हिन्दी भाषा के बिना कैसा विकास? कैसी स्वाधीनता?

हिन्दी को हथियार बनाकर आजादी हासिल कर लेने वाले हम भारतीयों पर हिन्दी के प्रति कृतघ्न कहलाने का ऐसा कलंक लगा हुआ है , जिसे धो डालने की पुरजोर कोशिश कभी नहीं हुई। एक हजार साल के संघर्ष भरे इतिहास कीओर मुड़ कर जब भी हिन्दी अपना चेहरा देखती है , तब उन घावों को देख कर सिहर जाती है , जो उसे और किसी ने नहीं , हमने ही दिये। प्राकृत हो या अपभ्रंश, डिंगल हो या पिंगल , वह थी तो हिन्दी ही जो तांत्रिकों , सिद्धों , बौद्धों और राजपुतानों की आवाज बनी । हिन्दी ने विप्लव देखे , विद्रोह देखे , राजाओं के भोग-विलास देखे , सम्प्रदायों की
आपसी लड़ाइयाँ देखी । इन सबके बावजूद वह धूल- मिट्टी में खेलती -कूदती बड़ी हुई ।

इस सदी के बच्चों को भरोसा भी नहीं हो सकता कि पिछली पीढ़ियाँ आल्हा- ऊदल के किस्से सुनते हुए और आल्हा गान सुनते हुए बड़ी हुई थी। बैसवाड़े और बुन्देलखंड के भूगोल से वे चौपालें कब लापता हो गई , अब कोई नहीं जानता , जहाँ कभी वीरगाथाएँ गा-गा कर हिन्दी इतराती फिरती थी , और वह लोक -जीवन के हृदय में गहराई तक उतर चुकी थी। चंदबरदाई का नाम खो गया हमसे , और उनका ’पृथ्वीराज रासो’ कितने हिन्दी-प्रेमी अब छू कर भी देख पाते होंगे ? बारहवीं सदी के अमीर खुसरो भुला दिये गये , जिन्होंने निजामुद्दीन औलिया के शागिर्द रहते हुए पहली बार खड़ी बोली की मजबूत नींव रखी। हम इतने कृतघ्न कैसे हो गये , कि जुलाहा को कबीर और चर्मकार को रैदास बनाने वाली हिन्दी की सुध लेने का समय हमारे पास नहीं। राजपुताने की साम्राज्ञी मीरा को जिस हिन्दी ने लोक-लाज छोड़ कर जन-जन के बीच ला कर खड़ा कर दिया , उस हिन्दी को सहलाने का मन क्यों नहीं होता हमारा।

मुहम्मद गौरी , गुलाम वंश , खिलजी और तुगलक राजवंशों के दौर में हमारी मातृभाषा हिन्दी ने कैसे दिन गुजारे हैं , हिन्दी के सपूतों को अंदाजा भी नहीं। मुगलों के आक्रमण होते रहे और हिन्दी अपनी बेचैनी को , अपने त्रास को कविता में ढाल कर तब लोगों के बीच ले गई ,जब बंदिशें थीं , धार्मिक और राजनैतिक कट्टरताएँ हिन्दी के प्रति अंधी और बहरी हो चुकी थी। हिन्दी को बड़ा सहारा दिया उन संत-सम्प्रदायों ने , जिसमें रामानंद थे , वल्लभाचार्य थे और वे महान् सूफी संत थे , जिनका कर्ज है हमारे माथे पर। जायसी आये अपना ’पद्मावत’ ले कर ।

ब्रज और अवधी ने मिल कर हिन्दी का स्वर्णयुग उस दौर में बनाया , जब हमारी जुबानों पर ताले लगे हुए थे और जिंदगी कसमसा रही थी। हिन्दू और मुसलमानों के बीच कबीर की रमैनी , सबद और साखियाँ जादू करती थीं । कबीर ने समाज-सुधार का दायित्व उठाया , आडम्बरों को धोया ,राम और रहीम को एक किया और वह सपना जगाया , जिससे दो दिलों की दूरियाँ खत्म हो। सोच कर तो देखिए , सिक्खों के धर्मगुरु नानकदेव हिन्दी के कवि थे । यकीन नहीं होता , कि गुरुग्रंथ साहिब ही वह  हिन्दी का पहला और बड़ा काव्यसंग्रह है , जिसमें एक साथ कबीर , रैदास , मीरा , तुलसीदास , सूरदास और रसखान  सहित अनेक कवियों के सुंदर पद संकलित हैं। सिक्खों ने हिन्दी का जो गौरव बढाया , उसकी मिसाल ढूँढने पर भी नहीं मिलेगी। केशवदास , यारी साहब , पलटू साहब , भीखा साहब , सहजोबाई , मलूकदास और दादू सहित अनगिनत नाम हैं , जिन्हें याद रखने की तकलीफ हम नहीं उठाना चाहते , लेकिन हमें यह तो याद रखना होगा , कि ये ही वे संत थे , जिन्होंने हमें आज तक बोले जाने वाले हिन्दी के शब्द दिये , हमें पहचान दी।

संस्कृत में रचित वाल्मीकि की रामायण के रहते हुए भी तुलसीदास ने रामचरित मानस लिखने का बीड़ा उठाया, तो सिर्फ इसलिये कि उनके पास समय की धार थी और वे भाषा , बोली की ताकत अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने हिन्दी से ही युग बदल दिया , समाज में उजाला फैलाया। तुलसीदास चाहते , तो पूरी की पूरी रामकथा संस्कृत में दोहरा सकते थे , किन्तु तब उनकी अवधी शिखर तक कैसे पहुँचती। आज अवधी में लिखे उनके दोहे और चौपाइयों का दुनिया पर राज है। बरसों तक सूर और मीरा के साथ बिहारी , रहीम , घनानंद ,  सेनापति , पद्माकर , भूषण, वृन्द ,मतिराम , भिखारीदास और विद्यापति के गीत हमारी साँसों के साथ उतरते -चढ़ते रहे । यह बहुत पुरानी बात नहीं , अभी कुछ ही बरस पहले तक हिन्दी के इन कवियों की बातों का हमारे घर-परिवारों में वही सम्मान था , जो पुरखों की कही हुई बातों का होता है।

मुगलकाल में लम्बे समय तक हिन्दी विषम परिस्थितियों से जूझती रही , किन्तु सामाजिक चेतना भी जगाती रही। हिन्दी ने डटकर मुकाबला किया। अठारहवीं सदी में पोर्चुगीज ,डच , फ्रांसिसी और उसके बाद अंग्रेज आये , तो इन सबने हिन्दी को फिर पीछे धकेलने की कोशिश की। हम ऋणी हैं स्वामी दयानंद के , जिन्होंने अकेले ही इन सब विरोधी ताकतों का सामना करने के लिये हिन्दी को आगे किया । दयानंद ही वह पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने स्वदेश-प्रेम के लिये , स्वाधीनता के लिये हिन्दी की जरूरत पर मोहर लगाई। अंग्रेजों के राज में भी अंग्रेजी का विरोध करने वाले साहसियों की कमी नहीं थी। हिन्दी के प्रचार के लिये आन्दोलनकारियों ने मशाल उठाई। 1882 में हंटर कमीशन के सामने कई बार हिन्दीके समर्थन में मेमोरियल भेजे गये। काशी में ’नागरी प्रचारिणी सभा’ ने हिन्दी के काम को आगे बढाया। पंडित मदनमोहन मालवीय के भगीरथ प्रयत्नों को हिन्दी कैसे भूल सकती है। बीसवीं सदी में महात्मा गाँधी ने जब स्वदेशी आन्दोलन खड़ा किया , तब उसकी नींव में हिन्दी थी। इस देश को आजाद कराने में सुभाषचंद्र बोस , चंद्रशेखर आजाद , भगतसिंह ,
अशफाक उल्ला खाँ , लाला लाजपतराय सहित जितने भी नाम हैं , इन्होंने हिन्दी का ही झंडा उठाया। भारतेन्दु और उसके बाद महावीरप्रसाद द्विवेदी , रामचंद्र शुक्ल , प्रेमचंद , जयशंकर प्रसाद , निराला ने साहित्य की कम , हिन्दी की ज्यादा सेवा की । अब हिन्दी के लिये मर मिटने वाले कहाँ? जब हिन्दी के लिये आखिरी लड़ाई लड़ने का वक्त था , तब हम सोये हुए थे , और अब तो हम गहरी नींद में है।

1947 में देश तो अंग्रेजों से पिंड छुड़ा कर आजाद हो गया , लेकिन देश को आजाद कराने वाली हिन्दी अब अंग्रेजी की गुलामी करने के लिये छोड़ दी गई है। देश को आजाद कराने के लिये हिन्दी की वकालत करने वाले महात्मा गाँधी , नेहरू सहित कोई भी हिन्दी के लिये कुछ नहीं कर पाये। गाँधी जी ने कहा था कि बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्र गूंगा है , तो फिर समझ लीजिए , हम बहत्तर साल से गूँगे ही है , क्योंकि अभी तक हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। पूरे भारत की तो बात छोड़ ही दीजिए , हिन्दी प्रान्तों के सरस्वती-मन्दिरों से हिन्दी को बाहर खदेड़ने की मुहिम पूरी तरह सफल हो चुकी है। गाँव-गाँव में, शहर-शहर में जितने भी स्कूल हैं , वहाँ अंग्रेजी पूजी जा रही है । भारत स्वतंत्र हुआ , उसके पहले तक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल होते ही नहीं थे, और अब ? अंग्रेजों के जमाने में भाषा और शिक्षा के पतन के लिये मैकाले को दोष देते रहे, और अब भी उसे ही दोषी ठहरा कर हम अपना बचाव कर लेते हैं।

हमारे देश के प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं , तो हिन्दी में बोल कर आते हैं , किन्तु स्कूली बच्चों को हिन्दी में बोलने की मनाही है । पूरे देश के नेता , अभिनेता , पत्रकार , वैज्ञानिक, उद्योगपति , बुद्धिजीवी हिन्दी बोल रहे हैं , समझ रहे हैं , लेकिन हिन्दी को वाजिब सम्मान देने की बात पर मुँह फेर लेते हैं। यह सब कब तक चलेगा , कोई नहीं बता सकता। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के लिये और तीन तलाक जैसी सदियों पुरानी परिपाटी को खत्म करने के लिये राज्यसभा और लोकसभा में मत हासिल कर हाथों हाथ निर्णय लिया जा सकता है , तब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में कौन सा बड़ा जोखिम है ? एक राष्ट्रभाषा के लिये जोखिम उठाना ही पड़े , तो हर्ज क्या है ? कोई सन्देह नहीं , सब बाधाओं को पार कर हिन्दी ही मूर्धाभिषिक्त होगी । हिन्द में रहने वाले एक अरब तीस करोड़ लोगों की सर्व-स्वीकार्य भाषा हिन्दी नहीं होगी , तो फिर कौन होगी ? यदि कोई सियासत न हो , तो क्या उत्तर और क्या दक्षिण , हिन्दी सबको जोड़ने की , सबको साथ लेकर चलने की सामर्थ्य रखती है ।  हिन्दी है , तो हम हैं । वह हमारा स्वाभिमान है। हिन्दी के बिना कैसा विकास , और कैसी स्वाधीनता ?

डॉ.मुरलीधर चाँदनीवाला
(लेखक शिक्षाविद हैं)

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