ऋषियों और सभापतियों से भरी सभा में ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर शकुन्तला का ह्रदय दुःख से भर गया। परन्तु उसे अब यह निश्चय करना था कि उसे क्या करना है? क्या उसके पुत्र को इसी प्रकार अवैध का स्थान मिलेगा या फिर उसे वह स्थान प्राप्त होगा जिसके लिए वह इस धरा पर आया है? शकुन्तला का हृदय तरह तरह के प्रश्न कर रहा था। उसका मन हुआ कि वह पूछे कि प्रेम करते समय तो अपनी प्रजा की अनुमति नहीं ली थी? उसके साथ संसर्ग करते समय तो प्रजा की अनुमति नहीं ली थी? फिर अब प्रजा का भय क्यों?

शकुन्तला दुःख से जड़ हो गयी थी! हाय यह समाज इतना निष्ठुर हो सकता है? परन्तु उसने भरी सभा में हार न मानने का निश्चय किया और प्रश्न किया- “महाराज आप सब कुछ जानकर भी क्यों नीच जन के समाज कुछ सोचे विचारे बिना नहीं जानता बार बार कह रहे हैं? इस बात की सत्यता को आपका हृदय जानता है कि आप असत्य का साथ दे रहे हैं और मैं सत्य का। आपको क्या लगता है कि जब आपने यह मेरे साथ किया तब एकांत था? कोई नहीं था? नहीं, ऐसा नहीं है, उस समय ईश्वर साक्षी था, यह समस्त ब्रह्माण्ड साक्षी था, देव साक्षी थे और आप कहते हैं कि आप मुझे नहीं जानते?

यह आपका दुर्भाग्य है राजन, कि आप अपने सम्मुख अपने उस पुत्र को पहचानने से इंकार कर रहे हैं, जिस पुत्र के लिए व्यक्ति तपस्या करता है।  हे दुष्यंत, यदि प्रार्थना करने वाली प्रार्थना आप नहीं सुनेंगे तो आज आपका सिर सैकड़ों भागों में बंट जाएगा।

क्या आपको यह ज्ञात नहीं है कि ज्ञानी पुरुष के जो पुत्र होता है, वह पुत्र संतानों से परलोकवासी पितरों का उद्धार करता है। क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्यों का स्त्री आधा अंग है। और जिनकी भार्या होती हैं वही गृहवासी हैं और वही श्री से युक्त होती है। पंडित लोग कहा करते हैं कि अपनी आत्मा से उत्पन्न हुए को ही पुत्र कहते हैं अत: मनुष्य भार्या को अपनी माता के समान भी समझे।

हे राजन, स्त्रियाँ आत्मा का सनातन और पवित्र जन्म क्षेत्र हैं, ऋषियों में भी क्या शक्ति है कि वह स्त्री के बिना प्रज्ञा रच सकें!”

हे राजन, जिस पुत्र को आप अंग लगाकर ब्रह्मांड का सबसे अनुपम सुख पा सकते हैं, उसे ठुकराकर आप क्या पाएंगे?”

जब शकुतंला ने देखा कि उसके प्रस्तर बने पति पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा है तो उसने राजसभा से जाने के लिए कदम बढ़ाए। ऋषियों से भरी राजसभा में कोई भी उसके पक्ष में नहीं आया, सिवाय एक आकाशवाणी के, जिसे आज हम राजा की अंतर्मात्मा भी कह सकते हैं, जिसने राजा दुष्यंत से कहा कि यह उसी का पुत्र है मान क्यों नहीं लेते? ऐसी पत्नी को राजसभा में अपमानित करने से क्या लाभ होगा?

राजा ने इस आकाशवाणी को सुनकर शकुन्तला को भरी राजसभा में अपनाया और स्वीकार किया कि वह प्रजा से डर रहे थे कि प्रजा क्या सोचेगी? राजा ने अपने बलशाली और प्रतापी पुत्र सर्वदमन को भी अंक में भर लिया। उस आकाशवाणी ने कहा कि चूंकि तुम मेरी बार के अनुसार इसका भरण करोगे तो इस हेतु इसका नाम भरत होगा।”

उस वाणी को सुनकर शकुन्तला हतप्रभ थी! यह प्रश्न अनुत्तरित ही था कि राजा प्रजा से पूछकर प्रेम करता है क्या जो अपने पुत्र को अपनाने के लिए प्रजा का मुंह ताकना होता है?

-सोनाली मिश्रा

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