हाथ धो कर पीछे पड़े हैं सेनेटाइजर!

सेनेटाइजर कितने में लिया?’ पहले ने पूछा।

‘तीन सौ रुपए में।’ दूसरे ने जवाब दिया।

‘इतना भाव तो शुरू में था, मैं तो पिछले हफ्ते ही दो सौ रुपए में लाया था।’ तीसरे ने बताया।

‘अरे, ठग लिया, मैंने तो कल ही डेढ़ सौ में लिया है। क्वालिटी और खुशबू भी ज्यादा अच्छी है।’ चौथे ने जानकारी दी।

‘तुमने डेढ़ सौ में लिया, कल ही मैं घर के लिए, ये ही अस्सी रुपए में लाया हूं। ये तो तीन महीने पहले खरीदा था, जब बाजार में सेनेटाइजर मिल ही नहीं रहा था। कार में रखने के लिए लेना पड़ा था, लेकिन यह ओरिजनल है। इस जैसा तो फिर बाजार में आया ही नहीं, शॉप वाला खुद कह रहा था कि अब वो बात कहां। शुरुआत में तो सेनेटाइजर सही में सेनेटाइजर था, अब तो खुशबू वाला पानी आ रहा है, उससे तो बेहतर है डीओ से हाथ साफ कर लो, बस खुशबू ही खुशबू है, हाथ पर तो कुछ असर नहीं होता है। पानी से धोना ज्यादा अच्छा। सेनेटाइजर से धोने के बाद साबुन से धोने पड़ते हैं हाथ, दुकानदार बता रहा था।’ उसने अपने महंगे सेनेटाइजर का बचाव किया।

‘आजकल तो सेनेटाइजर ऐसे आ रहे हैं कि स्किन भी हाथ धोने में धुल जाती है, ना जाने क्या-क्या मिलाते हैं।’ अगले  ने बताया।

‘हां, तो शराब भी मिलाते हैं, हमारे एक मिलने वाले हैं, वो तो दारू से रोज सुबह कुल्ला करते थे छिपाकर, अब तो खुलेआम हाथ भी धोने लगे हैं। पहले पत्नी सूंघ कर बता देती थी कि पीकर आए हैं, अब सेनेटाइजर की वजह से कन्फ्यूज रहती है कि गंध हाथ से आ रही है या मुंह से। उनके रोज के झगड़े बंद हो गए हैं। जान है तो जहान है, यही सोचती होगी पत्नी।’

‘ये तो कुछ नहीं, हमारे पड़ौसी ने तो सेनेटाइजर की बोतल में ही शराब भर के रख दी है। मुझे तो तभी शक हो गया था, जब वे एक साथ बीस-पच्चीस बोतलें खरीद लाए थे। अब ये हालत है कि हर जगह  सेनेटाइजर की बोतल रखी है और वे थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ धोने लग पड़ते हैं। उनके घर जाओ तो गंध से ऐसा लगता है जैसे कलाली में आ गए हों। मुझे तो शक है कि पत्नी को छोड़ पूरा घर ही बेवड़ा हो गया है, जो देखो वो सेनेटाइजर की बोतल लिए भागा चला जा रहा है।’

‘हां, कोई बता रहा था कि सेनेटाइजर का उठाव कम होता जा रहा है और शराब की डिमांड बढ़ती जा रही है। कलाली में तो आजकल सेनेटाइजर की जगह दारू ही रखी रहती है। सेनेटाइजर से सस्ती पड़ती है दारू।’ एक और ज्ञानी ने ज्ञान दिया।

‘पहले घरों में जिस तरह पान-सुपारी सर्व की जाती थी, आजकल सेनेटाइजर सर्व किया जाता है। हमारे पड़ौसी के तो ये हाल हैं कि खुद सस्ता सेनेटाइजर छिपा कर यूज करते हैं और मेहमान के लिए ब्रांडेड रखते हैं। कहते हैं मेहमान ही भगवान है, ऐसे दौर में कौन हिम्मत करता है किसी के घर जाने की। लोग इतना खतरा उठाते हैं तो क्या हम इतना खर्च नहीं उठा सकते?’ क्या मालूम यह किसने कहा।

‘अब तो लोग जेब में भी सेनेटाइजर रखने लगे हैं।’

‘सेनेटाइजर रखें तो भी ठीक है, सेनेटाइजर की बोतल में शराब भर लेते हैं। पता ही नहीं चलता है कि पी रहे हैं या हाथ धो रहे हैं। पहले तो छिपाकर रखते थे, अब तो सेनेटाइजर ने जैसे उन्हें लायसेंस दे दिया है। पुलिस भी नहीं पकड़ती है। भाव भी एक और असर भी समान।’

‘सुना है मंदिरों में सेनेटाइजर का विरोध हो रहा है कि उसमें शराब मिली रहती है तो मंदिर में कैसे रखें। पुजारियों का यह भी कहना है कि फिर मंदिर और कलाली में फर्क ही क्या रह जाएगा। भक्त कम और शराबी ज्यादा आने लगेंगे दर्शन करने।  शराब की गंध तो आती ही है न, कितनी ही धूप-अगरबत्ती लगा लो, किसी का भी ईमान डगमगा सकता है। अपने आप को रेसिस्ट करना कितना मुश्किल होता है।’ ये पक्के में मंदिर के पुजारी ने ही कहा होगा ।

‘अपन ने तो भैया इसीलिए सेनेटाइजर का झंझट ही नहीं पाला। शुरू से साबुन से ही हाथ धोते आए हैं। कभी लिक्विड-सोप का भी इस्तेमाल नहीं किया। साबुन चलता भी खूब है, जबकि सेनेटाइजर को हर बार देखना पड़ता है कि कहीं ज्यादा तो नहीं ले लिया, वापस भी तो नहीं डाल सकते न! जितने में सेनेटाइजर की एक बोतल आती है, उतने में तो साल भर के नहाने-धोने का साबुन आ जाता है। हर बार सेनेटाइजर खरीदने पर यही खुटका रहता है कि ठगा तो नहीं गए। जो हम मोलभाव कर डेढ़ सौ में लाते हैं, कोई दूसरा सौ में तो तीसरा अस्सी में ले आता है। चौथा तो आपके सेनेटाइजर को नकली ही साबित कर देता है, कहता है कि दो घूंट पीने का बाद भी नशा नहीं हुआ।’

‘हां, मैंने तो यह भी देखा है कि एक साहेब चखकर तय कर रहे थे कि सेनेटाइजर असली है या नहीं।’ जो बहुत देर से चुप था, अपनी बात कह दी।

सभी चुप हो गए कि व्यर्थ बहस ना करें, साबुन से बेहतर सेनेटाइजर दूसरा नहीं अपने घर में और बाहर तो दूसरों का सेनेटाइजर है ही। 

-प्रकाश पुरोहित

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